श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उम्मीद की भैंस।)

?अभी अभी # ९५४ ⇒ आलेख – उम्मीद की भैंस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मुझे भैंस से विशेष लगाव है, और अधिकतर मैं इसी का दूध पीता चला आया हूं क्योंकि इसका दूध गाढ़ा और मलाईदार होता है। गाय का दूध अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है, यह जानते हुए भी शायद मेरी अक्ल घास चरने चली जाती है, जो मैं अधिक मलाई और स्वाद के चक्कर में भैंस के दूध को ही अधिक पसंद करता हूं।

बचपन में मैंने भी बहुत गाय का दूध पीया है। सुबह स्विमिंग पूल में तैरने जाना और वापसी में एक ग्वाले के यहां पीतल के बड़े ग्लास में शुद्ध गाय के इंस्टंट यानी ताजे कच्चे दूध का सेवन करना और अपनी सेहत बनाना।।

आज भी केवल दो ही दूध तो आम है, गाय का और भैंस का। होता है बकरी का दूध भी, जिसे गांधीजी पीते थे। जो लोग बकरी पालते हैं, वे बकरी का तो दूध पी जाते हैं और बकरा बेच खाते हैं। बकरा खाने से बकरा बेच खाना उनके लिए अधिक आय का साधन भी हो सकता है।

भैंस की तरह बकरी भी उम्मीद से होती है। वह भी खैर मनाती होगी कि बकरी ही जने। अगर बकरी हुई तो दूध देगी और अगर बकरा हुआ तो वह बलि का बकरा ही कहलाएगा। अगर बकरी का भी उम्मीद के वक्त भ्रूण परीक्षण हो, तो वह भी मेमना गिरा देना ही पसंद करेगी। मुर्गी दूध नहीं अंडे देती है और अगर उम्मीद से हुई तो मुर्गा भी दे सकती है। आज तक किसी उम्मीद की मुर्गी ने सोने के अंडे नहीं दिए, खाने के ही दिए हैं।।

उम्मीद पर दुनिया जीती है। भैंस ही उम्मीद से नहीं होती, गाय भी उम्मीद से होती है। वह भी या तो बछिया जनेगी अथवा बछड़ा। दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते, यानी यहां भी बछड़े का दान नहीं होता, बछिया देख किसकी बांछें नहीं खिलेंगी। रोज जब भी शिव जी को जल चढ़ाएं तो नंदी महाराज को नहीं भूलें, लेकिन अगर उम्मीद की भैंस पाड़ा जन दे, तो नाउम्मीद ना हों, समझें एक और नंदी ने अवतार लिया है।

प्राणी मात्र की सेवा से पुण्य मिलता है, लेकिन ईश्वर गवाह है, गौ सेवा की तो बात ही निराली है। गाय भैंस पालने के लिए तो आपको डेयरी खोलनी होगी, स्टार्ट अप में इसका भी प्रावधान है। आप चाहें तो देश में फिर से घी दूध की नदियां बहा सकते हैं। उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है। कुक्कुट पालन भी एनिमल हस्बेंड्री का ही एक प्रकार है। सेवा की सेवा, और मेवा ही मेवा।।

भैंस में भले ही अक्ल ना हो, वह चारा खाती हो, लेकिन जिनकी अक्ल भैंस चरने नहीं जाती, वे ही भैंस का चारा खा सकते हैं। आम के आम और गुठलियों के दाम। चारा बेचने से चारा खाने में अधिक समझदारी है। यानी भैंस का दूध भी डकारा और चारा भी खा गए। मेरे भाई, फिर गोबर को क्यूं छोड़ दिया।

अन्य पशुओं की तुलना में भैंस अधिक शांत प्राणी है, क्योंकि मन की शांति के लिए ये कहीं हिमालय नहीं जाती, बस चुपके से पानी में चली जाती है। आप भी पानी में पड़े रहो, देखिए कितनी शांति मिलती है। हर भैंस पालक की भी यही उम्मीद होती है कि उसकी भैंस अधिक दूध दे, और जब भी जने, तो बस पाड़ी ही जने, पाड़ा ना जने।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments