श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय १७

(आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद)

(ॐ तत्सत्‌के प्रयोग की व्याख्या)

तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।

दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।25।।

मोक्ष कांक्षी जन सभी ‘‘तत‘‘ का करते उपयोग

यज्ञ, क्रिया, तप आदि कर, तजते हैं सब भोग ।।25।।

 

भावार्थ :  तत्‌अर्थात्‌’तत्‌’ नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है- इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं।।25।।

Uttering Tat, without aiming at the fruits, are the acts of sacrifice and austerity and the various acts of gift performed by the seekers of liberation.।।25।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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