डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

(ई- अभिव्यक्ति में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ उमेश चंद्र शर्मा जी का स्वागत. आप एक वरिष्ठ लेखक, हिंदुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी एवं संवाद एजेंसी ईएमएस से संबद्ध है, तथा श्रीमद्भागवत कथा प्रवक्ता और साहित्यकार है.  हिंदुस्थान समाचार, ईएमएस, फ्री प्रेस जर्नल एवं हिंदी फ्री प्रेस में आलेख, फीचर एवं इंटरव्यू प्रकाशित, साप्ताहिक प्रभातकिरण में स्तंभ लेखन, कुछ कहानियां सहित शताधिक कविताओं एवं गीतों का स्वांत: सुखाय सृजन.आज प्रस्तुत है नव संवत्सर पर्व पर आपका एक ज्ञानवर्धक एवं विचारणीय आलेख – अरण्यपथ के गर्भ से ही जन्म लेता है संभावनाओं का महासागर।)

☆ आलेख – अरण्यपथ के गर्भ से ही जन्म लेता है संभावनाओं का महासागर ☆ डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा ☆

भारतीय संस्कृति के विभिन्न पर्वोत्सवों पर हमारी उत्सव धर्मिता की सहज अभिव्यक्ति होती आई है, साथ ही उत्सवी दिनों को पूरी जिंदादिली से मनाया जाता रहा है, और चूंकि हिंदू नव संवत्सर गुड़ी पड़वा हमारी गौरवमयी एवं समृद्ध सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व है, इसलिए इस पर्व पर स्वाभाविक रूप से हमारी उत्सव धर्मिता की शानदार अभिव्यक्ति हुई, जो कि सहज एवं स्वाभाविक है, ओर ऐसे रंगारंग उत्सवी माहौल में हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी हमें अपने महाभावो को अभिव्यक्त करने हेतु प्रेरित करती है.  अतः महान् आध्यात्मिक वैभव से युक्त पंचाक्षर “नमः शिवाय” और सनातन आध्यात्मिक संस्कृति के महानतम वंदनीय वाक्यों “जय श्री राम” और जय श्री “कृष्ण” के महाबोधि संबोधन से हम समवेत स्वरों में सनातन संस्कृति के महापर्व गुड़ी पड़वा से आरंभ नव संवत्सर २०८३ का स्वागत अभिनन्दन करते हुए सभी प्राणियों के कल्याण के निमित्त अति प्रासंगिक एवं समीचीन यह शुभमङ्गलकामना करते हैं कि “सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का जीवन मंगलमय हो, और किसी को भी कोई दुःख न हो.”

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः,

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भागभवेत्.”

गुड़ी पड़वा से आरंभ नूतन संवत्सर के साए में यह शुभमङ्गलकामना की जानी भी समीचीन ही होगी कि नव संवत्सर संपूर्ण विश्व के लिए सुख समृद्धि दायक,अहिंसा, शांति और सौहार्द का संदेश वाहक तथा वैभव कारक होगा, और हम जीवन में सर्वोच्च सफलताओं की और अपने कदम बढ़ाते हुए अविरल गति से निरंतर आगे बढ़ते जाएंगे.

जीवन में सर्वोच्चता की और बढ़ने की यह संकल्प शक्ति ही यकीनन हमें एक बेहतर कल की तरफ ले जाती है, जहां से उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, और उस मार्ग पर चलते हुए हम अपनी मंजिल तक पहुंचने में कामयाब हो सकते है, किंतु जीवनपथ में आने वाली वास्तविकताओं को भी हम नहीं नकार सकते, इसलिए उन्हें दृष्टिगत रखते हुए ही हमें अपने उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होना होगा.

जीवन के आलोक पथ पर की ओर बढ़ते हुए मानसिक स्तर पर चाहे हम सागर की अनंत गहराइयों को पा जाएं, अथवा विंध्याचल की शैली श्रंखलाओं को अपनी फौलादी बांहों में भर लें, किंतु वास्तविकताओं की विराटता भी हमें बार बार अपनी जमीनी हकीकत बताती ही रहती है, ऐसे में जीवन की वास्तविकताओं से रूबरु होते हुए एवं एक एक दिन के मैदानी अनुभव से ही श्रेष्ठता के आयामों को छुआ जा सकता है. महान् उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उठे कदम अंततः अपनी मंजिल पर पहुंच ही जाते हैं, किंतु जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए हमें यह समझना होगा कि रास्ते कभी भी सीधे सपाट नहीं हुआ करते हैं, इसलिए कठिन रास्तों से गुजरने की क्षमताएं भी हमें पहले ही विकसित करनी होगी, साथ ही हौसलों की बुलंदियों को बरकरार रखना होगा, क्योंकि एक वह हौंसला ही तो है, जो भूतकाल की असफलताओं को नई नई सफलताओं में तब्दील कर देता है, और एक मुकम्मल जहां हमारे हाथों में सौंप देता है.

जीवन में आगे बढ़ते हुए कदाचित् ऐसे मोड़ भी आते हैं जब धैर्य ही हमारा आदर्श मित्र साबित होता है, क्यौकि धैर्यहीनता ही एक ऐसी बेड़ी है, जो हमारे कदमों को बरबस ही थाम लेती है, तब दिखाई दे रही मंजिल भी सहसा ही दूर दिखाई देने लगती है, ओर तब उस गतिमान समय की परिधि में आबद्ध हम लोग सहसा ही विचलित हो कर नियति पर नाराज हो जाते हैं, और तब व्यथा की विपरीतता में कह उठते हैं कि एक एक क्षण पहाड़ बन गया है, और जब खुशी का अवसर मिलता है तो कहने लगते हैं कि समय कितना जल्दी व्यतीत हो गया, ऐसा लगता है कि जैसे बात आजकल की ही हो, किंतु वह क्षण न तो पहाड़ की मानिंद था, और न ही चींटी द्वारा ले जाए जा रहे एक महीन कण की तरह अतिलघु ही था, वक्त का वह कतरा परिंदे की तरह आसमान को अपने आगोश में भर लेने के कथित मानसिक भावों से युक्त भी नहीं था, वास्तविकताओं में हमने ही उसे अपने संकीर्ण सुख दुःखों से, हानि लाभ से या फिर जय पराजय से संयुक्त कर दिया था, शायद इसीलिए वह शुचि वक्त अच्छा या खराब नाम पा गया.  दरअसल वह कालचक्र के परिक्रमा पथ का एक नन्हा सा हिस्सा था, समय का वह एक कतरा था, जिस पर दौड़ते हुए हम कभी उत्कर्ष पर पहुंचे थे, और वह भी समय का ही एक कतरा था, जिस पर चलते हुए कदाचित हम लड़खड़ाते हुए गिर पड़े थे, और तब उस गतिमान शुचि समय को हमारे ही द्वारा कई संज्ञाओं से विभूषित कर दिया गया था, जबकि समय के उसी प्रवाह ने अन्य अनगिनत लोगों को अमृत तत्व से अभिसिंचित भी किया.  निश्चित तौर पर उस एक ही समय को देखने का हमारा नजरिया तात्कालिक लाभ हानि के अल्पकालिक प्रवाह से ही संयुक्त था, शायद इसीलिए अनुभूतियां भी पृथक पृथक रूप ग्रहण कर गईं.

समय के उसी महावैभवी पथ पर एक तरफ जहां फूलों की सौंदर्य सुरभि समाई है, वहीं कंटक भी बिखरे पड़े हैं. यह वही पथ है जो एकबारगी हमें लहुलुहान कर देता है, किंतु संभावनाओं का अनन्त सागर भी तो वहीं से आकार ग्रहण करता है. यही है वह अरण्यपथ जो कठिन है, किंतु असीम संभावनाओं एवं उपलब्धियों से युक्त भी है.  शायद यही है वह उपलब्धियो से ओतप्रोत रास्ता जिस पर चलते हुए दुविधाओं की सड़ांध समाप्त हो जाती है, और उद्देश्य पूर्ण यात्रा के प्रसून खिलते हुए दिखाई देते हैं, किंतु हमें यह समझना होगा कि यात्रा की इस सुख सुरभि में कांटों की वेदना भी समाई होती है, इसलिए प्रत्येक कदम सम्हाल कर रखने की जरूरत पेश आती है, क्यौकि कठिन कंटकाकीर्ण मार्ग को, अरण्यपथ को चुन लिया है जिसने, परीक्षाओं के सिलसिले उसके समक्ष कतारबद्ध खड़े नजर आते ही हैं.  सफलताओं के ये आसान से लगने वाले रास्ते परीक्षाओं की वह पूर्व दिशा है, जिसे बादलों ने आच्छादित कर रखा है, किंतु सतत प्रयासों रुपी पुरुषार्थ उन्हें छिन्न भिन्न कर देता है, ओर सफलता रुपी स्वर्णिम प्रभात की नूतन रश्मियां प्रस्फुटित हो ही जाती है.  कठिनाइयों के उन बेतरतीब सिलसिलों से होकर ही सफलताओं के महाद्वार खुलते हैं.  यही है, वह दिव्यतम सुख की अनुभूति का महाद्वार, जहां से आसमानी बुलंदियां हमारे स्वागत समारंभ हेतु तत्पर दिखाई देती है.  यही है वह चिरंतन शाश्वत सत्य के अनुसंधान का पथ जहां पर आगे बढ़ जाने पर फिर होकर भी नहीं होने की विराट संभावनाएं दस्तक देने लगती है.  यही है वह अमृत का महाकोश, युग युगान्तर से जिसे हम खोजते आए हैं, और जिसकी छत्रछाया ने अनगिनत मानवों को महामानव के रूप में स्थापित कर दिया है.

आलोक पथ की ओर अग्रसर होते हुए तथा अपने कर्तव्य बोध, कर्मशीलता और राष्ट्र हित के महाभावों को सर्वोपरि स्थान प्रदान करते हुए हम नवोन्मेष के पथ पर सतत रूप से अग्रसर होने हेतु कृत संकल्पित हैं.

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© डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

संपर्क- श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर, थान्दला, जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश (भारत)

मोबाइल-8602244004/ Email-dr.umeshchandrasharma@yahoo.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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