श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पेइंग गेस्ट…“।)
अभी अभी # १०५१ ⇒ आलेख – पेइंग गेस्ट
श्री प्रदीप शर्मा
अतिथि भगवान होता है, बैंक का एटीएम नहीं ! साईं इतना दीजिये, जा में कुटुंब समाय,
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए। साधु भी अतिथि ही होता है, लेकिन भरपेट भोजन के बाद संतुष्ट होकर आशीर्वाद देकर विदा ले लेता है। अतिथि क्या लेकर आया था, और क्या देकर जाता है, भगवान ही जाने।
जो अतिथि कुछ देकर जाता है, उसे पेइंग गेस्ट कहते हैं। कीमत हमेशा कैश अथवा काइंड ही नहीं होती ! दूर की चाची, दस रोज रुकने के बाद जब भरे मन से वापस जाती थी, तो मुन्नू के हाथ में गुड़ा-मुड़ा बीस का नोट रखकर ज़रूर जाती थी। बहू ! तेरा अचार बहुत पसंद आया, थोड़ा बरनी में बाँध दीजो। लेकिन उन्हें आप पेइंग गेस्ट नहीं कह सकते।।
1957 में देवानंद और नूतन की एक फ़िल्म आई थी, पेइंग गेस्ट ! बॉलीवुड की नगरी मुम्बई में कई डिसूजा और परेरा टाइप परिवार रहते थे, जिन्हें आप एंग्लो-इंडियन कह सकते हैं। ये सब बूढ़ी आंटियां रहती थीं, जिनके एक अथवा दो लड़कियां रहती थीं। कोई सुंदर सा नवयुवक इनके यहाँ नौकरी ढूँढने के बहाने आता, इनके यहाँ पेइंग गेस्ट बनकर रहता, और पिक्चर चल निकलती। किसी एक लड़की से उसका प्यार होता और छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा, गाना शूट हो जाता। कहीं से एक विलेन आ जाता, ढिशुम, ढिशुम और बाद में मालूम पड़ता कि वह नवयुवक अपने पिता रायबहादुर की करोड़ों की जायदाद को ठुकराकर चला आया है। एक सुखांत फ़िल्म का अंत हो जाता।
मुम्बई जब बम्बई था, तब वहाँ पेइंग गेस्ट रहा करते थे। छोटे कस्बों से नौकरी की तलाश में आए युवकों को पेइंग गेस्ट रखने वाले मिल भी जाया करते थे। तब के मुम्बई में बहुत से एंग्लो-इंडियन और पारसी परिवार ऐसे होते थे जहाँ एक निश्चित राशि में रहने को छत, भोजन और मकान मालिक का ढेरों प्यार मिल जाता था। बहुत से किस्से हैं पेइंग गेस्ट के। कई लोगों की ज़िंदगी यहीं रहकर बनी है।।
आज यह हालत है कि अगर किसी को मकान किराये से दो, तो पहले थाने में सूचित करो। छः महीने का एडवांस, महीने के महीने किराया, कहीं भी खाओ, कुछ भी खाओ अपनी बला से।
कितने उदार दिल होते होंगे वे लोग, जो किसी को अपने यहाँ पेइंग गेस्ट रखते होंगे। आजकल दो भाई एक साथ घर में नहीं रह सकते, ऐसी स्थिति में माँ-बाप की तरह प्यार देना, अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाना। बीमारी और मुफ़लिसी में भी हर तरह की मदद करना, यह काम कोई फरिश्ता ही कर सकता है।।
संघर्ष के दिनों के सबके अपने अपने अनुभव होते हैं। घर से बाहर की अनजान दुनिया में भी कई फरिश्ते बसते हैं, समय निकल जाता है, उनकी यादें नहीं जाती। नौकरी धंधे के कारण, जो व्यक्ति जितना घर के बाहर रहा है, उसके जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों का उतना ही समावेश रहा है।
जीवन के शुरुआती दौर में नौकरी ! घर से बाहर ट्रांसफर। नई जगह, नया परिवेश। बिना शादीशुदा को किराए का मकान नहीं मिलता। क्या जाने कैसा इंसान हो। फिर भी येन केन प्रकारेण छत का जुगाड़ तो हो ही जाता। तब कहाँ का टिफिन ! किसी ढाबे में जाकर खा लो, या अपने हाथों से खाना बनाओ। मकान मालिक अच्छा दयालु हुआ, तो कभी कभी चाय पानी भी हो जाता था।।
आप किसी के पेइंग गेस्ट रहे हों या किरायेदार, लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते, कि हमारे आसपास आज भी इंसानियत बिखरी पड़ी है। जीवन में फूल ही नहीं, काँटे भी होते हैं। हो सकता हो, किसी के अनुभव कटु भी हों, लेकिन पेइंग गेस्ट की कल्पना मात्र ही, आज भी मुझे रोमांचित कर देती है। मेरी आँखों के सामने एक बूढ़ी आंटी तैर जाती है, जो यह पूछती नज़र आती है। बेटा! तूने आज दो रोटी कम क्यों खाई।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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