श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अशोक अर्जुन।)

?अभी अभी # ९४६ ⇒ आलेख – अशोक अर्जुन ? श्री प्रदीप शर्मा ?

आज हम करन अर्जुन की नहीं, अशोक और अर्जुन की बात करेंगे। हमारे अशोक भी कोई साधारण पुरुष नहीं, मौर्य वंश के सम्राट अशोक हैं। कर्ण और अर्जुन तो समकालीन थे, दोनों कुन्ती पुत्र और भाई भाई थे, लेकिन कर्ण सूत पुत्र कहलाया।

कर्ण और अर्जुन की कथा में बहुत अगर मगर हैं। अगर कर्ण और अर्जुन दोनों भाई एक हो जाते, तो शायद महाभारत ही नहीं होती। कर्ण श्रीकृष्ण की शरण में नहीं गया, उसने दुर्योधन की मित्रता में अपना सम्मान ढूंढा। अपमान और उपेक्षा अवसाद को जन्म देता है।

भले ही नियति ने कर्ण के साथ न्याय नहीं किया हो, उसके बल, पराक्रम और दानशीलता का लोहा सबने माना और वही कर्ण शिवाजी सावंत के उपन्यास मृत्युञ्जय का मुख्य पात्र बना।।

भाई भाई तो खैर रावण और विभीषण भी थे। विभीषण भी जब अपने भाई से अपमानित हुए तो उनमें विषाद जागा, और वे प्रभु राम की शरण में गए।

होइहि वही जो राम रचि राखा। अतः यहां ज्यादा अगर मगर नहीं चलता।

लेकिन विभीषण के चरित्र पर कोई उपन्यास नहीं, और आचार्य चतुर सेन ने रावण के चरित्र पर वयं रक्षाम: लिख मारा। इतिहास जितना महत्व नायक को देता है, उतना खलनायकों को भी देता है।

श्रीकृष्ण की शरण में अर्जुन पूरी तरह तब गया जब कुरुक्षेत्र में उसका विषाद दूर हुआ और उसने लड़ने के लिए शस्त्र उठा लिए। अवसाद और विषाद में यही तो अंतर है। अवसाद और उपेक्षा कर्ण को दुर्योधन की ओर खींच ले जाता है, जब कि विषाद विरक्ति, वैराग्य उत्पन्न करता है तथा जो विभीषण को शरणागति की अवस्था में ले आता है।।

आइए अब हम अर्जुन से सम्राट अशोक की ओर रुख करें। दोनों ओर युद्ध है। अर्जुन के विषाद योग से ही श्री भगवद्गीता आरंभ होती है। श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन के पश्चात् ही अर्जुन का मोहभंग होता है और वह धर्म की रक्षा के लिए कुरुक्षेत्र में शस्त्र उठा लेता है और धर्म की विजय होती है।

उधर कलिंग विजय के पश्चात् विजयोन्माद की जगह विजयी सम्राट अशोक को युद्ध की हिंसा और खून खराबे के कारण वही विरक्ति और विषाद उत्पन्न होता है जो अर्जुन को शस्त्र त्यागने के पश्चात् हुआ था, और विजयी अशोक बुद्ध की शरण में चला जाता है। एक जगह श्रीकृष्ण: शरणम् मम: है तो एक जगह बुद्धं शरणं गच्छामि।।

अर्जुन और अशोक के साथ अगर एक और शरणागति विभीषण को और ले लिया जाए तो द्वापर, त्रेता और तीनों कालों का निचोड़ हमारे सामने मौजूद है। राम, कृष्ण, बुद्ध, और महावीर से चलकर हम गांधी तक पहुंच ही जाते हैं। गांधी के बाद जब हमें शून्य नजर आता है तो हम फिर सनातन की ओर लौट चलते हैं। आज हम पंचशील और अहिंसा का गुणगान नहीं करते, शास्त्र और शस्त्र दोनों की बात करते हैं।

एक मजबूत लोकतंत्र के आधार पर ही आज हम पुनः रामराज्य का सपना देख सकते हैं। आज हमारे पास कई चाणक्य मौजूद हैं, बस भीष्म पितामह और महात्मा विदुर की कमी है।

सकारात्मक सोच और सार्थक संवाद दशा और दिशा दोनों प्रशस्त करे, यही ईश्वर से प्रार्थना है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments