श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वाइन और अजवाइन…“।)
अभी अभी # ९१२ ⇒ आलेख – वाइन और अजवाइन
श्री प्रदीप शर्मा
आप चाहें इसे स्वदेशी और विदेशी इलाज कहें, औषधि और शराब कहें, अथवा दवा दारू कहें, एक ही बात है। बीमार होने पर दवा दारू तो सभी को लेनी पड़ती है। यह अलग बात है, कुछ लोग दवा से ठीक हो जाते हैं तो कुछ लोग दारू पीकर बीमार। वाइन किसी के लिए दवा है और किसी के लिए दारू। एलोपैथी में सभी बीमारियों का हल, कम अल्कोहल।
आपने छोटे बच्चों को देखा होगा। उन्हें तो चम्मच से दवा भी पिलाना मुश्किल हो जाता है। वे दवा के नाम से ही इतने डरे हुए होते हैं, मानो कोई उनके मुंह में जबर्दस्ती शराब की कुछ बूंदें डाल उन्हें बिगाड़ रहा है। उनकी नाक बंद कर, रोते हुए उनके मुंह में दवा का घूंट पहुंचाया जाता है। भले ही बड़ा होकर वह पूरी बोतल डकार जाए।।
अगर आप वाइन को शराब कहेंगे तो हम अजवाइन को औषधि कहेंगे। आपके दर्द की दवा अगर वाइन है तो हमारे पेट दर्द की दवा अजवाइन है। यह अगर सच है कि हमारी सरकार आपके लिए देशी और विदशी शराब की दुकानें खुलवाती हैं, तो इससे बड़ा सच यह है कि हमारी अजवाइन नमक की तरह, हर किराने की दुकान पर आसानी से उपलब्ध है।
यह दवा ही नहीं, हमारे रसोई घर की मसालदानी का श्रृंगार भी है।
एक फिल्म अमर प्रेम आई थी, जिसमें कॉमेडियन ओमप्रकाश पानी पूरी में पानी की जगह पताशे में शराब भरकर पीते थे। हम लोग बेसन के पकौड़ों में अजवाइन का प्रयोग करते हैं। वाइन का कोई पौधा नहीं होता, अजवाइन का होता है। कौन सुबह सुबह मुंह कड़वा करे, हम तो अजवाइन से मुखशुद्धि करते हैं। मुंह भी साफ और पेट भी साफ।।
दवा के रूप में अजवाइन उपलब्ध है मगर फिर भी इंसान वाइन के पीछे भागता है। एक ओर वाइन के विज्ञापन पर विदेशी और देशी कंपनियां इतना खर्च करती है, सरकार शराब के ठेकों से रेवेन्यू कमाती है और दूसरी ओर हमारी अजवाइन पूरी तरह स्वदेशी और आत्म निर्भर है। हमारी अजवाइन की सरकार सिर्फ दादी मां के अचूक नुस्खों पर ही चल रही है।
वाइन कड़वी होती है, लेकिन अजवाइन इतनी कड़वी भी नहीं होती। सुनते हैं, वाइन में नशा होता है। याद आते हैं वे दिन, जब मां के हाथ के मोटे मोटे गद्दे और गड्ढों वाले अजवाइन के घी वाले गर्मागर्म पराठों के साथ कभी घर का निकाला मक्खन तो कभी दही और सर्दियों में जब चाय का प्याला साथ आता था, तो वह नशा अजवाइन का था, या मां के हाथ का, कुछ पता ही नहीं चलता था।
आज मां की जगह हाथ किसी का भी हो, अजवाइन का स्वाद और नशा वही है।
जहां अजवाइन के साथ मां की याद भी जुड़ी हो, वहां सेहत ही सेहत है, स्वाद ही स्वाद है, नशा ही नशा है। मेरी हमेशा की हमसफर, डिवाइन अजवाइन।
बड़ा अच्छा लगता है, जब वाइन एंड डाइन फूड रेस्तरां से निकलते वक्त काउंटर पर, ट्रे में रखी सिकी सौंफ, दालचीनी, तिल्ली और अजवाइन पर, ग्राहकों को संतुष्टि से, हाथ मारते देखता हूं। वाइन है जहां, अजवाइन भी है वहां।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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