श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नरसिंह भगत।)

?अभी अभी # ८७३ ⇒ आलेख – नरसिंह भगत? श्री प्रदीप शर्मा  ?

नाथ मैं थारो ही थारो ! अवतारों और चमत्कारों के इस देश में शायद ही कभी ऐसा वक्त आया हो, जब ईश्वर ने अपना कोई ना कोई अवतार संकट की घड़ी में ना भेजा हो। दुष्टों के लिए तो स्पेशल अवतार होते ही हैं, यहां तो भक्त भी भगवान का रूप धारण कर अवतरित हो जाते हैं। ‌फिर उनके भी भक्त पैदा हो जाते हैं और इस तरह आस्था और संस्कार की यह चैनल,  टीवी पर २४ घंटे चला करती है।

याद कीजिए भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद को बचाने,   और दुष्ट, अधर्मी राजा हिरणयकश्यप का वध करने के लिए खंभे में से प्रकट हो नरसिंह अवतार लिया था। भक्त कभी किसी का वध नहीं करता, प्रतिरोध नहीं करता। वह बस अपने आराध्य के प्रति शरणागति हो जाता है। नाथ मैं थारो ही थारो और खुद अकर्मा नरसिंह भगत होकर अपने ठाकुर जी को यहां से वहां भगाया करता है।। 

उसने कहीं सुन रखा है,  हरि है हजार हाथ वाला, इसलिए अपनी नानी बाई के मायरे के वक्त भी वह हाथ पांव नहीं मारता। बस सब कुछ सांवरिया सेठ के भरोसे छोड़ देता है। मरता क्या न करता। ठाकुर जी को भाई बनकर आना पड़ता है और अपने भक्त की लाज बचानी पड़ती है।

डाकोर जी के नरसिंह भगत हों अथवा बंगाल के चैतन्य महाप्रभु, आज से पांच सौ वर्ष पूर्व ना केवल गुजरात, अपितु महाराष्ट्र में भी इन संतों का बोलबाला था। संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव,  जना बाई और स्वामी समर्थ तो ठीक, शिरडी के साई बाबा के यहां तो आज भी भक्तों का दरबार लगा रहता है। चमत्कार को नमस्कार ही आगे चलकर आस्था को अंध विश्वास में बदल देता है और संतत्व ढोंग और पाखंड में तब्दील हो जाता है।

आशाराम,  निर्मल बाबा से होता हुआ यह साहित्य के चेतन भगत और राजनीति के बगुला भगत तक जगह बना लेता है।। 

जहां भक्त है, वहां भगवान है।

या जहां भगवान है, वहां भक्त है। कलयुग में पैसा ही भगवान है। भक्ति की सारी शक्ति कलयुग में सत्ता में समा जाती है। हम भारतीय अपने भक्ति के संस्कार नहीं छोड़ते। हमने अपने अपने इष्ट और भगवान बना रखे हैं। अगर वे प्रसन्न,   तो हम प्रसन्न। भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई। चेतन भगत हैं हम।

सच्चे संत और भक्त को संसार की चाह नहीं होती। संसार उसकी परीक्षा पर परीक्षा लिया करता है। मीरा को विष का प्याला भेजा जाता है, वह विष भी अमृत हो जाता है और एक आज के संत हैं जिन्हें फूड पॉइजनिंग हो जाता है। कोई राष्ट्र संत आत्म हत्या कर लेता है तो कोई आशाराम जेल चला जाता है। न नर, न सिंह, न भगत न भगवान, आज केवल एक इंसान ही मिल जाए किसी के अंदर, तो वहीं कृष्ण की राधा है, वहीं कृष्ण की मीरा है, वहीं चैतन्य महाप्रभु और वहीं नरसिंह भगत है।। 

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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