श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूल और कांटे।)

?अभी अभी # ८९९ ⇒ आलेख – फूल और कांटे ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हमारी इस पृथ्वी पर अगर दो तिहाई जल है, तो इसके गर्भ में ज्वालामुखी भी है। कांटों और फूलों का भी चोली दामन का साथ है। फूल नाजुक होते हैं, खुशबूदार होते हैं, लेकिन समय के साथ मुरझा जाते हैं, लेकिन कांटे, बचपन में भले ही नर्म और नाजुक मिजाज़ हों, समय के साथ सख्त और नुकीले होते जाते हैं। उन्होंने शायद डार्विन को पढ़ लिया हो, सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट।

हम जब बद्रीनाथ जाते हैं, तो रास्ते में एक स्थान गोविंदघाट आता है, जहां से एक रास्ता अगर फूलों की घाटी की ओर जाता है तो दूसरा हेमकुंड साहेब ! फूलों की घाटी तक पहुंचने का रास्ता भले ही कांटों भरा ना हो, लेकिन कठिन बहुत है। लगता है फूल अपने आपको कांटों से ही नहीं, इंसानों से भी बचाना चाहते हैं। लेकिन बेचारे कांटे कहां फूलों को नुकसान पहुंचाते हैं। गुलाब के फूल के साथ कांटे तो मुफ्त में ही चले आते हैं। कांटों से हमें शिकायत है, किसी फूल को नहीं।।

मध्यप्रदेश में रतलाम के पास एक सैलाना एस्टेट है, जहां सैलाना पैलेस में ही एक कैक्टस गार्डन है। फूलों से दोस्ती है, कांटों से यारी है, ऐसी मज़े की यारों जिंदगानी हमारी है। हमारी प्रकृति भी बड़ी विचित्र है। कैक्टस प्रजाति के पौधे भले ही कांटेदार हों, इनमें भी फूल खिलते हैं। फूलों की घाटी और सैलाना गार्डन फूल और कांटों का विचित्र समागम है।

प्यार करता जा ! कांटों में भी फूल खिला। लेकिन कंकरीले और कांटों भरे रास्तों पर तो हमको संभलकर ही चलना पड़ता है। जब कोई कांटा पांव में लगता है, तो उसे निकालना भी पड़ता है। हम कांटे से ही कांटा निकालते हैं और डाइनिंग टेबल पर खाना भी छुरी कांटे से ही खाते हैं।।

हमें कांटों से भले ही बैर हो, कांटों में उगे बेर हम प्रेम से खाते हैं। बेर कांटों में ही क्यों उगते हैं, गुलाब कांटों में ही क्यों खिलता है, लगता है संघर्ष और मेहनत का फल ही मीठा होता है। कांटे भरे रास्तों से होकर ही सफलता की मंजिल हासिल होती है।

फूल अगर प्रेम का प्रतीक है तो कांटे बैर का। पुरुष गुलाब अगर अपनी शेरवानी में लगाते हैं तो परंपरागत महिलाएं फूलों के आभूषण धारण करती हैं, बालों में फूल को जूड़ा भी कहते हैं। कजरा और गजरा क्या होता है, एक जूडो कराटे वाला इंसान क्या जाने।।

हमें भी फूलों से ही प्यार है। हम क्यों व्यर्थ कांटों में उलझें। हमारे आदर्श कितने भी उच्च हों, मध्यम मार्ग पर चलते रहें, कभी संसारी, कभी व्यवहारिक और कभी टोटल प्रैक्टिकल ! हमें फूलों की सेज पर सोना है, कांटों की सेज अथवा भीष्म पितामह की शर शैय्या पर नहीं। हम क्यों किसी की बैरी के बेर तोड़ने के चक्कर में अपने दामन को कांटों में उलझा लें। बाजार से दस रुपए में बेर क्यों न खरीद लें, जिन्हें साहिर ने मेवा गरीबों का कहा है।

किसी से बैर ना पालें। लेकिन अगर हमारे सजनवा ही बैरी हो जाएं तो क्या करें। कांटों को पैर तक ही रखें, उलझने पर उसे निकालकर फैंका जा सकता है, लेकिन कांटे को कभी सीने से ना लगाएं और ना ही कांटों पर चलकर इतने सफल हो जाएं, कि दुनिया आपको फूलों की जगह कांटों का ही ताज पहना दे। बस किसी के रास्ते का कभी कांटा ना बनें। बहुत कांटों भरी जिंदगी जी रहे हैं लोग यहां, किसी के पांव का कांटा निकालने में, हो सके तो मदद करें। स्वयं फूल से कोमल बनें।।

एक प्रार्थना ही काफी है, जिसे मैं अक्सर दोहराते रहता हूं ;

तेरे फूलों से भी प्यार

तेरे कांटों से भी प्यार।

जो भी देना चाहे दे दे करतार

दुनिया के पालनहार।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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