प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गीत – घाव बहुत गहरे हैं ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

रोदन करती आज दिशाएं,मौसम पर पहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे हैं वो,घाव बहुत गहरे हैं ।।

 **

बढ़ता जाता दर्द नित्य ही,

संतापों का मेला।

कहने को है भीड़,हक़ीक़त,

में हर एक अकेला।।

 *

रौनक तो अब शेष रही ना,बादल भी ठहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे वो,घाव बहुत गहरे हैं ।।

 **

मायूसी है,बढ़ी हताशा,

शुष्क हुआ हर मुखड़ा।

जिसका भी खींचा नक़ाब,

वह क्रोधित होकर उखड़ा।।

 *

ग़म,पीड़ा औ‘ व्यथा-वेदना के ध्वज नित फहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे हैं वो घाव बहुत गहरे हैं ।।

 **

व्यवस्थाओं ने हमको लूटा,

कौन सुने फरियादें।

रोज़ाना हो रही खोखली,

ईमां की बुनियादें।।

 *

कौन सुनेगा,किसे सुनाएं,यहां सभी बहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे है वो घाव बहुत गहरे हैं ।।

 **

बदल रहीं नित परिभाषाएँ,

सबका नव चिंतन है।

हर इक की है पृथक मान्यता,

पोषित हुआ पतन है।।

 *

सूनापन है मातम दिखता,उड़े-उड़े चेहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे हैं वो घाव बहुत गहरे हैं ।।

 ☆

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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