श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंगड़ाई।)

?अभी अभी # ७७२ ⇒ आलेख – अंगड़ाई  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Pandiculation)

करवट बदली,

अंगड़ाई ली

सोया हिंदुस्तान उठा…

हिंदुस्तान तो कब का उठकर और जागकर विकास के रास्ते विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है, और इधर हम एक सूर्यवंशी हैं,जो सूरज से आँखें मिलाने के बजाय बिस्तर पर पड़े पड़े अंगड़ाई ले रहे हैं। वैसे देखा जाए तो हम इतने आलसी हैं कि अंगड़ाई लेने में भी हमें जोर आता हैं। काश, हमारी अंगड़ाई भी कोई और ले लेता,तो हम तो हाथ पाँव भी नहीं हिलाते।

लेकिन वह कहावत है न, “न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः”,इसलिए उबासी लेने से अंगड़ाई लेने तक का काम भी हमें खुद ही करना पड़ता है। वह भी अगर पत्नी गर्मागर्म चाय का प्याला लेकर,सर पर खड़ी नहीं हो जाती,तो हमारे अंग का कोई भी भाग अंगड़ाई में भाग नहीं लेता। ।

हमारी पत्नी की आंख हम पर गड़ी हुई है और हमारी आँखें उनके कोमल हाथों में मौजूद चाय के प्याले पर टिकी हुई है। सुबह सुबह जो चाय के लिए नटे,उसका पुण्य घटे। हमने भी आखिर प्याला उनके हाथों से लेकर मुंह को लगा ही लिया। चाय की चुस्की में ऐसा क्या है, कि बदन की सुस्ती तुरंत हवा हो जाती है। रात भर के अलसाए अंग का एकाएक कायाकल्प हो जाता है।

शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया है अंगड़ाई जो आलस्य या थकावट के कारण होती है और जिसके फलस्वरूप सारा शरीर कुछ पलों के लिए ऐंठ, तन या फैल जाता है।

अंग्रेजी में इसके लिए सही शब्द “पैंडिक्यूलेशन” है। इसके साथ जम्हाई भी आ सकती है और नहीं भी। इसे “विशेष रूप से धड़ और हाथ-पैरों में खिंचाव और अकड़न (जैसे थकान और नींद आने पर या नींद से जागने के बाद)” के रूप में परिभाषित किया गया है। ।

शरीर सबका टूटता है,अंगड़ाई सब लेते हैं।

हमने तो कुत्ते बिल्लियों तक को अंगड़ाई लेते देखा है। बच्चे जब तक पूरी तरह खेलकर थकते नहीं,सोते नहीं और एक बार सो गए,तो पूरी नींद लेने के बाद ही उठते हैं।

वे इतनी जल्दी बिस्तर नहीं छोड़ सकते।

वैसे शायर लोग अंगड़ाई को हुस्न और जवानी से जोड़ देते हैं। बिना अंगड़ाई के कोई हसीना जवान नहीं होती। उम्र की एक दहलीज पर अंगड़ाई ली जाती है,और जवानी की ओर कदम उठ जाता है। अंगड़ाई,शायरों की जुबानी ;

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की

तुम क्या समझो,

तुम क्या जानो

बात मेरी तन्हाई की

– क़तील शिफ़ाई

अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ

देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ

-निज़ाम रामपुरी

सितारे सो गए अंगड़ाई लेकर

कि अफ़्साने का अंजाम आ रहा था

– अब्दुल हमीद ‘अदम’

कौन अंगड़ाई ले रहा है ‘अदम’

दो जहाँ लड़खड़ाए जाते हैं

-अब्दुल हमीद ‘अदम’

सुना गईं थीं जिन्हें तेरी मुल्तफ़ित नज़रें

वो दर्द जाग उठे फिर से

ले के अंगड़ाई

-साहिर लुधियानवी

सुबह का वक्त है,

हमने अपने अलसाए

बदन पर आँख गड़ाई

देखा,वह भी ले रहा है

पहले जम्हाई

और फिर अंगड़ाई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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