श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “| प्र कृ ति | “।)
अभी अभी # ८८१ ⇒ आलेख – | प्र कृ ति |
श्री प्रदीप शर्मा
* N A T U R E *
जो कृति है और प्रकट है, वह प्रकृति है। प्रकट है, क्योंकि दिखाई देती है, और किसी अदृश्य, अप्रकट द्वारा अभिव्यक्त (manifest) की गई है। वैसे प्रकृति जितनी प्रकट है, उतनी ही अप्रकट और आकस्मिक भी।
प्रकृति जड़ भी है और चेतन भी,
शाश्वत भी और अस्थिर भी।
मनुष्य की भी अपनी प्रकृति है, वह भी जितनी प्रकट है उतनी ही अप्रकट भी। प्रकृति का भी नेचर है और हमारा भी नेचर। जिस तरह मौसम खराब होता है, हमारा भी मूड खराब होता है। प्रकृति में कहीं जलजला तो कहीं ज्वालामुखी। इंसान में भी कोई सूरजमुखी तो कोई ज्वालामुखी। कितनी समानता है हममें और प्रकृति में। हम दोनों का नेचर कितना मिलता है।।
प्रकृति का अपना स्वभाव है और हमारा अपना। प्रकृति अगर अपना स्वभाव बदल ले, तो आसमान टूट पड़े, सूरज बिना नागा, सुबह शाम अपनी ड्यूटी बजाता है, लेकिन अपनी जगह से हिलडुल भी नहीं सकता। सब जानते हैं वह आग का गोला है। आपके पास जो आएगा, वो जल जाएगा। ठंड कितनी भी हो, अलाव से थोड़ी दूरी, बहुत जरूरी है।
जिन पांच तत्वों से यह प्रकृति बनी है, उन्हीं पांच तत्वों से हमारा यह पंच महाभूत शरीर बना है।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। पांच तत्व हैं तो प्रकृति है, पुरुष है। महाप्राण ही महापुरुष है, वह और प्रकृति एक है। अगर प्रकृति में वह प्राण तत्व मौजूद नहीं होता, तो हम सांस ही नहीं ले पाते। उस दौर से भी हम अभी अभी गुजर चुके हैं। हमने ही प्रकृति के साथ छेड़खानी की, प्रकृति ने नहीं।।
प्रकृति की लीला का विस्तार भी होता है और प्रकृति अपने आपको समेट भी लेती है। जिस तरह जन्म है तो मृत्यु, उसी तरह प्रकृति में अगर प्रलय है तो पुनरूदय भी, और पुनर्निर्माण भी। बनाकर मिटाना, और मिटाकर बनाना, ही है उसका दस्तूर पुराना। कोई तो है सर्वशक्तिमान ! मान या ना मान।
नदियां ना पीयें अपना जल, वृक्ष ना खायें कभी अपना फल। लेकिन बेचारे इंसान की प्रकृति देखो, उसे इसी प्रकृति का जल भी पीना है और फल भी खाना है। वह प्रकृति का ही नमक खाकर प्रकृति पर अपना हुक्म चलाना चाहता है। पानी में चलना चाहता है, हवा में उड़ना चाहता है। मछली नहीं बन पाया, तो जहाज बना लिया। पंछी की तरह हवा में नहीं उड़ पाया, तो हवाई जहाज बना लिया।।
ज्ञान अगर सनातन है, तो विज्ञान खोज और आविष्कार। हम अपने स्वर्णिम अतीत में जा नहीं सकते। अभी तक किसी टाइटन कंपनी ने टाइम मशीन नहीं निकाली। नवग्रह के प्रताप के आगे नतमस्तक हो, हम चांद पर भी उतर आए और शायद मंगल पर भी कॉलोनी बसा लें। हम शक्तियों से डरते भी हैं और उनका आव्हान भी करते हैं। प्रकृति पर हमारा विश्वास भी है और अंध विश्वास भी।
नये वाहन को मंदिर ले जाना, यात्राओं के पहले नारियल फोड़ना, वास्तु शांति और ग्रह शांति, यज्ञ, हवन पूजा, कथा कीर्तन और व्रत उपवास करते हुए भी हमारे वैज्ञानिक शोध और आविष्कार में सक्रिय बने हुए हैं। अपने स्वभाव और प्रकृति के कानूनों के बीच सामंजस्य स्थापित करना ही समय से समझौता करना है।।
हम पर हमारा स्वभाव हावी ना हो, हम जितना प्रकृति से लें, हाथ जोड़कर लें, और तेरा तुझको अर्पण करते हुए उसकी चीजें वापस उसे ही लौटा दें। आप सिर्फ प्रकृति का दोहन कर सकते हैं, शोषण नहीं। प्रकृति हमारी वत्सला मां है, जो हमें पाल पोसकर बड़ा कर रही है। बड़ा होकर हमें उसका ही खेत जोतना है, फसल उगानी है, कुएं की रेहट के पानी से जमीन को सींचना है। वृक्ष उगाना है। फिर से घी दूध की नदियां बहाना है।
हमारे अंदर भी प्रकृति, बाहर भी प्रकृति, दोनों के अपने अपने स्वभाव, Love thy neighbour ही नहीं, Love thy nature.
प्रकृति को प्यार करें, अपने मूल स्वरूप को प्यार करें। मौसम तो बदलता ही रहता है और हमारा मिजाज भी। कल भले ही सूरज नहीं निकला हो, आज फिर मौसम आशिकाना है।
ये कौन चित्रकार है ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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