डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ मैं पैसा हूँ… पर तुम्हारी पहचान नहीं ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“मैं बाज़ार की ज़रूरत हूँ, जीवन का उद्देश्य नहीं।”
मैं पैसा हूँ।
सदियों से मनुष्य के हाथों में घूम रहा हूँ। कभी सिक्का बना, कभी नोट और अब एक स्क्रीन पर चमकता हुआ अंक।
समय के साथ मेरा रूप बदलता रहा, पर एक बात कभी नहीं बदली-मैं आज भी इंसान की नीयत का सबसे सच्चा आईना हूँ।
मुझे दोष देना आसान है।
लोग कहते हैं कि मैंने भाई-भाई को बाँट दिया, रिश्तों में दरार डाल दी, इंसान को स्वार्थी बना दिया।
पर सच यह है कि मैं किसी के मन में लालच नहीं बोता। मैं तो केवल उस लालच को उजागर कर देता हूँ, जो पहले से भीतर छिपा होता है।
मैंने कभी किसी से नहीं कहा कि ईमान बेच दो, किसी का हक मार लो या अपनों को भूल जाओ।
मैं तो बस वहीं जाता हूँ, जहाँ मुझे ले जाया जाता है।
किसी के हाथों में पहुँचकर मैं भूखे का भोजन बन जाता हूँ, किसी की शिक्षा, किसी का उपचार और किसी के सपनों का आधार बन जाता हूँ।
लेकिन जब मैं अहंकार की मुट्ठी में कैद हो जाता हूँ, तब घर बड़े हो जाते हैं और दिल छोटे।
तिजोरियाँ भर जाती हैं, पर रिश्ते खाली होने लगते हैं।
याद रखना, मुझे कमाना बुरा नहीं है।
बुरा तब है, जब मुझे कमाने की दौड़ में तुम अपने होने का अर्थ ही खो बैठो।
जिस दिन तुम्हारे जीवन का अंतिम हिसाब होगा, उस दिन कोई बैंक बैलेंस साथ नहीं चलेगा।
सिर्फ दो चीज़ें तुम्हारे साथ होंगी-तुम्हारे कर्म और लोगों के दिलों में तुम्हारी स्मृतियाँ।
इसलिए मुझे इतना ही महत्व देना, जितना जीवन को सहज बनाने के लिए आवश्यक है।
मैं सुविधा दे सकता हूँ, सुख नहीं।
मैं सुरक्षा दे सकता हूँ, अपनापन नहीं।
मैं वैभव दे सकता हूँ, सम्मान नहीं।
सम्मान तो आज भी चरित्र से मिलता है।
इसलिए…
मुझे कमाओ, पर चरित्र खोकर नहीं।
मुझे बचाओ, पर रिश्ते गँवाकर नहीं।
मुझे खर्च करो, पर संवेदनाएँ बेचकर नहीं।
और अंत में…
मुझे जेब में रखना,
दिल में नहीं।
क्योंकि दिल में यदि किसी को जगह मिलनी चाहिए, तो वह प्रेम, विश्वास, करुणा और इंसानियत है।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





