श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मैं तो तर गयो…“।)
अभी अभी # ८५७ ⇒ आलेख – मैं तो तर गयो
श्री प्रदीप शर्मा
देशभक्ति क्या होती है, हम इंदौरी नहीं जानते। कोई उधौ हमें ज्ञान न सिखाए। हमारे लिए इंदौर ही देश है, आप चाहो तो हमें कूप मंडूक कह लो, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हमारा कुआं अब इतना विशाल हो गया है कि अब आप इसे स्मार्ट कुआं भी कह सकते हैं।
मध्यप्रदेश के भी मध्य में, दो ज्योतिर्लिंगों के बीच स्थित यह इंदौर मेरी जान है, जान है, शान है। आज भी कई जूनी इंदौरी, इंदौर छोड़कर विदेश तो क्या, स्वर्ग में जाना भी पसंद नहीं करते। उनके लिए तो इंदौर ही हमी अस्तो, हमी अस्तो है।।
स्वच्छता की हैट्रिक तो खैर अपनी जगह है, हमें तो स्वच्छता के छक्के जड़ना भी आता है। शुरू से ही, अपने शहर पर हमें नाज़ है। जैसा भी है, मेरा इंदौर, मेरा इंदौर है। इसे हम मेरा नहीं, अपना इंदौर कहते हैं, जैसे आप अपने बच्चे के बारे में शान से कहते हो, यह अपना बच्चा है।
शहर की छोटी मोटी उपलब्धि पर खुश होना, हमारी आदत में शुमार है। लता मंगेशकर से लेकर राहत इंदौरी तक के नाम हमें बहुत राहत देते हैं, क्योंकि ये इंदौर से जुड़े हैं। देवी अहिल्या तो हमारी माता है। तुकोजीराव और यशवंतराव के नाम पर इंदौर में क्या क्या नहीं है। एम् वाय अस्पताल और एम टी क्लॉथ मार्केट का नाम सुना है। कभी यशवंत क्लब गए हो।
सारे क्रिकेट मैचेस कहां होते हैं। कर्नल सी के नायडू, और कैप्टन मुश्ताक अली को जानते हो।।
आखिर आज इंदौर का इतना गुणगान क्यों ? अरे कोई कारण होगा। जी हां, ज़रूर है। बात ही कुछ ऐसी है। मेरे एक पुराने परिचित हैं, इंदौर प्रेमी हैं। वैसे एक बात बता दूं, सभी इंदौरी प्रेमी होते हैं। जो बाहर से आता है, इंदौर का होकर रह जाता है। और अगर इंदौर का कहीं जाता है, तो इंदौर के गुण ज़रूर गाता है।
इन इंदौर प्रेमी को आप इंदौरी लाल भी कह सकते हो। कल बहुत दिनों बाद इनके दर्शन हुए ! मुझे देखते ही उछल पड़े। कहां हो आजकल, दिखाई नहीं पड़ते। पता है, इंदौर में क्या हो रहा है ? मुझे बोलना पड़ता है, नहीं पता। तब उनकी गाड़ी चल निकलती है। दोनों हाथ सर तक ले जाकर बोले, साहब मैं तो तर गया। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे जीते जी इंदौर में मेट्रो जैसी चीज आ जाएगी। जब बीच सड़क में आई बस चलती थी, तो मेरा सीना गर्व से फूल जाता था, और अब मेट्रो। साहब मैं तो तर गया, मेरा जीवन सफल हो गया।।
जब उसकी गाड़ी चल निकलती है, तो उसको रोकना आसान नहीं होता। वह भावुक हो गया ! कोई व्यक्ति बनारस जाए, और भला गंगा स्नान करके न आए, कोई वी आई पी, इंदौर आए और सराफा की चाट न खाए, ऐसा कभी हुआ है। भले ही क्रिकेट के खिलाड़ी सायाजी और होटल रेडिसन में रुकें, जब छप्पन दुकान पर विजय चाट का पेटिस खाते हैं, तो हर इंदौरी का सीना छप्पन इंच का हो जाता है साहब। जो इंदौर से करे प्यार, वो देशप्रेम से कैसे करे इंकार। इंदौर के पोहे जलेबी वर्ल्ड फेम हैं, आप जानते हो।
हमारे दामू अण्णा की दुकान और जेलरोड की प्रशांत होटल पर ऐसी ही बातें होती हैं। हम इंदौरी ऐसे ही हैं। मेट्रो के इंदौर आने की खबर से ही हर इंदौरी तर गया है। वह उस दिन का इंतज़ार कर रहा है, जब वह मेरे साथ मेट्रो में बैठकर सराफा में नागौरी की शिकंजी पीने चलेगा। आप भी आमंत्रित हैं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





