डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(ई-अभिव्यक्ति- में ‘पूर्णिका’ जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’का स्वागत.)

संक्षिप्त परिचय 

सम्प्रति : आयुध निर्माणी खमरिया से सेवा निवृत्ति के पश्चात मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत।

कृतियाँ: अनुराग (कहानी संग्रह) फरवरी 2009, धरती की धरोहर (कहानी संग्रह) नवंबर २०११। किलकारी (बाल काव्य-संग्रह) जनवरी 2014 विचार (काव्य-संग्रह) 2017. बुंदेली भोजपुरी गीत समागम 2020. गांव की बेटी (उपन्यास) जनवरी 2021, आह (पूर्णिका संग्रह) 2021, घर संसार (गीत संग्रह) 2023, सुखानुभूति (पूर्णिका संग्रह). का मओ…बिन्ना (बुन्देली पूर्णिका संग्रह) 2025, पूर्णिका विद्या पर विमर्श के साथ ही ‘बधाई हो बघाई’ (पूर्णिका संकलन) आपके जन्म दिवस को समर्पित 93 पूर्णिका-कारों ने केवल एक विद्या विशेष ‘पूर्णिका’ पर अपनी पूर्णिकाएं समर्पित की, इसके साथ ही नगर, प्रदेश, देश से प्रकाशित होने वाले करीब 130 संकलनों में आपकी रचनाएँ यथा प्रकाशित हुई हैं। अभी आप कई पत्र पत्रिकाओं के साथ साहित्य परिवार पत्रिका नदियाद गुजरात के सह संपादक, काव्यामृत पत्रिका पीलीभीत के क्षेत्रीय संपादक भी है। ‘माई’ उपन्यास प्रकाशाधीन है आप आकाशवाणी जबलपुर से निरंतर कहानी पाठ करते हैं।

सहभागिता : आपने विभिन्न विभागीय और अविभागीय अनेक प्रतियोगिताओं में भाग लेकर तथा त्वरित – भाषण, निबंध-लेखन, कविता-लेखन, बाद-विवाद और कविता पाठ में विजय श्री प्राप्त की है।

सम्बध्दता : आप विभिन्न सामाजिक, साहित्यक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संगठनों से जुड़े हैं। जैसे पूर्व नगर महासचिव स.पा. अध्यक्ष विधिक साक्षरता समिति पंजीकृत जबलपुर हैं।

संयोजक / संस्थापक: अंतर्राष्ट्रीय पूर्णिका मंच, आमा साहित्य संघ जबलपुर मप्र, उपाध्यक्ष यादव महासभा, उपाध्यक्ष त्रिपुर वरिष्ठ नागरिक महासंघ जबलपुर मप्र, इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गनाइजेशन – विधिक सलाहकार मप्र … आदि।

सम्मान : अनेक प्रांतीय एवं राष्ट्रीय साहित्यिक, सामजिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं मानद उपाधियों से अलंकृत / विभूषित।

विशेष : विक्रम शिला हिन्दी विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) भागलपुर बिहार से पूर्णिका- जनक की उपाधि से सम्मानित (2022)

 

आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

(डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ जी को हिंदी साहित्य की विधा पूर्णिका का जनक होने का श्रेय है. आपकी पुस्तक सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह) के आत्मकथ्य के माध्यम से आपने पूर्णिका के इतिहास पर प्रकाश डाला है जिसे हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. इसके पूर्व हमने इसी प्रकार गद्य क्षणिका के जनक श्री रामदेव धुरंधर जी, मारीशस के आलेख को भी प्रकाशित किया था जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं. – संपादक (ई-अभिव्यक्ति))

👉 हिंदी साहित्य – आलेख ☆ दस्तावेज़ # 30 – मारिशस से ~ गद्य – क्षणिका : मेरे लेखन का एक सबल पक्ष ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

“सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह को पुस्तक रूप तक लाने में मुझे भी बहुत कुछ नये नये अनुभव प्राप्त हुए है। जब से हमने सन् 2017 से पूर्णिका पर काम करना प्रारम्भ किया है।

अनुभव यह हुआ कि यदि कोई भी चीज या चलन सदियों से चल रहा है तब भी उसे हमें बिना सोचे समझे आँख बंद करके नहीं मान लेना चाहिये हमें ईश्वर ज्ञान बुध्दि प्रदान किये हैं उसका धनात्मक, ऋणात्मक समझ बूझकर नुकसान फायदा सोच कर स्वीकार करना चाहिये मानना चाहिये और यदि हमें लगता है कि यह तो गलत है हमारे या जन हित में नहीं है तो उसे स्वीकार करने की जगह अस्वीकार करना चाहिये।

लेकिन हाँ यदि आप ने ऐसा किया तो उस प्रथा चलन को आँख बंद करके मानने वाले आप के विरोध में खड़े हो जाते हैं यह मेरे साथ पूर्णिका को लेकर ही नहीं बड़े बड़े वैज्ञानिको के साथ भी हुआ लेकिन वो अपने उद्देश्य से विरोध के पश्चात भी भटके नहीं तभी आज विश्व विज्ञान में इतनी प्रगति कर चुका है कि आज वर्तमान में चाँद पर बस्ती बनाने की चर्चा जोरों पर है। यदि आज भी लोग चाँद को चन्दा मामा जानते रहते हमें बताते रहते और हम वही मानते रहते तो आज भी विकास से दूर होते।

एक महान होमियोपैथी चिकित्सा पद्यति की खोज करने वाले जब डॉ. हैनीमन साहब ने कहा कि रोग जिस तत्व की कमी से हो जाये तब उसे ही पूरा कर दो रोग ठीक हो जायेगा।

लेकिन उनकी इस बात का उस समय पुरजोर विरोध हुआ फिर भी वो अपने काम में विरोध को दर किनारे कर के लगे रहे और आज होमियो पैथी चिकित्सा पद्यति से रोगियों का इलाज कर उन्हें खुशहाल किया जा रहा है रोग मुक्त किया जा रहा है।

यदि आज सारे के सारे लोग दुनियाँ की उन्हीं पुरानी विचार धाराओं प्रथाओं को मान कर चल रहे होते तो ऐसा विकास जो हम देख रहे हैं किसी भी क्षेत्र में न हुआ होता वह चाहे दूर संचार, सुरक्षा अथवा किसी भी क्षेत्र में अकल्पनीय, विकास न हो पाया होता।

हाँ किसी खोज का विरोध यदि तर्क संगत हो तो होना भी चाहिये किन्तु तर्क हीन नई खोज का विरोध तो नहीं होना चाहिये किन्तु कुछ लोग तर्क संगत खोज का तर्क हीन विरोध करते हैं।

कुछ लोग उस तर्क हीन विरोध करने वाले व्यक्ति को अपने पाले में करने के लिये उस व्यक्ति जिसने तर्क हीन विरोध उस नई खोज का किया बिना उसकी योग्यता का उचित अध्ययन मूल्यांकन किये पावर या क्षमता न होते हुए भी किसी उपाधि विशेष से अलंकृत कर देते हैं जो न तो अलंकृत होने वाले को और न ही अलंकृत करने वाले को कोई लाभ पहुँचा पाती है बस इतना ही होता है अपने मुँह मियां मिट्ठू बने रहिये खुश होते रहिये।

हम लोग यह भी जान लें कि जब कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक, साहित्यकार नई बात उठाता है तब भी जो लोग स्थापित नहीं होते हैं वो विरोध इसलिये करते हैं कि हमने तो इतने बड़े बड़े काम किये हैं लेकिन नया कुछ भी नहीं कर पाये है जो सदियों से चल रहा है वही किये हैं लेकिन यह व्यक्ति नया कुछ कर के अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया है हम ऐसे ही रह गये।

लेकिन आगे चलकर जो विरोध होता है वह यह साबित करता है कि अब वह व्यक्ति अपने उद्देश्य में सफल हो रहा तभी यह विरोध हो रहा है। यही हाल पूर्णिका जनक और पूर्णिका के साथ भी है।

साहित्य हो विज्ञान हो या अविष्कार का कोई नया क्षेत्र हो। विरोधियों के अलावा एक समय ऐसा आता है कि उस व्यक्ति (जो नया काम कर रहा है) के साथ उसकी विचार धारा से सहमत हो कर अनेकानेक लोग, अनुयायी साहित्यकार वैज्ञानिक उस व्यक्ति के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाते हैं

जिससे वह खोज दुनिया स्वीकार कर लेती है और विरोधियों कि जुबान बंद हो जाती है उन्हें विवश हो कर उस व्यक्ति के साथ खड़ा होना पड़ता है या मुँह छुपाना पड़ता है।

यही हाल पूर्णिका और पूर्णिका जनक के साथ हुआ आज पूर्णिका हिन्दी साहित्य की जानी मानी एक सशक्त विधा है जिसे हिन्दी साहित्य में एक सम्मान जनक स्थान प्राप्त हो जिसके लिखने पढ़ने वाले पूर्णिकाकारों की एक लंबी सूची बन गई है जिसमें सर्व प्रथम डॉ. प्रो. खेदू भारती ‘सत्येश’ जी धमतरी छत्तीसगढ़ का नाम आता है जिनकी पूर्णिका की पचास पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो छत्तीसगढ़ी बोली और हिन्दी में हैं।

जबलपुर के पूर्णिका पुरोधा कदम जबलपुरी जी नों सौ दिन से निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं इनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। शिव अलग जी जिनकी तीन पूर्णिका संग्रह के साथ पूर्णिका में एक महाकाव्य प्रकाशित हो रहा है जो लगभग तीन हजार पृष्ठों का होगा। मारीशस से भाई गोवर्धन सिंह फौदार सच्चिदानंद जी निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं डॉ. कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ जी जिन्होंने बुन्देली बोली में पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित करा दी है। रजनी कटारे जी जिनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दीन दयाल यादव जी जिनकी पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित हो चुकी। भाई श्री ओम प्रकाश खरे और रमेश सेठ तथा चन्द्रभान चन्द्र और डॉ ललित कुमार सिंह ‘ललित’ अलीगढ़ उत्तरप्रदेश के साथ ही देश के अनेकानेक पूर्णिका कारों की पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसमें कुंज बिहारी यादव नरसिंहपुर मप्र, नीलम यादव एहसास प्रयाग राज उप्र, किरत सिंह यादव भिण्ड मप्र, गायत्री सिंह ठाकुर ‘सक्षम’ नरसिंहपुर मप्र, सतीश तिवारी भी शामिल हैं। और अभी दिसम्बर 2024 में एक साथ पैतालिस पूर्णिका की पुस्तकों का विमोचन हुआ जो ऐतिहासिक है। अभी तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक समय में एक मंच से किसी एक विधा विशेष की इतनी पुस्तकों का विमोचन हुआ हो।

और यह बात सिध्द करती है कि “सफल हुआ अभियान” सत्य और सही है कि अभी पूर्णिका जनक के 3 फरवरी 2024 को जन्मदिन पर चार हिन्दी साहित्य अकादमी भारत सरकार उच्च शिक्षा विभाग की पत्रिका, दो विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि ने और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने पूर्णिका को अपनी मान्यता प्रदान कर इस बात पर और चाँद लगा दिये कि “सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह अद्वितीय पुस्तक है।

अंत में मै अपने समस्त पूर्णिकार मित्रों को नमन करता हूँ कि यह केवल और केवल पूर्णिका के प्रति आप के लगाव और अभियान” समर्पण के कारण हो पाया है। कि “सफल हुआ अभियान’ (पूर्णिका संग्रह) अब आप और समस्त पूर्णिका कारों और पूर्णिका पाठको के हाथों में यह पुस्तक “सफल हुआ अभियान’ पूर्णिका पहुँच पा रही है।

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Uma Sharma artika
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आदरणीय डॉ सलपनाथ यादव प्रेम भाई जी आपको नमन वंदन करती हूॅ,आप पूर्णिका जनक है, आपका व्यक्तित्व बहुआयामी और प्रतिभाशाली हैं, आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाइयां 🙏 🌹 जय पूर्णिका 🙏