श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६९ ☆

☆आलेख ☆ ~ ‘पथरीला सोना’ में पितरों और पूर्वजों के प्रति आस्था और सांस्कृतिक मूल्य  ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का विशेष महत्व है – (पितृ पक्ष विशेष))

☆

(मॉरीशस साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना – खंड सात के एक छोटे से अंश पर आधारित लेख )

जब मैं पितृपक्ष के अवसर पर पितरों और पूर्वजों के प्रति अपनी आस्था और संस्कृति की बात करता हूँ तो मेरे मन में साहित्य से जुड़े हुए कुछ विशेष पक्षो पर लिखने की भी इच्छा होती है। हिंदी साहित्यकार रामदेव धुरंधर जी का ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना, के कुल सात खंड है। भारत से मॉरीशस पहुंचे, श्रमिकों की संपूर्ण व्यथा कथा को इन सात खंड के उपन्यास में बहुत बेहतरीन ढंग से बयां किया गया है। श्री रामदेव धुरंधर जी की लेखन शैली में, न सिर्फ जादू है बल्कि आपकी लेखन शैली, कदम कदम पर भारत और मॉरिशस की संस्कृति को भी जोड़ते हुये चलती है। आगे आलेख उपन्यास के एक अंश पर चर्चा करेंगे इसके पहले श्री रामदेव धुरंधर जी के लेखन शैली एवं का एक अनुपम उदाहरण देखते हैं।

“भारतीय तीन तलवार के साथ न जाकर, अपनी संस्कृति धरोहर के साथ जाते थे और वही रहते स्वयं साधु जीवन में ढल जाते थे। भारतीय धरती ने कैसे इस तरह के संस्कार स्वयं में पल्लवित – पुष्पित किए हों और लगे हाथ लोगों में इस तरह की प्रेरणा का संचार किया हो-

“मुट्ठी भर लेकर दूसरे देश जाओ, जहाँ इसे रोप दो कि उगे तो स्वयं वहाँ भारत उगे। ” (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३३)

श्री रामदेव धुरंधर

मॉरीशस साहित्यकार रामदेव धुरंधर जी के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना का सातवाँ खंड मेरे हाथों में है।

मैं इस उपन्यास को लगातार ही पढ़ रहा था। आज पितृ पक्ष के प्रथम दिवस पर मैं श्री रामदेव धुरंधर जी के इस उपन्यास के अंतिम पैराग्राफ पर आधारित एक लेख लिखने का एक विचार आया। इस पैराग्राफ में एक प्रपौत्र जो भारत में रहता है का मॉरीशस में रहने वाले पितामह के प्रति प्रेम का चित्रण किया गया है। उपन्यास का यह पैराग्राफ भारत और मॉरीशस के रिश्तों के मध्य रची बसी भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करता हुआ प्रतीत होता है।

पितृ पक्ष के अवसर पर भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति व्यक्त किए जाने वाले श्रद्धा के संदर्भ में यह पैराग्राफ अत्यंत सामयिक है। आइये श्री धुरंधर जी के इस उपन्यास के अंतिम पैराग्राफ को पढ़ते हैं और देखते हैं कि उपरोक्त विषय पर इस श्रेष्ठ उपन्यासकार का साहित्यिक चिंतन कहाँ तक जाता है –

परदादा स्वदेश से मिलने के लिए उसके परपोते अनूप और मंजुला दोनों मॉरीशस आने का जतन करते हैं।

“ड्राइवर ने आदमी से कहा कि उसके साथ भारतीय पति पत्नी है जो स्वदेश से मिलने आ रहे हैं।” (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३९)

लेकिन जब वह पहुँचते हैं तो –

“आदमी ने इशारे से ड्राइवर को बताया स्वदेश का घर कहाँ है। ड्राइवर को उस आदमी से स्वदेश के घर का तो मालूम हुआ, लेकिन उस परिचय में एक दुखद समाचार शामिल था। कल शाम को स्वदेश की मृत्यु हो गई थी” ( पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३९)

 उपन्यास का अंतिम पैराग्राफ :-

“अनूप और स्वदेशी के बीच परदादा और परपोते का जो धागा जुड़ गया था इसके अनुरूप हुआ यह कि परपोता अपने परदादा को मुखाग्नि दे। अनूप ने इस जिम्मेदारी को सिर झुकाकर स्वीकार किया। मन्त्रोंचार के साथ अरथी पूरी विशालता से उठी। श्मशान में शव दाह हो जाने के बाद लोग वापस लौटे। यहाँ जो कर्मकांड होना था अनूप उसके केंद्र में था। कल अस्थि विसर्जन होना था इसलिए अनूप रात को यहीं रहता। मंजुला के साथ यह बात तय हो जाने से वह टैक्सी से होटल लौट गई। अनूप के सेवा सत्कार में यहाँ के लोगों ने कोई कमी नहीं छोड़ते। शाम को पड़ोसी के घर से खाना आया। अनूप ने अपने पैसे से कुछ करना चाहा तो लोगों ने उसे मना किया। यह आत्मीयता का बड़ा ही सुंदर भावभीना पक्ष था। अनूप रात को स्वदेश के घर में रहा। पड़ोस के अमरनाथ सिम्हाद्री और दो-चार लोगों ने साथ दिया।

अगली सुबह अनूप लोगों के साथ श्मशान घाट गया। उसने अस्थि विसर्जन के लिए गंगा का चयन किया था। लोगों ने उसे सुनने हाथ जोड़कर उसकी बात का सम्मान किया। मॉरीशस का स्वदेश भारत की गंगा में जा मिले, उसका परम सौभाग्य….!

– (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३४१)

उपन्यास की अंतिम पैराग्राफ में आलेख के संदर्भित विषय से संबंधित प्रत्येक सामग्री शब्दसह पिरोई गयीं है। इसमें ऐसे दो देश है, जो दूर होते हुए भी अपनी संस्कृति के साथ एक है। इसमें संस्कार है जिसमें परपोते को अपने परदादा को मुखाग्नि देना है। उपन्यास का यह अंश भारतीय संस्कृति में मंत्र और मंत्रोचार, अस्थि विसर्जन आदि के महत्व को जहाँ बिम्बित करता है, वही अतिथि देवो भव : की भावना को दर्शाती हुईं उपन्यास की निम्न पंक्ति पाठक मन पर गहरी छाप छोड़ती है

“अनूप के सेवा सत्कार में यहाँ के लोगों ने कोई कमी नहीं छोड़ते”

 भारतीय संस्कृति का इससे सुन्दर उदाहरण क्या ही हो सकता है। उपन्यास के इस अंश की अंतिम पंक्ति में तब और अधिक धन्य हो जाती है, जब श्रेष्ठ उपन्यासकार ने उपन्यास के इस अंश में लिखा कि –

“उसने (अनूप ने) अस्थि विसर्जन के लिए गंगा का चयन किया था। लोगों ने उसे सुनने हाथ जोड़कर उसकी बात का सम्मान किया। मॉरीशस का स्वदेश भारत की गंगा में जा मिले, उसका परम सौभाग्य…!

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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रामदेव धुरंधर
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राजेश श्रेयस जी ने मेरे लेखन पर अब तक बहुत लिखा और लिखना आज भी जारी है। मेरा उत्साह वर्धन बहुत होता है। आभार राजेश जी। सोने में सुगंध कहूँ हेमंत बावनकर जी ने मुझ पर आधारित राजेश जी के आलेख को ईअभिव्यक्ति में स्थान दे कर इसे बहुत दूर दूर पहुँचाया है। आप दोनों को मॉरिशस से मेरा नमस्कार पहुँचे।