सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – ३‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # २८ ☆

? आलेख – परशुराम जी – ४ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

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सनातन का अध्यात्म: सनातन का अध्यात्म हमें स्व से मिलाने की यात्रा हैl आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने की यात्रा हैl उस सत्य से, उस परब्रम्ह से मिलने की यात्रा हैl हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से मिलने की यात्रा हैl सनातन हमें इस यात्रा में आगे बढ़ने हेतु हमारी मदद करता हैl सनातन सदा भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल इन तीनों में अपरिवर्तत होता हैl मनसा, वाचा और कर्मणा से किसी को भी हानि नहीं पहुंचानी चाहिए ये सीख देता हैl सनातन सदैव सत्य बोलने की प्रेरणा देता हैl सनातन, सनक, सनंदन और सनत कुमार नाम के ब्रम्हाजी के चार मानस पुत्र थेl इनमे से सनत और सनातन दोनों का अर्थ हमेशा रहने वाला, चिरकाल तक रहने वाला होता हैl

सनातन हमें आत्मज्ञान, कर्म और पुनर्जन्म, साधना के मार्ग, आंतरिक शांति, प्रकृति से जुड़ाव के साथ जीवन का सच्चा अर्थ क्या है ये समझाता हैl

1- सनातन का आत्मज्ञान : सनातन का आत्मज्ञान समझाता है कि मैं कौन हूँl यह शरीर नश्वर है परन्तु आत्मा अनश्वर हैl मैं यह शरीर नहीं हूँl मैं चैतन्य हूँ जो हमेशा प्रकाशवान चेतना है जो सदैव सुखी रहती हैl

यही कारण है कि हमारे उपनिषदों में बताया गया है कि मैं ही ब्रम्ह हूँl जो वो है मैं भी वही हूँl मैं ही परम सत्य हूँl मैं ही चेतना से परिपूर्ण हूँl मैं सदा ही निरलिप्त हूँl

2- कर्म और पुनर्जन्म : सनातन के अनुसार आत्मा अनश्वर है और यह शरीर नश्वरl हमारे कर्म चाहे वे अच्छे हों या बुरे उसका फल आत्मा अपने अंदर एकत्रित करती रहती है, जिसे हम भाग्य कहते हैंl आज हम जो भी कर्म करते हैं वह हमारे अगले जन्म का प्रारबद्ध तय करता हैl जब हमारी आत्मा इस शरीर को छोड़ नए शरीर में प्रवेश करती है तब आदमी का पुनर्जन्म होता हैl जब वह इस संसार की मोहमाया में लिप्त रहता है तब उसकी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने उसे पुनः जन्म लेना होता हैl उसे कर्म करके उनके परिणामों को भुगतने पुनः पुनः जन्म लेना पड़ता हैl और यह चक्र चलता ही रहता हैl इस चक्र से बाहर निकलने सनातन हमें सिखाता है कि कर्म करते रहो और उसके परिणामों को ईश्वर पर छोड़ दो ताकि उसका फल आत्मा अपने अंदर एकत्रित ना कर सकेl इसके साथ सदा इस बात का एहसास दिलाना है कि मैं आत्मा हूँ मैं यह शरीर नहींl ये महसूस होते ही पुराने कर्म कटने लगते हैं और हम मोक्ष की तरफ बढ़ने लगते हैंl

3- साधना के मार्ग : इसे हम चतुर्विध योग भी कहते हैंl

क) – ज्ञान योग – ज्ञान योग में हमें समझाया जाता हैं कि सत्य क्या है और असत्य क्या है? ये हमें शास्त्रों को सुनकर, सुनी बातों पर मनन कर और निरंतन अभ्यास से हमारी प्रेक्टिस में आ जाता हैl

ख) – भक्ति योग – उस परम सत्ता को पूर्णतः स्वयं को समर्पित कर देनाl इसमें नव विधा भक्ति आती हैl

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

श्रवण, कीर्तन, नामस्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य एवं आत्मनिवेदनl

श्रवण : भगवान के गुणगान, उनकी कथाए एवं उनकी लीलाओं का श्रद्धा पूर्वक श्रवण करनाl श्रवण भक्ति हमारे मन को शांति प्रदान करती हैl हमारे विचार सकारात्मक हो जाते हैंl हमारे जीवन के बुरे दिनो में हमारी सहन शीलता बढ़ जाती हैl

कीर्तन : भगवान के गुणगान, उनकी कथाए एवं उनकी लीलाओं को श्रद्धा पूर्वक गायन करनाl कीर्तनकार जब कीर्तन करते हैं तब सुनने वाले वही नाम को दोहराना शुरू करते हैंl साथ में ढ़ोल, मंजीरे, मृदंग, झाँझ, हारमोनियम और तालियों की गूंज के साथ अगरबत्ती, धूप, फूलों की खुशबू वातावरण में सामूहिक ऊर्जा उत्पन्न करती है जो सम्पूर्ण माहौल को धार्मिक और भक्तिमय बना देता हैl

नामस्मरण : ये सबसे सरल भक्ति का प्रकार हैl भगवान के नाम का सतत स्मरण करनाl सोते -जागते, उठते -बैठते, खाते -पीते, सुख में – दुःख में भगवान के नाम को सतत जपते रहनाl नाम स्मरण मन की चंचलता को कम करता हैl मन को स्थिर रखता है और हमारे मन से डर दूर होता हैl

पाद सेवन : वास्तविकता में प्रभु हमारे पास नहीं कि हम उनके चरणों की सेवा कर सकेंl इसीलिए हम मंदिर में जाकर उस परिसर को साफ करते हैंl प्रभु मूर्ति में चरणों को दबाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैंl हम मानस पूजा के माध्यम से भी भगवान के श्री चरणों की सेवा करते हैंl

अर्चन भक्ति : सगुण प्रभु की प्रतिमा या फोटो की पूर्ण भाव भक्ति और पूर्ण पूजा सामग्री के साथ पूजा करते हैंl श्लोक या स्तोत्र गाते हुए पूजा करते हैंl या फिर मानस पूजा करते हैंl

वंदन भक्ति : अहंकार त्याग कर प्रभु के श्री चरणों में शीश नवाकर नमन करते हैंl ऐसा करने से हमारा घमंड चूर चूर हो जाता हैl और हम विनम्र होने लगते हैंl हमारा दूसरों को देखने का दृष्टिकोण ही बदल जाता हैl हम भक्ति के रंग में डूबने लगते हैंl हम सभी प्रभु के अंश हैं इस बात पर हमारा पक्का विश्वास बैठने लगता हैl

दास्य भक्ति : प्रभु हमारे स्वामी हैं और हम उनके दास हैंl हम उनकी सेवा हेतु तत्पर हैंl हम उनकी आज्ञा पालन हेतु तैयार हैंl ऐसा करने से हम बिना फल की चिंता किये हर कर्म को खुशी खुशी करने को राजी हो जाते हैंl

सख्य: अर्थात प्रभु को अपना मित्र मानिएl उससे अपने मन की सभी बातें कीजिएl जिससे मैं और वो एक ही हैं ये बात हमारे जीवन को सार्थक बना देती हैl

आत्मनिवेदन : आत्मिक रूप से प्रभु के सामने आत्मसमर्पण करनाl अर्थात अपने तन से मन से, वाचा से, कर्मो से अपने आपको भगवान को समर्पित करना होता हैl हमारे साथ जो हो रहा है फिर वो अच्छा हो या बुरा वो सब उस प्रभु की इच्छानुरूप हो रहा हैl जैसी प्रभु इच्छाl आत्म निवेदन करते करते भक्त उस महासत्ता में इतना तन्मय हो जाता है कि उसे अपना भान ही नहीं रहताl उसका अपना कोई वजूद ही नहीं बचताl

 – क्रमशः

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© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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