डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)

☆ आलेख – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

नेतृत्व वह प्रक्रिया है जिसमें एक दूसरों को प्रभावित करके, प्रेरित करके और मार्गदर्शन देकर किसी साझा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करता है। नेतृत्व सिर्फ़ बाॅस बनना नहीं, पद नहीं बल्कि प्रभाव है, भरोसे और सम्मान से लोगों के साथ मिलकर मंज़िल को पाना है। एक प्रभावशाली नेतृत्व हमेशा ही अपनी क्षमता, निर्णयशक्ति और व्यक्तित्व के कारण लोगों का विश्वास अर्जित करता है किन्तु जब यही नेतृत्व अहंकार से ग्रस्त हो जाता है तब वही गुण संगठन, समाज और राष्ट्र के लिए संकट का कारण बन जाता है। अहंकार नेतृत्व की विवेकशीलता को कुंठित करता है, संवाद को बाधित करता है, आलोचना को अस्वीकार करता है और स्वयंभू बनकर निर्णयों को एकांगी बना देता है। अहंकार नेतृत्व का सबसे खतरनाक शत्रु है। प्रारम्भ में नेतृत्व अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है फिर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है और अंतत: वह स्वयं को अचूक समझ बैठता है, यही अवस्था नेतृत्व के पतन का आरम्भ होती है। नेतृत्व जब आलोचना को अस्वीकार करे, दूसरों की उपलब्धियों का सम्मान न करे, निर्णयों में एकाधिकार स्थापित करे, सलाहकारों की उपेक्षा करके,स्वयं को अपरिहार्य समझे, सफलता का पूरा श्रेय स्वयं लेने लगे, असफलता का दोष दूसरों पर थोपने लगे तो समझ लेना चाहिए कि अहंकार की शुरुआत हो चुकी है।

नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती अहंकार ही होता है। अहंकारी नेतृत्व अपने निर्णय को अंतिम सत्य मानता है। वह वैकल्पिक विचारों और विशेषज्ञों की सलाह को महत्व नहीं देता, इससे निर्णय प्रक्रिया एकपक्षीय हो जाती है और त्रुटियों की सम्भावना बढ़ जाती है। प्रभावशाली नेतृत्व सदैव ही दूसरों के विचारों को सुनता है। नेतृत्व का आधार विश्वास है जबकि अहंकार विश्वास को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। किसी भी समाज या समुदाय की प्रगति नए विचारों पर निर्भर करती है किन्तु जब कोई व्यक्ति अपने को सर्वज्ञ समझने लगता है तब नई सोच को प्रोत्साहन नहीं मिलता, रचनात्मकता का स्थान चापलूसी ले लेती है। अहंकारी व्यक्ति को भ्रम होता है कि उसके लिए नैतिक नियम लागू नहीं होते! ऐसी स्थिति में पारदर्शिता घटती है, पक्षपात बढ़ता है, सत्ता का दुरूपयोग होने लगता है, टीम भावना विघटित हो जाती है।

नेतृत्व में अहंकार के आ जाने का दुष्परिणाम यह होता है कि व्यक्ति स्तर पर आत्ममूल्यांकन की क्षमता कम हो जाती है और वास्तविक मित्रों का दायरा सीमित हो जाता है, मानसिक तनाव बढ़ता है। संगठन के स्तर पर साथियों का मनोबल गिरता है, निर्णयों की गुणवत्ता में कमी आती है, भ्रष्टाचार में वृद्धि होने लगती है, समाज और राष्ट्र स्तर पर जनविश्वास में कमी आ जाती है, संवाद और सहमति की संस्कृति प्रभावित होती है। इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में विनम्र नेतृत्व को विशेष महत्व दिया जाता है। गीता का कर्मयोग यही सिखाता है कि नेतृत्व का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नहीं, लोकसंग्रह और कर्तव्य पालन होना चाहिए। केवल बड़ा पद या प्रतिष्ठा पर्याप्त नहीं, यदि उससे समाज को लाभ नहीं मिलता तो उसका महत्व सीमित है। नेतृत्व में अहंकार के समाधान हेतु व्यक्तिगत आत्मानुशासन, संगठनात्मक संस्कृति तथा नैतिक मूल्यों का समन्वय आवश्यक है। आत्मचिंतन और आत्ममूल्यांकन त्रुटियों का बोध कराता है तथा अहंकार को नियंत्रित रखने में सहायक होता है। विनयी व्यक्ति सफलता का श्रेय टीम को देता है, असफलता की जिम्मेदारी स्वयं लेता है। संगठन में नियमित संवाद, खुली चर्चा, रचनात्मक आलोचना की संस्कृति अहंकार को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नेतृत्व का उद्देश्य आदेश देना नहीं, लोगों की क्षमता का विकास करना होना चाहिए। सत्य, ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व जैसे मूल्य नेतृत्व को स्थायी सम्मान प्रदान करते हैं।

सारत: प्रभावशाली नेतृत्व वही है जो अपने व्यक्तित्व से नहीं, अहंकार से ऊपर उठकर अपने चरित्र, सेवा और प्रेरणा से लोगों के हृदयों में स्थान बनाता है। अहंकार क्षणिक विजय दे सकता है किन्तु विनम्रता स्थायी सम्मान दिलाती है। आधुनिक प्रबंधन और भारतीय दर्शन दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि पद या नेतृत्व वह बड़ा नहीं होता जो स्वयं को बड़ा समझे अपितु महानता इसी में है कि नेतृत्व दूसरों को भी बड़ा बनने का सुअवसर प्रदान करे। हमारी ज्ञान परम्परा का संदेश भी यही है कि विद्या से विनय प्राप्त होती है, विनय से पात्रता, पात्रता से समृद्धि, समृद्धि से धर्म  और अंतत: सुख की प्राप्ति होती है। यही सूत्र आदर्श नेतृत्व का भी शाश्वत आधार है।

 

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


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