श्री सिमर सदोष
☆ आलेख ☆ “रानी झांसी जैसे नारी-वाद की सर्जक – डा. मुक्ता” ☆ श्री सिमर सदोष ☆
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डा. मुक्ता एक विदुषी लेखिका हैं। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी है। वह प्रतिभाशाली कवयित्री हैं। वह प्रसिद्ध कथा-लेखिका हैं। उनकी लघु-कथाओं में एक साथ, एक से अधिक संवेदनाओं की सरिताएं प्रवाहमान होते दिखाई देती हैं। इनकी कहानियों का सुर और स्वर भी अनेकानेक आयाम अपने साथ लिये चलते हैं। इनकी कहानियां सरपट नहीं चलतीं, खरामा-खरामा आगे बढ़ती हैं, और आगे बढ़ते जाने की इस यात्रा के दौरान पीछे से लाया गया कुछ यहां-वहां छोड़ती रहती हैं, और यहां का बहुत कुछ अपने अंग-संग लिये अगली मंज़िल की ओर सरक जाती हैं।
उन्होंने निबंध भी लिखे हैं। चिन्ता को चिन्तन का आवरण ओढ़ा कर डा. मुक्ता ने अपने इस निबंध संग्रह में मनुष्य को जीने का तरीका और सलीका तो सुझाया ही है, ज़िन्दगी सार्थकता को किस मुकाम पर हासिल किया जा सकता है, यह लब-ओ-लुबाब भी इस संग्रह का निष्कर्ष है।’ आधुनिक काव्य में प्रकृति’ डा. मुक्ता जी का आलोचना साहित्य है।
प्रकृति काव्य की प्रारम्भ से सहोदर रही है। कविता किसी भी काल-युग में लिखी गई हो, प्रकृति कदम-कदम और शाना-ब-शाना उसके साथ-साथ चली है। अपने दौर की कविता में प्रकृति के कदमों के निशानों और हाथों के स्पर्श को ढूंढने के प्रयत्नों का प्रतिरूप है यह संग्रह। डा. मुक्ता के आलोचनापरक स्वर और स्पर्श भी ऐसे हैं जैसे कोई यौवना किसी उपवन के फूलों को अपने मेहंदी-युक्त हाथों से हौले-हौले सहला रही हो।
डा. मुक्ता
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी
डा. मुक्ता ने अब तक नौ कविता संग्रह समाज की झोली में डाले हैं। इनमें एक ग़ज़ल संग्रह और एक मुक्तक संग्रह भी है। पांच लघुकथा संग्रह भी उनकी साहित्यिक निधि का हिस्सा हैं। एक कहानी संग्रह, एक निबन्ध संग्रह, एक आलोचना कृति भी उनके हिस्से में है। इनकी कविताओं में आस्था और भक्ति के साथ स्नेह के अनेक स्त्रोत बहते प्रतीत होते हैं। इनकी कविताओं का स्वर बूंद-बूंद श्रद्धा भाव के घट को भरते महसूस होता है। डा. मुक्ता का काव्य-स्वर मौन की समाधि के बाद उपजे ओम् के नाद जैसा है।
इसी प्रकार डा. मुक्ता की कहानियों और लघु कथाओं की सत्ता भी शब्द और स्वर की अनुभूतियों से परिपूर्ण है। इनकी लघुकथाओं से यथार्थ की उर्वरा भूमि पर कल्पना का बीज बोया गया है। इनकी लघुकथाएं पथिक की ज्ञान-क्षुधा को शांत करती हैं, तो आम जन की आकांक्षा की भूख भी मिटाती हैं। इनकी लघुकथाएं जितनी मैंने पढ़ी/जानी हैं- सतसैया के दोहरों जैसी हैं-आकार में छोटी किन्तु प्रहार में तीक्ष्ण। वे अपने होने का आभास तो देती हैं, परंतु अपनी सत्ता के मद का प्रदर्शन करने के लिए घाव नहीं देतीं। इनकी कथा-कहानी ज़िन्दगी में यथार्थ की उदात्त अभिव्यक्ति होती है। साधारण भाषा-शैली में लिखी गई इनकी कहानियां समर्पण भाव को अधिक तरजीह देती हैं।
बहुत भला लगता है, अक्सर… मध्य आकाश में जगे चांद की बीथियों में उस दादी नानी मां के अक्स की तलाश करना जो किसी एक कोने में बैठ सदियों से कात रही है चरखा। तब भी बहुत भला लगता है…. वसन्त से पहले प्रहर की उगती हुई स्वर्ण जैसी धूप के बालों में से, अपनी उंगलियों के पोरों से नर्म आभा की तलाश करना (‘अंजुरी भर धूप’ डा. मुक्ता का लघु कथा संग्रह है)।
गेहूं की हरितमा के बीच, सरसों के पत्तों पर से उतरती आती किसी बीर बहूटी के मखमली पांवों को अपनी हथेली पर रख, हल्की-हल्की गुदगुदी को महसूस करना किसे भला नहीं लगता। सच, एक ऐसा संगीत उभरता है तब जो रूह तक सुकून दे जाता है। दिसम्बर के पहले पक्ष की किसी अल-सुबह, किसी जंगल-बेले में आप-मुहारे उग आए किसी जंगली गुलाब की पत्ती पर फिसलते-फिसलते अटक गई ओस की किसी बूंद के भीतर सिमटे/दुबके आकाश के अस्तित्व को महसूस करने के लिए वैसी आंखें चाहिएं जैसी तूर के नूर को देखने के वक्त मूसा के पास थीं। संगीत के इस सुर को गीत के स्वर द्वारा छू लेने के बीच का सफ़र बेशक ख़ामोशियों के फूलों से सराबोर हो सकता है, लेकिन इन फूलों से सटी पत्तियों की सरसराहट की आवाज़ एक ऐसे वातावरण का सृजन करती है जिसमें ज़िन्दगी है, जिसमें सृष्टि है (‘ख़ामोशियों का सफ़र’ डा. मुक्ता का कहानी संग्रह है)।
शहरों की तारकोल से सनी स्याह सड़कों के कोलाहल की अपनी एक भिन्न भाषा होती है, एक भिन्न ज़िन्दगी होती है, जो बेशक आम जैसी होती है-वही शोर-गुल, वही चिल्ल-पों… चुप्पी और मौन भी एक-से होते हैं, परन्तु गांवों की पगडंडियों पर से सुबह की आगे बढ़ती बेला, और सायं को धुंधलके के बीच में उपजती गो-धूलि के समय, गाय-बैलों के गले में बंधे घुंघरुओं की आवाज़ से जो संगीत उपजता है, वह स्वर्गिक होता है, नैसर्गिक भी। कहते हैं, शब्द की सत्ता/शक्ति बन्दूक की गोली और तोप के बारूद से भी अधिक होती है। तोप और बन्दूक से शरीर की ताकत तो खत्म हो सकती है, परन्तु इतिहास गवाह है कि दुनिया का कोई बारूद शब्द की सत्ता को कभी चुनौती नहीं दे सका। दुनिया की तवारीख मानती है कि बन्दूकों ने तानाशाह तो बेशक खत्म किये, परन्तु तानाशाही तो हर युग/दौर में रही है, आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद है। धर्म के नाम पर लड़ी गई जंगों ने धर्म-गुरुओं के बलिदान तो लिये, परन्तु धर्म की भौतिक/अलौकिक सत्ता पहले से भी अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुई है। लफ्ज़ों की जुबां होती है, इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकतीं। लफ्ज़ जब जुबां खोलते हैं, तो अनेक वो सत्य भी रहस्योद्घाटित हो जाते हैं, जो सदियों से दबे / कुचले पड़े थे। ‘लफ्ज़ों ने जुबां खोली’ (ग़ज़ल संग्रह) की ग़ज़लें शब्द और उसके अर्थ की सत्ता का एक मुजस्समा होने जैसी हैं।
डा. मुक्ता का साहित्य नारीवादी न होकर नारी के भीतरी उजास का संवाहक है। इस साहित्य में नारी के उत्तेजक स्वभाव का प्रदर्शन नहीं तथापि इसमें नारी दोयम दर्जे की तो कदापि नहीं दिखी। डा. मुक्ता ने नारी को उसकी तमाम भीतरी/बाहरी योग्यताओं/क्षमताओं और उपलब्धियों के साथ चित्रित किया है, तथापि उन्होंने उसे बाज़ार की वस्तु के तौर पर दर्शाने से भी संकोच किया है। उनके साहित्य में नारी घर-परिवार और समाज की शोभा, उपयोगिता है, और नर-समाज की शक्ति है। डा. मुक्ता एक ओर नारी-चेतना का शंखनाद करती हैं, तो उसी स्वर में नारी की अस्मिता की रक्षा के लिए स्वयं नारी को काली, चंडी, दुर्गा का रूप धारण करने का आह्वान भी करती हैं। इनकी कविताएं नारी को जौहर का संदेश नहीं देतीं, अपितु झांसी की रानी बनने की प्रेरणा देती हैं।
डा. मुक्ता स्वयं भी बेहद सौम्या, सजग, उदार-मना एवं महामना नारी हैं। उच्च शिखर तक सम्मानित, अलंकृत और पुरस्कृत नारी डा. मुक्ता बहुत कम बोलती हैं, परन्तु जितना बोलती हैं, बड़ी मधुर वाणी से नपे-तुले शब्दों का उच्चारण करती हैं। वह नारी मन के भीतर उतर जाने का हुनर जानती हैं, यह उनकी कहानियों को पढ़ने से पता चल जाता है। वह नारी मन और प्रकृति-तत्व की कोमलता से भली प्रकार परिचित एवं अवगत हैं, यह उनकी कविताओं के मनन/ मन्थन से ज्ञात होता है। साहित्य के पानियों में बहुत गहरे उतरने की कला भी उन्हें आती है… तभी तो इतने सारे माणिक-मोतियों की माला उन्होंने मां सरस्वती/शारदे मां के लिए तैयार कर रखी है।
डा. मुक्ता का साहित्य बाज़ारवाद, उपभोक्तावादी संस्कृति और भौतिकतावाद की अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं बनता, तथापि वह मौजूदा दौर की ज़रूरतों को स्वीकार अवश्य करता है। डा. मुक्ता ने साहित्य के प्रत्येक पक्ष को बड़ी सुघढ़ता से छुआ है। इनकी कविताएं यदि किसी मैदानी नदी के पानी में उतरती-लांघती लहरों जैसी हैं, तो इनकी कहानी पहाड़ से उतरी किसी नदी की पहली जल-रेखा जैसी है जो उच्छृंखल भी नहीं, और आलस्य की जायी भी नहीं है। कुल मिला कर डा. मुक्ता द्वारा रचित सम्पूर्ण साहित्य अपने आप में एक सर्वांग, सम्पूर्ण और उपयोगी पक्ष जैसा है।
निःसंदेह, यह जो कुछ मैंने लिखा/कहा है, यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही सत्य है जैसे कि आकाश पर चांद का होना, जैसे कि किसी घने वन-प्रांतर में धूप का संवरना, और वह सत्य तथ्य यह है कि डा. मुक्ता साहित्यिक फलक का वह सितारा हैं जिसका प्रभा मंडल बहुत विशाल और व्यापक है। डा. मुक्ता कल्पना की धरा पर एक ऐसी धवल/स्वच्छ नदिया की भांति हैं जिसकी लहरों के आईने में से हर कोई अपनी भावनाओं की छवि देख सकता है।
डा. मुक्ता एक ऐसी लेखिका हैं, जो एक हाथ से समाज से कुछ ग्रहण करती हैं, तो दूसरे हाथ से समाज की विरासत पिटारी में ब्याज समेत लौटाना भी जानती हैं। डा. मुक्ता चिरजीवी हों, उनकी कलम सलामत रहे, उनकी विचार-ऊर्जा बनी रहे, उनकी कल्पना-शक्ति की उड़ान बुलंद रहे…. वह लिखती रहें, कहती रहें और सुनती भी रहें-उनके साहित्य से जुड़ा हर शख्स ऐसा अवश्य चाहेगा। आमीन !
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© श्री सिमर सदोष
समाचार सम्पादक, दैनिक अजीत समाचार, जालन्धर-144001
अध्यक्ष, पंजाब कला साहित्य अकादमी (रजि.)
मो. 094177-56262
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





