डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ माँ का टिफिन बनाम बाज़ार का स्वाद ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

माँ का टिफिन बनाम बाज़ार का स्वाद: जब सुविधा जीवनशैली बन जाए और भोजन सिर्फ स्वाद तक सिमट जाए

“माँ, टिफिन मत बनाना… स्कूल के बाहर मोमोज खा लूँगा।”

माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस सुबह उठकर बनाई गई सब्जी और पराठों की तरफ देखा।

शाम को वही टिफिन बिना खुले वापस आ गया।

माँ को दुख टिफिन के लौट आने का नहीं था। दुख इस बात का था कि जिस भोजन में उनका प्यार, मेहनत और पोषण छिपा था, वह आज की पीढ़ी को पुराना लगने लगा था।

और शायद यहीं से शुरू होती है फास्ट फूड पीढ़ीकी असली कहानी।

आज के बच्चे और युवा ऐसे दौर में बड़े हो रहे हैं, जहाँ भोजन का अर्थ धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। कभी खाना शरीर को पोषण देने का माध्यम था, आज वह मनोरंजन, सुविधा और त्वरित संतुष्टि का साधन बनता जा रहा है। मोबाइल ऐप पर एक क्लिक कीजिए और कुछ ही मिनटों में बर्गर, पिज़्ज़ा, फ्रेंच फ्राइज़ या शक्कर से भरे पेय आपके दरवाजे पर हाज़िर हैं।

सुविधा बुरी नहीं है, लेकिन जब सुविधा आदत बन जाए और आदत जीवनशैली, तब उसके परिणाम भी सामने आने लगते हैं।

कुछ दशक पहले तक भारतीय रसोई मौसम के साथ बदलती थी। गर्मियों में छाछ, सत्तू और आम पना शरीर को ठंडक देते थे। सर्दियों में बाजरे की रोटी, सरसों का साग, तिल और गुड़ शरीर को ऊर्जा प्रदान करते थे। भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया जाता था।

आज मौसम बदलता है, लेकिन मेन्यू नहीं बदलता।

पैकेट खोलिए, गरम कीजिए और खा लीजिए।

यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी समस्याएँ अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रहीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया भर में बचपन का मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और इसका एक बड़ा कारण अत्यधिक प्रसंस्कृत (Processed) और जंक फूड का बढ़ता सेवन है।

विडंबना देखिए, आज बच्चों के पास खाने के विकल्प पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन उनके शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी भी पहले से अधिक देखने को मिल रही है।

क्यों?

क्योंकि अधिकांश फास्ट फूड में कैलोरी बहुत होती है, लेकिन पोषण बहुत कम।

पेट भर जाता है, लेकिन शरीर भूखा रह जाता है।

लेकिन यह समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। फास्ट फूड संस्कृति ने हमारी सोच और जीवनशैली को भी प्रभावित किया है।

जब हम हर चीज़ तुरंत पाने के आदी हो जाते हैं तो धैर्य धीरे-धीरे कम होने लगता है। हमें दो मिनट में नूडल्स चाहिए, दस मिनट में डिलीवरी चाहिए और कुछ महीनों में सफलता चाहिए।

धीरे-धीरे यह मानसिकता जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगती है।

हम परिणाम चाहते हैं, प्रक्रिया नहीं।

हम उपलब्धि चाहते हैं, तैयारी नहीं।

हम सफलता चाहते हैं, संघर्ष नहीं।

दादी अक्सर कहा करती थीं, धीमी आँच पर पकी दाल का स्वाद ही अलग होता है।”

बचपन में यह बात केवल रसोई की सलाह लगती थी, लेकिन आज समझ आता है कि वह जीवन का दर्शन था।

प्रकृति में कोई भी अच्छी चीज़ जल्दबाज़ी में नहीं बनती। बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है। नदी को अपना रास्ता बनाने में समय लगता है। एक खिलाड़ी को चैंपियन बनने में वर्षों की मेहनत लगती है।

फिर हम क्यों मान बैठे हैं कि जीवन की हर उपलब्धि इंस्टेंटहो सकती है?

भोजन की दुनिया में भी यही सच है। घर का बना साधारण भोजन भले सोशल मीडिया पर आकर्षक न लगे, लेकिन वह शरीर को वह ताकत देता है जो किसी चमकदार पैकेट में नहीं मिल सकती।

पहले भोजन परिवार को जोड़ने का माध्यम था। रात के खाने पर पूरा परिवार एक साथ बैठता था। दिनभर की बातें होती थीं। बच्चों को संस्कार मिलते थे। बुज़ुर्गों के अनुभव सुनने को मिलते थे।

आज एक ही घर में चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन के सामने खाना खा रहे हैं।

भोजन बचा है, लेकिन साथ कहीं खो गया है।

यह कहना गलत होगा कि फास्ट फूड पूरी तरह बुरा है। समस्या कभी-कभार खाने में नहीं, बल्कि उसे जीवन का आधार बना लेने में है। यदि हमारी थाली में फल, सब्जियाँ, दालें, मोटे अनाज और घर का बना भोजन पर्याप्त मात्रा में है, तो कभी-कभार का स्वाद कोई नुकसान नहीं पहुँचाता।

लेकिन जब स्वाद पोषण पर भारी पड़ने लगे, तब खतरे की घंटी बज जाती है।

आज जरूरत बच्चों को डराने की नहीं, बल्कि जागरूक बनाने की है। उन्हें यह समझाने की आवश्यकता है कि भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि भविष्य का निवेश है। जो भोजन आज उनकी थाली में है, वही कल उनकी ऊर्जा, रोग-प्रतिरोधक क्षमता और जीवन की गुणवत्ता तय करेगा।

माँ के हाथ का साधारण पराठा शायद किसी विज्ञापन में न दिखे, लेकिन उसमें वह स्नेह, पोषण और संतुलन छिपा होता है जिसे कोई ब्रांडेड पैकेट नहीं दे सकता।

 

फंडा यह है कि-

फास्ट फूड जीभ को कुछ मिनटों की खुशी दे सकता है, लेकिन शरीर को लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रख सकता। जिस पीढ़ी को केवल स्वाद मिलेगा और पोषण नहीं, उसे सुविधा तो मिलेगी, पर शक्ति नहीं। इसलिए अपनी थाली में ऐसा भोजन रखिए जो सिर्फ पेट नहीं, भविष्य भी भर सके।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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