डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ।। महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना स्तोत्र ।। ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

☆

☆ इन्द्र उवाच ☆

☆

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।

शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।१।।

*

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि।

सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।२।।

*

सर्वज्ञे सर्ववरदे देवी सर्वदुष्टभयंकरि।

सर्वदु:खहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।३।।

*

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि।

मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।४।।

*

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि।

योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।५।।

*

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे।

महापापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।६।।

*

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणी।

परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।७।।

*

श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते।

जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।८।।

☆

☆ फलप्राप्ती ☆

☆

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्तिमान्नर:।

सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा।।९।।

*

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।

द्विकालं य: पठेन्नित्यं धन्यधान्यसमन्वित:।।१०।।

*

त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।

महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा।।११।।

☆

मराठी भावानुवाद:

☆ कथित इन्द्र ☆

श्रीपीठस्थित सूरपूजित महामाये तुज नमन

शंखचक्रगदाधारिणी महालक्ष्मी तुज नमन॥१॥

*

गरुडवाहिनी कोलासुराऽभयदायिनी तुज नमन

समस्तपापहारिणी देवी महालक्ष्मी तुज नमन ॥२॥ 

*

देवी सर्ववरदा भयकारी सकल दुष्टा सर्वज्ञ

सर्वदुःखहारिणी देवी महालक्ष्मी तुज नमन ॥३॥

*

देवी सिद्धीबुद्धीदायिनी मंत्रजागरे सदैव पावन

भोगमुक्तीदायिनी देवी महालक्ष्मी तुज नमन ॥४॥

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देवी आदिशक्ती महेश्वरी असशी अनादिअनंत

योगे जनन योगे प्रकट महालक्ष्मी तुज नमन ॥५॥

*

महाशक्ती महोदरी स्थूल सूक्ष्म महारौद्र रूपिणी

देवी महालक्ष्मी तुज नमन हे महत्पापनिवारिणी ॥६॥

*

परब्रह्मस्वरूपिणी कमल आसने विराजमान

जगन्माते परमेश्वरी महालक्ष्मी तुज नमन ॥७॥

*

धवल वस्त्र धारिणी विविध अलंकार भूषण

जगन्व्यापिणी जगन्माते महालक्ष्मी तुज नमन ॥८॥

☆

☆ फलप्राप्ती ☆

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पठण करता भक्तीपूर्वक महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र 

सकल सिद्धी राजवैभव नित्य तयासी होत, प्राप्त ॥९॥

*

पठण करता एकेवेळी नित्य विनाश महापापाचा

नित्य करिता पठण दोन वेळा वर्षाव धनधान्याचा ॥१०॥

*

त्रिकाले करिता नित्य पठण विनाश महाशत्रूचा

सदा प्रसन्न कल्याणकारिणी वरदहस्त महालक्ष्मीचा॥११॥

☆

अनुवादक : © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम.डी., डी.जी.ओ.

मो ९८९०११७७५४ ईमेल nishikants@gmail. com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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