श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बस्ता…।)

?अभी अभी # १०८२ ⇒ आलेख – बस्ता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अमीरों की टाउनशिप होती है, गरीबों की बस्ती ! बस्ती के बच्चे सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन और छात्रवृत्ति के लिए जाते हैं, और टाउनशिप के बच्चे आईपीएस और डीपीएस में एक अच्छा इंसान बनने। वे भी क्या दिन थे, जब सबके लिए एक ही स्कूल होता था, और एक जैसा ही बस्ता।

घर में हाथ से सिली हुई थैली ही बस्ता कहलाती थी, जिसमें एक पट्टी, पेम, पेंसिल और पढ़ने-लिखने की किताब होती थी।

कुछ सम्पन्न बच्चे तो पानी-पोता भी लेकर आते थे। कुछ गंदे बच्चे थूक से पट्टी पोंछ लेते थे, तो कुछ लट्ठे के कमीज से ही पट्टी साफ कर लिया करते थे। जिस रोज कोई राष्ट्रीय त्योहार होता था, बस्ती-पट्टे की छुट्टी हो जाती थी।।

समय के साथ बस्ता भी बड़ा होता चला गया। हर विषय की कॉपी किताब, परीक्षा के समय स्याही वाला पेन, स्केल, कंपास और न जाने क्या क्या ! जो बस्ता कभी हाथ में रहता था, अचानक वेताल की तरह कंधे पर आ बिराजा। खाने का टिफ़िन और वॉटर बॉटल भी साथ में ही लद लिये।

कभी कभी रेलवे के हम्मालों के कंधों और सर पर बोझा लदा देखकर आज के स्कूली बच्चे निगाहों के सामने आ जाते हैं।

मोटी ताज़ी स्कूल की फीस के साथ बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ, सर पर पढ़ाई का बोझ, और माता-पिता पर बच्चे के उज्ज्वल भविष्य का बोझ।।

बस्ता बच्चे की पहचान है ! कभी किसी के बस्ते को लात लग जाती, तो उसको छूकर माफी माँगनी पड़ती थी। वह विद्या है। समय कितना भी बदल जाएबस्ते में विद्या है, ज्ञान का भंडार है, सरस्वती का वास है। बच्चों का भविष्य है, माता पिता के सपने इन्हीं बस्तों में बंद है।

यह बस्तों की बस्ती है। यहाँ दिन भर मेहनत है, पढ़ाई है, और आंखों में अच्छे नम्बरों से पास होने की, स्कूल में टॉप करने की उम्मीद बसती है। बच्चा है, तो बस्ता है, जिसमें से ज्ञान बरसता है। हर बस्ते में एक बच्चे का सुनहरा भविष्य बसता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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