श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नैना बरसे…“।)
अभी अभी # ९१७ ⇒ आलेख – नैना बरसे
श्री प्रदीप शर्मा
कभी रंग बरसे, तो कभी रैना बरसे ! बरसों से यही होता चला आ रहा है। जब हम और प्रकृति एक रूप हो जाते हैं तो बारिश और बसंत एक साथ प्रकट हो जाते हैं। यह बसंत भी कुछ ऐसा ही निकला। सूरज भी निकला, और हाय गज़ब, कहीं तारा, इस बार तो आसमान ही टूटा।
हम होश कब संभालते हैं, पता नहीं, लेकिन पैदा होते ही हमारी स्वर लहरियां रोने और किलकारियों के रूप में वातावरण में गूंजने लगती है। लड़का अथवा लड़की ! मुलगा किंवा मुलगी। लता, या रफी ?
जो भी हो, मर्फी रेडियो का प्यारे से बच्चे का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। रेडियो के सामने आज भी मैं एक बच्चा ही हूं।
उसी की सुनता हूं। उसके साथ ही गाता मुस्कुराता, जीता जागता, कभी खुशी, तो कभी गम के तराने गुनगुनाता हूं।।
ईश्वर ने मुझे दो कान दिए, दो आंखें दीं, और एक मुंह दिया। अपने मुंह से अपनी क्या तारीफ करूं, लेकिन मैं तानसेन भले ही ना सही, कानसेन जरूर हूं। मेरे दोनों कान पिछले ६०-६५ वर्षों से रफी और लता के नगमे सुन सुनकर ही परिपक्व हुए हैं। दोनों कानों के मार्ग एकांगी हैं। एक कान से लता जी के गीत प्रवेश करते हैं तो दूसरे कान से रफी साहब के। वैसे तो यह ट्रैफिक आम है। लेकिन रफी लता के लिए खास है। अंदर संगीत का फ्यूजन होता है और जब मैं अकेला होता हूं, मुंह से बस लता रफी के नगमे ही निकलते हैं। बस फर्क इतना होता है, कभी लता के साथ मकेश और कुशोरकुमार भी होते हैं तो रफी साहब के साथ आशा, सुमन, सुरैया, शमशाद के साथ अन्य गायक गायिकाएं भी।
मेरे नैना सावन भादो आज से नहीं, सन् १९८० से ही हो चले थे, जब हमने रफी साहब को खोया था। उनकी आवाज तो हमारे साथ थी ही, लेकिन जीवन लता अभी नहीं मुरझाई थी। लता का सहारा हम सभी संगीत प्रेमियों के लिए एक वटवृक्ष की छाया थी, जिसमें शांति थी, सुकून था, संगीत था, अध्यात्म था, द्वैत और अद्वैत एक साथ था।।
मेरे लिए लता रफी को सुनना मनोरंजन नहीं, इबादत रही है। क्योंकि इनको सुनते वक्त या तो मेरी आंखें बंद रहती हैं, या फिर मेरे कान इनके नगमों के लिए खुले रहते हैं। और होंठों तक आकर, वे तराने कब तैरने लग जाते हैं, कुछ पता ही नहीं चलता।
गीत और संगीत की इस महफिल में पूरा गंधर्व लोक इस धरती पर उतर आया था। कितने गायक, गीतकार और संगीतकारों का यह कमाल, यह करिश्मा होगा जो आज हमारे फिल्मी और सुगम संगीत की धरोहर है। सहगल और नूरजहां से शुरू हुए इस सफर की दास्तान बहुत लंबी है। यकीन नहीं होता, हमारी लता की गहराइयों और ऊंचाइयों का। हमने बड़े प्रेम से और मनोयोग से इस लता को हमारे मन में सींचा है। अब लता का साम्राज्य हमारे दिलों पर है। अब तो बेलि फैल गई, आणंद फल होई।।
कभी मदन मोहन, कभी नौशाद तो कभी सलिल चौधरी और सी.रामचंद्र।
शंकर जयकिशन की बरसात से लक्ष्मी प्यारे के आन मिलो सजना तक भी रफी लता का यह सफर थमा नहीं। इस लता के सुर ने कितनों को थामा है, कितनों को राह बताई है, है कोई ऐसा पत्थर दिल, जिसकी आंख लता के नगमों ने नहीं भिगोई है।
आज दो चार नहीं, जितने आंसू बहें, बहने दो। याद करें तलत लता को, मुकेश लता को, हेमंत लता को, मन्ना दा और लता को, पंडित भीमसेन जोशी और लता को, जगजीत और लता को। बस इतना ही कह सकते हैं।
दिल का खिलौना हाय टूट गया।
कोई लुटेरा आके लूट गया।
नैना बरसे, रिमझिम, रिमझिम।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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