श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १९५ ☆ देश-परदेश – विश्व जीव जन्तु दिवस : 4 अक्टूबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆
चींटी से लेकर हाथी सब में एक प्राण!
कहें कबीर दया करो सब जीव एक समान!!
कबीर ने भी जीव जंतुओं के प्रति दया भाव की वकालत की है। सभी धर्म जीवों के प्रति और प्रकृति को प्यार करने की बात करते हैं।
कुर्बानी के नाम पर एक दिन में करोड़ों बकरों की जान लेना हो या बलि के नाम पर अन्य जीवों की जान लेना, कैसे उचित ठहराया जा सकता है। ये प्रथाएं बहुत प्राचीन हैं।
विदेशों में बड़े बड़े फार्म पशु पालन व्यवसायिक दृष्टि से किया जाता है, ताकि वहां के ठंडे मौसम में उनका उपयोग खाने में बहुतायत से हो सके। विदेशों में हिरण, कछुआ, बतख आदि को सड़क पार करते समय दोनों तरफ का यातायात स्वतः ही रुका रहता है। हमारे देश में तो लोग रात्रि के समय फुटपाथों पर सोये हुए लोगों को कार तले रौंद कर भी सज़ा के पात्र नहीं बनते हैं।
हमारे यहां भी मुर्गी पालन एक बहुत बड़ा उद्योग का रूप ले चुका है। अप्राकृतिक तौर से मुर्गी उत्पाद कर लोगों की जिह्वा को स्वाद दिया जा सके। हमारे देश के पशुधन विशेष रूप से बैल, ऊंट, घोड़ा आदि तो अब नगण्य हो चुका है। पुराने समय में कहावत प्रचलित थी कि – “पराये घर से ऊंट ढूंढना भी कठिन कार्य है” अब इसका नया रूप भी ऐसा ही कुछ कहता है, “राजस्थान में अब ऊंट ढूंढना कठिन कार्य है”
विज्ञान को इसके लिए पूरी तरह दोषी कहना सही नहीं होगा। हमारी पीढ़ी ने अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन नहीं किया। आज की जेन जी घर के बड़ों का सम्मान नहीं करती है, परन्तु कम से कम घरों में कुत्ते, बिल्ली पाल कर उनके संरक्षण में सहायक तो हो रही है।
अब शाम हो चली है, हमें भी अपने डॉगी को घुमाने भी तो ले जाना है।
© श्री राकेश कुमार
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