श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उधार प्रेम की कैंची है !।)

?अभी अभी # ९३५ ⇒ आलेख – उधार प्रेम की कैंची है ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

आज नक़द, कल उधार और उधार प्रेम की कैंची है, लिखने वाले दुकानदार, कितना नकद से प्रेम करते हैं, और कितना भगवान समान ग्राहक से, यह छुपा नहीं है ! मैंने हमेशा नक़द ही सौदा लिया है, लेकिन किसी दुकानदार ने प्रेम के वशीभूत हो, मुझे गले नहीं लगाया। ऐसा कई बार हुआ है कि मैं नकद पैसे लिए, सौदे के लिए खड़ा रहा, और एक बहनजी उधारी का सामान और अपने सुंदर से बच्चे के लिए मुफ़्त में एक्लेयर्स ले, रवाना हो गई और दुकानदार मेरी उपेक्षा करते हुए उधारी के सामान को डायरी में नोट करता रहा। बाबूजी ! उधारी का मामला है, बाद में भूल जाता हूँ। यानी उधार की कैंची मुझ पर, और प्रेम बहनजी के लाड़ले पर।

यूँ तो नकद का मतलब रोकड़ा ही होता है, लेकिन जब से नोटबन्दी के पश्चात कैशलेस का चक्कर चला है, सरकारी भीम और paytm, कैश काउंटर पर विराजमान हो गए हैं। न सड़े गले, फटे-टूटे नकली नोटों की चिंता, न चोर-डाकुओं का डर ! रात को कैश घर ले जाते समय का खतरा, और घर पर भी भारी भरकम नकदी रखने के खतरे से तो बचे ही, ग्राहक को भी डिस्काउंट का फ़ायदा। हुआ न एक पंथ दस काज।।

लेकिन जब कोई दोस्त या रिश्तेदार उधार माँगता है तो वह यह नहीं कहता कि भैया मेरे खाते में हज़ार-पांच सौ जमा कर देना। बाकायदा भाव-ताव होता है। पाँच हज़ार की माँग नीचे आते आते पाँच सौ तक आ जाती है और वह आप पर एक तरह से अहसान जताता हुआ, उक्त राशि स्वीकार कर ही लेता है। मुझे मालूम था, आप इससे ज़्यादा नहीं दे पाओगे। अब किसी और के आगे हाथ पसारने पड़ेंगे।

मैंने किसी बैंक में उधार प्रेम की कैंची है, जैसी तख्ती लगी नहीं देखी ! आकर्षक दरों पर ऋण लीजिये के अंतर्गत, अगर बीवी को छोड़ दिया जाए, तो घर की हर चल, अचल सम्पत्ति पर प्रेम से उधार मिल सकता है। घर से लगाकर फ्रिज, टीवी, गीज़र, फर्नीचर और मोबाइल से ऑटो-मोबाइल तक ! पत्नी चल सम्पत्ति है या अचल, यह तो अटलजी भी नहीं जान पाए।।

कैंची से कपड़े कटते हैं, पार्लर में बाल कटते हैं, जिनकी ज़बान कैंची जैसी चलती है, वे सामने वाले की बात तक काट देते हैं, लेकिन उधार एक ऐसी कैंची है जो प्रेम के रिश्ते को काटती है।

पैसा रिश्ते को जोड़ता है, फिर चाहे वह नकद का हो, या उधारी का। कहने वालों का क्या, वे तो दहेज को भी प्रेम की कैंची कहने लग गए। अंगूर खट्टे हों, तो आदर्शवाद बुरा नहीं।

मैं न उधार देता हूँ, न लेता हूँ। फिर भी माथे पर इतना कर्ज़ है कि कितने ही जन्म ले लूँ, उतार नहीं पाऊँगा। माटी का कर्ज़, माता पिता, गुरुजन, समाज, परिजन, हितैषी और सद्गुरु के ऋण से कौन उऋण हो पाया है। यह ऋण उधार नहीं, प्रेम की कैंची नहीं, प्रेम का सागर है। लेकिन हमारी मज़बूरी यही कि हमारे पास सिर्फ़ एक गागर है।

प्रेम की यह गागर कभी खाली न हो। प्रेम के रिश्तों को भुनाया नहीं जाता, और अधिक मजबूत किया जाता है। किसी पर अहसान जताया नहीं जाता, अहसान चुकाया जाता है। उस ऊपर वाले के ही इतने कर्ज़ हैं, इतने अहसान हैं, लेकिन वह कोई साहूकार नहीं, सिर्फ मेहरबान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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