श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण…“।)
अभी अभी # ९१० ⇒ आलेख – शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण
श्री प्रदीप शर्मा
शिलान्यास उसे कहते हैं, जब किसी भी निर्माण के पहले एक शिला पर किसी गणमान्य व्यक्ति का नाम अंकित होता है, तिथि और तारीख के साथ। इससे एक संकेत ज़रूर हो जाता है, कि यहाँ निर्माण अवश्य होगा। शिलान्यास कोई साधारण व्यक्ति का, आम भूमि-पूजन नहीं होता, एक असाधारण घटना होती है, जिसकी खबर अखबारों तक में स्थान पा जाती है। शिलान्यास, विकास का प्रथम सोपान है।
शिलान्यास और निर्माण के बीच कई प्रशासनिक बदलाव आ जाते हैं, मंत्री, अफसर, यहाँ तक कि ठेकेदार भी बदल जाते हैं। फिर भी कभी द्रुत गति से तो कभी कछुए की चाल से, निर्माण कार्य का शुभारंभ हो ही जाता है। सरकारी बजट और ठेकेदार के बजट के सहारे विकास की इमारत बुलंद हो, उद्घाटन के लिए तैयार हो ही जाती है।।
बड़े काम के लिए बड़े व्यक्तियों को ही याद किया जाता है। मज़दूर का पसीना बह चुका, जितना पैसा बहना था, बह चुका, अब जनता की चीज़ जनता को समर्पित होना है, जो किसी प्रमुख सेवक का फर्ज बनता है कि वह फीता काटकर, उद्घाटन की औपचारिकता पूरी करे।
उद्घाटन और लोकार्पण में वही अंतर है जो हार फूल से स्वागत, और माल्यार्पण में है। इसे लोकतंत्र की भाषा में तेरा तुझको अर्पण कहते हैं। लोकहित में जो भी विकास अथवा महत निर्माण कार्य होता है, उसका लोकार्पण भी कोई विकास पुरुष ही करता है।।
ये सभी कार्य एक आम आदमी, मज़दूर अथवा समाज के किसी गणमान्य व्यक्ति से भी करवाए जा सकते हैं, लेकिन राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री के रहते यह कार्य किसी और से कैसे करवाया जा सकता है। कुछ परम्पराएं हैं, मान्यताएँ हैं, भाषण देने की, सरकार की नीतियों की व्याख्या करने की, जो न तो एक आदमी समझ सकता है, न अपने शब्दों में व्यक्त कर सकता है। राजनैतिक सूझबूझ का तकाजा है कि सामान्य व्यक्ति पर यह भारी भरकम ज़िम्मेदारी न सौंपी जाए।
बड़ा कष्ट होता है जब हमारे प्रधान सेवक इन महत्वपूर्ण कार्यों के सम्पादन के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक चंद घंटों में पहुँच कर अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते हैं। खून-पसीना एक होता है, तब जाकर एक लोकार्पण सम्पन्न होता है। यह कोई बच्चों का खेल नहीं कि एक फीता काटा, और खेल खतम।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





