श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चाय, चखना – चबैना…“।)
अभी अभी # ९३९ ⇒ आलेख – चाय, चखना – चबैना
श्री प्रदीप शर्मा
चखना और चबैना में वही अंतर है, जो सिर्फ चाय और चाय पानी में है। हम जब सिर्फ चाय की बात करते हैं, तो साथ में पानी मुफ्त होता है। लेकिन बात जब चाय पानी की होती है तो उसका मतलब सिर्फ चाय और पानी नहीं होता।
प्यास लगने पर जब किसी से एक ग्लास ठंडा पानी मांगा जाता है, तो केवल जल ही पेश किया जाता है, गुलाब जल नहीं, लेकिन जब किसी मेहमान को एक कप चाय की प्याली पेश की जाती है, तो एक ग्लास पानी सहज रूप से साथ चला आता है।।
लेकिन चाय पानी की तो बात ही निराली है। बेटा, बहुत दिनों बाद अंकल आए हैं, कुछ चाय पानी का इंतजाम करो। अब मामला सिर्फ चाय और पानी का नहीं, कुछ और का भी है बिस्किट, नमकीन, गर्मागर्म पकौड़े अथवा फल फ्रूट, सभी चाय पानी में परिभाषित हो जाते हैं। यानी अच्छा भला चाय नाश्ता हो जाता है।
यह तो हुआ चाय पानी का शाब्दिक और सात्विक अर्थ ! कलयुग में चाय पानी का एक अर्थ और होता है, जहां सेवा मुफ्त उपलब्ध नहीं होती, वहां चाय पानी का अर्थ साधारण नहीं रह जाता।
वहां चाय पानी का अर्थ मुट्ठी गर्म करना भी हो सकता है। हप्पू सिंह की भाषा में आप इसे न्यौछावर भी कह सकते हैं। कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी। यहां सभी काम हो सकता है, बशर्ते, हो जाए चाय पानी।।
लेकिन बात तो चखना और चबैना की हो रही थी चाय और चाय पानी की नहीं ! हम भी अजीब हैं।
आप अंगूर चखकर खरीद सकते हो, लेकिन चना तो चखकर नहीं लिया जा सकता। चखने से भी कहीं पेट भरा है। भूख लगने पर तो चना चबैना भी छप्पन भोग का ही काम करता है।
चखने का काम अमीरों का है, शौकीनों का है। एक बेचारा गरीब मेहनतकश इंसान क्या खाएगा और क्या चखेगा। वह तो रूखी सूखी खाकर, ठंडा पानी पीकर संतुष्ट हो जाता है लेकिन अमीर तो खरीदने के पहले हर चीज चखेंगे, नाक भौं सिकोड़ेंगे,
बहुत मीठा है, no no, it’s too oily and spicy.केवल चखने से ही उनकी हेल्थ और हाइजीन पर असर पड़ता है, खाने की तो बात ही छोड़िए।।
हम चबैने का और अन्न, रोटी का तो ख़ैर, सम्मान करते हैं, लेकिन चखने के तौर तरीकों के बारे में जरूर दो चार बातें करना पसंद करेंगे, क्योंकि दो शब्द चखने के लिए काफी नहीं होते।
जो मजा चखने में है, उससे अधिक मजा किसी को मज़ा चखाने में है। दुनिया में ऐसी कई चीजें हैं, जिन्हें अगर सिर्फ मुंह लगाओ, तो गले ही पड़ जाती हैं, फिर चाहे वह गुटखा ही क्यों न हो।।
खुशी के मौके पर किसी का मुंह मीठा कराना हमारी संस्कृति है, परंपरा है ! क्या किसी का स्वागत मुंह कड़वा करके किया जा सकता है। लेकिन गालिब ने जिसे शराब कहा है, वह तो कड़वी है, और देखो तो किस किसके मुंह लगी है।
यह एक ऐसी कड़वी दवा है जिसके पीने के बाद, मुंह का स्वाद ठीक करने के लिए कुछ चखना पड़ता है। नमकीन मूंगफली से काजू बादाम तक यह चखने की रेंज होती है।
पहले पीने का मज़ा और बाद में चखने का मज़ा। लिपटन और ब्रुक बॉन्ड चाय को टाटा और चाय पानी की नानी, पहले पीना और फिर चखना, कल की किंगफिशर, तेरी यही कहानी।।
कोशिश करें, चाय पानी और चबैने से ही काम चलाएं, क्यों कुछ कड़वी चखने के चक्कर में, लोहे के चने चबाएं। अगर कुछ चखना ही हो, पूरे परिवार और बाल बच्चों को सराफा या छप्पन ले जाएं। क्यों न कुछ मीठा चखें, कुछ नमकीन खाएं। हमें भी साथ ले जाएं, जब कभी इंदौर आएं ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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