प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गीत ☆

☆ आओ! मातारानी के द्वार चलें ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

न और उदास हों, न अब और स्वयं को खलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

अंधकार में और न भटकें, पावन पथ पर कदम बढ़ाएँ।

कंटक राहों के मत देखें, पुष्पों से  उपवन महकाएँ।

अब तो रीति-नीति के नग़मे, अपने अधर सजाएँ।

मानवता के काम करें हम, इस जग को महकाएँ।।

न व्यर्थ कुछ सोचें, न ही व्यर्थ निज हाथ मलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

सब विकार भीतर के मारें, कर लें रोशन राहें।

सच्चाई को आज साध लें, भरें न यूँ ही बाहें।।

जन्म जो पाया मानव का तो, कुछ मानव-सा हो।

पाना है कुछ तुझको तो तू, अच्छा ही अब बो।।

क्यों नहीं अब नवल चेतना के भाव हृदय पलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

आशाओं के सावन में अब, पावनता बरसाएँ।

मातारानी की करुणा से, जीवन-सुमन खिलाएँ।।

हम बदलेंगे जग बदलेगा, होगा कुछ चोखा।

धर्म-कर्म में रखें श्रेष्ठता, नहीं रचें धोखा।।

तज दें सब बैर, न ही किंचित डाह में और जलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

 ☆

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

आज़ाद वार्ड-चौक, मंडला, मप्र, मो. 9425484382 ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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