श्री यशोवर्धन पाठक
☆ संस्मरण ☆
☆ “मित्रता दिवस विशेष – बचपन की यादों में स्मृति शेष अशोक…” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
यादों में जब खो जाता है मन ,
दुनिया की सुधि बिसराता है मन
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माईं अशोक घर पर है कि स्कूल गया या फिर बुआ रंजन घर पर है कि स्कूल गया , ऐसी ही बातों से हम दोनों के दिन की शुरुआत होती थी । सुबह 7. 30 बजे स्कूल जाने के लिए जब हम दोनों तैयार हो जाते तो फिर हमलोग एक दूसरे के घर पर जाकर ऐसी ही आवाज लगाते और फिर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर शैतानियां करते हुए स्कूल पहुंच जाते ।अशोक के पूज्य पिता हमारी अम्मा जी के ऐसे मुंह बोले भाई थे जिनको अम्मा जी ने लगभग 45 साल राखी बांधी।जबलपुर के गलगला क्षेत्र में हमारे पड़ोस में वर्मा जी के घर से बिल्कुल लगा हुआ हमारा घर याने हम दोनों दिन भर एक दूसरे के घर में धमाल चौकड़ी मचाते रहते थे । स्कूल से 12 बजे जब हम घर आते दोनों में किसी के ही घर हम लोग खाना खा लेते और फिर स्कूल का होम वर्क करने के बाद या तो हम लोग खेलते रहते या फिर आसपास घूमने निकल जाते । हम लोग घर के सदस्यों के साथ या तो कैरम खेलते या फिर अट्टू याने कन्ना दूडी खेलते रहते । अट्टू खेलने के लिए कौड़ी के लिए स्कूल के बाद जब घूमने जाते तो इमली के झूठे बीज ढूंढ कर लाते फिर उन्हें धो कर बीच से फोड़ कर अट्टू खेला करते ।बचपन बहुत प्यारा होता है । पढ़ाई और लिखाई के अलावा हमारी न तो कोई जिम्मेदारी होती है और न ही कोई तनाव । हमारी दोस्ती और हमारी मस्ती यही। हमारी रोजाना की जिंदगी होती है और बड़े होने पर यही हमारी जिंदगी के यादगार पल बन जाते हैं ।बस यही हम दोनों के साथ भी ऐसी ही बचपन की मस्ती थी जिसमें हम पूरे समय खोये रहते थे ।
बचपन का ऐसा ही ही एक मनमोहक प्रसंग हम दोनों के बीच चाहे जब बातचीत का विषय बनता था जब ज्हम दोनों एक बार स्कूल से आने के बाद बातें करते हुए घूमते निकल गये ।उस समय हम दोनों प्रायमरी स्कूल की दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ते थे । रास्ता तो हम दोनों को घर के आसपास का ही याद था लेकिन घूमते हुए हम लोग दूर निकल गये और घर तक आने का रास्ता भूल गए, फिर काफी देर भटकते रहे और यहां हम दोनों की खोजबीन शुरू हो गई यहां तक कि पुलिस में भी खबर करने का सोचा जाने लगा। हम लोगों को भटकते हुए उस समय एक टेलर की पत्नी ने देख लिया । इस टेलर की पत्नी हम लोगों को पहचान गई। वह हमारे परिवार से परिचित थी । हम दोनों को वो तुरंत अपने घर ले गयी और बढ़िया नाश्ता कराया और ठंडा शरबत भी पिलाया । उसके बाद उसने हम दोनों को हमारे घर पहुंचाया । घर पहुंचने पर हम लोगों को डांट तो पड़ी ही साथ में अपने अपने घर पर पिटाई भी हुई ।
अशोक के साथ ऐसी न जाने कितनी यादें हैं कि सुनाते सुनाते भी मन न भरे । हम दोनों जब भी मिलते तो बचपन की इन्हीं यादों के आसपास घूमते रहते ।
अशोक मेरे बचपन के पहले मित्र थे। याने इस दुनिया में आने के बाद जब हमें सोचने समझने और बोलने चालने की अक्ल आई तो मित्र के रूप में हमने अशोक को सामने पाया और हमें दोस्ती का भी अर्थ समझ में आया । दिन बीतते रहे और हम भी अपने अपने परिवार के साथ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए लेकिन हमारा मिलना बराबर जारी रहा और जब भी मिलते तो बचपन की तमाम बेवकूफियों को को भी याद करते और उस समय हम अपने वर्तमान को भूलकर अपने बचपन की दुनिया में खो जाते ।
अशोक के जन्म दिवस पर हम नियमित रूप से प्रतिवर्ष पहुंचते और 22 अप्रैल का मुझे बड़ी बेसब्री से इंतजार भी रहता लेकिन ये इंतजार कब तक । कभी तो इस इंतजार की घड़ियां खत्म होना थी और एक दिन वह भी खत्म हो गई ।
आज अशोक हमारे साथ नहीं है लेकिन उसकी कभी खत्म न होने वाली ढेर सारी यादें हैं और वो भी बचपन की । बस यही मेरे लिए बहुत है ।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







