हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३६ ⇒ कीड़े मकोड़े ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कीड़े मकोड़े…“।)

?अभी अभी # १०३६ ⇒ आलेख –  कीड़े मकोड़े ? श्री प्रदीप शर्मा ?

worms & insects 

आप इन्हें कीड़े मकोड़े कहें, या कीट पतंग, रेंगने वाले, उड़ने वाले, जमीन के अंदर रहने वाले, ये जीव बेचारे इस सत्य से अनभिज्ञ हैं, कि ये नर्क का जीवन भोग रहे हैं। भोग में रस होता है और इनकी भी यह भोग योनि है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच पसरी माया का भेद, एकमात्र केवल मानव ही जान पाया है, क्योंकि उसमें भेद बुद्धि है।

प्राणी मात्र में ईश्वर का वास होते हुए भी, वह ईश्वर तत्व से कोसों दूर है। मनुष्य जन्म हमें कितनी भोग योनियों के बाद प्राप्त हुआ है, विज्ञान इस सत्य को आज तक नहीं जान पाया। डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत एक अलग कहानी कहता है तो हमारे विभिन्न धर्म ग्रंथ कुछ और। कोई मनु की संतान है तो कोई adam eve और आदम हौवा की। लेकिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और इसीलिए वह अपने आप को ईश्वर के अधिक करीब पाता है।।

सृष्टि के जन्म और प्रलय अथवा कयामत की भी कई गाथाएं हैं। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा जी को इस सृष्टि का जन्मदाता, भगवान विष्णु को पालनकर्ता और शिव को संहारकर्ता माना गया है। एक अज्ञात शक्ति है, उसे आप जितना चाहे नाम और स्वरूप दे सकते हैं। सब कुछ जानते हुए भी, इंसान के हाथ में कुछ नहीं है।

एक समझदार प्राणी होने के कारण आज इंसान विश्व की जनसंख्या को लेकर चिंतित और परेशान है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी वह इंसान को ही जिम्मेदार मानता है। सभ्यता की कीमत प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद करके ही चुकाई जा सकती है। मनुष्य को अभी और विकसित होना है, उसे मानव से महामानव और खुद से खुदा यानी इंसान से भगवान बनना है।।

वह आज भी अवतारवाद में विश्वास करता है। वो मसीहा आएगा, और हमें कल्कि अवतार की इतनी आस है कि हम हर महान इंसान में उसे ढूंढने लग जाते हैं। भक्तों के अनुसार तो कई कल्कि अवतार अभी भी इस धरा पर विचर रहे होंगे।

एक कीड़ा मकोड़ा बेचारा इन सबसे अनजान है। उसका तो जन्म ही कितने समय के लिए हुआ है, वह नहीं जानता। उसे कहीं भी कहीं भी, मक्खी और मच्छर की तरह मसल दिया जाता है। जीवः जीवस्य भोजनम्, कौन कब किसका आहार बन जाए, क्या पता।।

रेंगने वाले कीड़े अक्सर ज़मीन के अंदर ही रहते हैं, इधर दिन में बाहर आए और किसी का शिकार बने। बेचारे इसलिए रात में ही बाहर आते हैं। मक्खी मच्छर तो गंदगी में ही पनपते हैं, ईश्वर इन पर इतना मेहरबान है कि इनके जनसंख्या नियत्रण की चिंता तो इंसान भी नहीं कर पाता। ये थोक में पैदा होते हैं, और थोक में मुक्ति पाते हैं। ईश्वर जाने उनकी यात्रा कब शुरू हुई और कब तक चलेगी। कितने जन्म उन्हें और लेने पड़ेंगे, अभी इंसान बनने के लिए। क्या पता कभी बन पाएंगे भी या नहीं।

देवताओं को दुर्लभ यह मानव जन्म हमें तो मिल गया, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के बाद किसको मिलेगा, किसको नहीं मिलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इंसान एक समझदार प्राणी है, वह कीड़े मकोड़ों की तरह बच्चे पैदा करके नहीं छोड़ सकता। वह भी जानता है, बच्चे दो ही अच्छे।।

कीड़े मकोड़ों में किसी तरह के विकास की संभावना नहीं, फिर भी वे सृष्टि का एक आवश्यक अंग हैं, वे कभी प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करते, केवल मनुष्य मात्र ही ऐसा प्राणी है, जो उनका दोहन और शोषण करता है।

जिस दिन हम ईश्वर की अहैतुकी कृपा और इन कीट पतंगों और कीड़े मकोड़ों के अस्तित्व का कारण जान जाएंगे, शायद इस सृष्टि और ब्रह्मांड के रहस्य को भी पहचान पाएंगे। सुबह की इस अमृत वेला में एक कॉकरोच मुझे देखकर मुंह छुपा रहा है, और एक मैं हूं, जो उसे देख यह सोच रहा हूं, क्या इसमें भी परमेश्वर का वास है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – योग-साधना/Yoga ☆ बालिकाओं के लिए योग ☆ सुश्री राधिका  बिष्ट ☆

सुश्री राधिका  बिष्ट

(स्वामी सत्यानंद सरस्वती की परंपरा में दीक्षित योग शिक्षिका। परमार्थ योग स्कूल ऋषिकेश और अय्यंगार हिमालयन योग केंद्र धर्मशाला में प्रशिक्षित। योग सत्र संचालन का 20 वर्षों का अनुभव।)

☆ बालिकाओं के लिए योग ☆ सुश्री राधिका  बिष्ट ☆

बालिकाओं के लिए योग क्यों आवश्यक है? इससे उन्हें क्या लाभ मिलते हैं?

बालिकाओं के लिए योग बहुत लाभदायक है। यह शरीर को लचीला, मजबूत और सहनशील बनाता है। इससे ‘स्टैमिना’ और ‘बैलेंस’ में सुधार होता है जो कि शास्त्रीय नृत्य जैसी विधाओं के लिए सहायक हैं। योग से ‘फोकस’ और एकाग्रता बढ़ती है जिससे पढ़ाई में अधिक मन लगता है।

बालिकाओं की ‘हार्मोनल ग्रोथ’ को यह सुगम बनाता है क्योंकि योग से ग्रंथियां क्रियाशील होती हैं। इससे उनके मानसिक और ‘इमोशनल’ स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

योग से धमनियों में ऊर्जा का संचार होता है। अंतर्मन शुद्ध, शांत और आनंदमय होता है। जो बालिकाएं नियमित योग करती हैं, उन्हें तनाव और ‘डिप्रैशन’ होने की संभावना नगण्य हो जाती है।

बालिकाओं के सर्वांगीण विकास में योग अत्यंत सहायक है। तन-मन के संतुलन से आत्मविश्वास और आत्मिक बल बढ़ता है। इससे विषम परिस्थितियों से जूझने की क्षमता विकसित होती है।

योग से आत्म-संयम और आत्म-अनुशासन गहरा होता है। इससे सजगता या ‘माइंडफुलनेस’ का उदय होता है जो कि बालिकाओं के संपूर्ण और समग्र भविष्य की आधारशिला तैयार करते हैं।

© सुश्री राधिका बिष्ट

योग शिक्षिका

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९२ ☆ हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९२ ☆

☆ हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

आषाढ़ की पहली फुहार के साथ ही धरती की गोद में सोए बीज जाग उठते हैं। सावन उन्हें हरियाली का आशीर्वाद देता है और भादों तक वे नवजीवन का उत्सव बन जाते हैं। यही ऋतु हमें सिखाती है कि प्रकृति में किया गया प्रत्येक निवेश समय के साथ चक्रवृद्धि होकर लौटता है।

पेड़-पौधों में लगाया गया श्रम, समय और प्रेम केवल एक पौधा नहीं उगाता, बल्कि शुद्ध वायु, शीतल छाया, वर्षा, उपजाऊ मिट्टी, पक्षियों का संगीत और आने वाली पीढ़ियों का सुरक्षित भविष्य भी रचता है। धन का निवेश सीमित लाभ देता है, किंतु हरियाली का निवेश जीवन का विस्तार करता है। एक पौधा वर्षों बाद हजारों बीजों में बदलकर प्रकृति की संपदा को निरंतर बढ़ाता रहता है।

आषाढ़, सावन और भादों केवल ऋतुएँ नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और संवर्धन का संदेश हैं। यह समय हमें याद दिलाता है कि यदि आज हमने एक पौधा रोपा, तो उसका फल केवल हमें नहीं, उन पीढ़ियों को भी मिलेगा जिनसे हमारा कभी परिचय भी नहीं होगा। यही प्रकृति का सबसे बड़ा चक्रवृद्धि प्रतिफल है।

आइए, इस हरित ऋतु में केवल वृक्षारोपण का संकल्प ही न लें, बल्कि हर पौधे को अपने भविष्य की अमूल्य पूँजी मानकर उसका संरक्षण भी करें। क्योंकि प्रकृति का यही निवेश ऐसा है, जो कभी समाप्त नहीं होता—वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन, आशा और समृद्धि का ब्याज देता रहता है।

“धरती की सबसे समृद्ध तिजोरी बैंक का लॉकर नहीं, बल्कि वह मिट्टी है जिसमें प्रेम से रोपा गया एक पौधा आने वाले कल का वटवृक्ष बनकर पीढ़ियों को जीवन लौटाता है।”

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१९ ☆ लन्दन से >> सृजन गर्भ में पलती रचना कर्म की सहयात्री विधा ..समालोचना ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१९ ☆

?  लन्दन से >> आलेख – सृजन गर्भ में पलती रचना कर्म की सहयात्री विधा ..समालोचना ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

साहित्यिक विमर्श में यह प्रश्न एक अनुत्तरित पहेली की भाँति उपस्थित रहता है, कि क्या आलोचना वास्तव में सृजन है?

सृजन (रचनाकर्म) क्रिएटिव और मौलिक होता है, जबकि आलोचना उसी सृजन का प्रतिबिंब। किंतु, यदि हम ‘सृजन’ शब्द को केवल ‘कुछ नया रचने’ के संकुचित अर्थ से मुक्त कर ‘अर्थ के नए आयाम उद्घाटित करने’ के व्यापक संदर्भ में देखें, तो समालोचना का स्वरूप नितांत भिन्न हो जाता है।

समालोचक भी अनुवादक की तरह मूल लेखक में परकाया प्रवेश कर एक दार्शनिक और वैचारिक यात्रा करता है।

आलोचना केवल रचयिता की त्रुटियों का लेखा-जोखा या ‘नीर क्षीर’ विवेक करने वाली कोई दंडात्मक प्रक्रिया नहीं है। यह एक जटिल और रचनात्मक अनुशासित प्रक्रिया है। एक आलोचक के लिए केवल प्रखर बुद्धि या भाषाई सामर्थ्य ही पर्याप्त नहीं है, उसे गूढ़ गंभीर साहित्यिक दृष्टि, प्रभूत ज्ञान, तार्किक क्षमता और उच्च स्तरीय संवेदनशीलता का धनी होना पड़ता है।

जब कोई आलोचक किसी कृति का विश्लेषण करता है, तो वह केवल शब्दार्थ नहीं करता, बल्कि वह उस कृति के पीछे के मनोविज्ञान, तत्कालीन परिवेश, निहित सिद्धांतों और अपनी पांडित्यपूर्ण अंतर्दृष्टि के माध्यम से उस कृति को एक नई दृष्टि प्रदान करता है। यहाँ आलोचक का कार्य एक ‘व्याख्याता’ से ऊपर उठकर एक ‘सह-स्रष्टा’ का हो जाता है। वह मूल रचना के अंतर्निहित भावों को अपनी विवेचना से  उन ऊँचाइयों पर ले जाता है जहाँ तक शायद सामान्य पाठक की दृष्टि न पहुँच सके। अतः, आलोचना, सृजन का प्रति सृजन (Re-creation) है।

साहित्य के क्षेत्र में अक्सर यह विवाद उठता है कि क्या आलोचक का मत अंतिम होता है? इस संदर्भ में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का मंतव्य आज भी  प्रासंगिक और वैचारिक रूप से प्रबुद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि

“आलोचक हंस नहीं है। नीर-क्षीर की तरह सत्य-असत्य पर दिया हुआ उसका निर्णय ही अंतिम निर्णय नहीं हो सकता।”

यह कथन एक आलोचक की विनम्रता और उसके कार्य की सीमा को किसी हद में निर्धारित करता है। आलोचना का उद्देश्य किसी कृति पर ‘अंतिम मोहर’ लगाना नहीं, बल्कि समालोचना के पाठकों तथा मूल रचना के बीच एक ‘संवाद’ स्थापित करना है। साहित्य का प्रवाह निरंतर होता है। जैसे-जैसे समय बदलता है, समाज की दृष्टि बदलती है, और उसी के साथ एक ही कृति के नए अर्थ निकलकर सामने आते हैं। आलोचक का काम उस अर्थ की यात्रा को दिशा देना है, उसे किसी एक बिंदु पर स्थिर कर देना नहीं होता ।

भगवत गीता, रामायण, मानस, भागवत जैसे अमर ग्रन्थ इसीलिए अमर हैं, क्योंकि उन पर लगातार जाने कितने ही विद्वान सतत युग परिवर्तन के अनुरूप इन महान ग्रंथों की समालोचनाएं करते हुए इनके कथ्य और संस्कृति के संवाहक बने हुए हैं। गंभीरता से विचार करें, तो सृजन और आलोचना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक रचनाकार जब लिखता है, तो वह अनजाने में ही अपनी ही आलोचना भी रच रहा होता है । वह शब्दों का चयन करता है, काटता है, सँवारता है। दूसरी ओर, एक अच्छा आलोचक जब किसी कृति को परखता है, तो वह उस कृति की आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित करता है।

आलोचना का ‘सृजन’ होना इस बात में निहित है कि वह पाठक और कृति के बीच एक सेतु बनाती है। वह साहित्य के सिद्धांतों, दर्शन और समाजशास्त्र के उपकरणों से सुसज्जित होकर रचना को व्यापक फलक प्रदान करती है। वह स्वयं एक साहित्यिक विधा के रूप में ‘ललित’ और ‘गंभीर’ दोनों है।

“आलोचना”, यदि “समालोचक” हो तो उसे ‘सृजन’ मानने में संकोच का अर्थ साहित्य को संकुचित दृष्टि से देखना है।

समालोचना न केवल साहित्य की सुरक्षा करती है, अपितु उसे नवाचार की ऊर्जा भी देती है। समालोचक वह दीपक है जो कृति के उन कोनों को प्रकाशित कर देता है जहाँ तक लेखक की स्वयं की दृष्टि नहीं पहुँच सकी थी, या जिसे पाठक उपेक्षित कर बैठे थे।

अंततः, हम यह कह सकते हैं कि आलोचना का कार्य अंतिम निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि प्रश्नों की एक शोध श्रृंखला खड़ी करना है। और जहाँ प्रश्न होते हैं, वहीं जिज्ञासा होती है, और जहाँ जिज्ञासा है, वहीं सृजन की अनंत संभावनाएं निहित हैं। समालोचना, इस अर्थ में, एक सतत चलने वाली सृजनात्मक प्रक्रिया है जो साहित्य को जड़ होने से बचाती है।

आलोचक को यदि उसकी विवेचना को सृजन के समानांतर बनाना है तो उसे लेखक की चाटुकारिता एवं रचना के प्रति पूर्वाग्रह, से बचना चाहिए। उसे स्वयं विषय का विद्वान बनना चाहिए, उसे लेखकीय काया प्रवेश का गुण धर्म आना चाहिए, तभी वह ऐसी समालोचना कर सकता है, जिसे विधा के स्वरूप में मान्यता है।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३५ ⇒अंतर्ज्ञान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतर्ज्ञान…“।)

?अभी अभी # १०३५ ⇒ आलेख – अंतर्ज्ञान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

= INTUITION =

जानने की प्रक्रिया को ज्ञान कहते हैं। इसके लिए ईश्वर ने हमें एक नहीं पांच पांच ज्ञानेंद्रियां प्रदान की हैं। पांच ही कर्मेंद्रियों से मिल जुलकर इस मनुष्य का यह विलक्षण व्यक्तित्व बना है। चेतन शक्ति, आप जिसे चाहें तो प्राण भी कह सकते हैं, हमारे पंच तत्वों से निर्मित शरीर में सतत प्रवाहित होती रहती है। हमारा उठना, बैठना, सोना, जागना, ऊंघना, हंसना, रोना, देखना, सुनना, बोलना, चखना, छूना जैसी सभी नियमित क्रियाएं मन मस्तिष्क द्वारा संचालित होती है। हमें लगता है, हम ही सब कुछ कर रहे हैं। जब कि सब कुछ अपने आप ही ही रहा है।

अगर आप ही कर्ता हैं, सब कुछ कर रहे हैं, तो रोक दीजिए सब कुछ। आँखें खुली रखिए और कुछ मत देखिए, मत सुनिए कुछ भी इन दोनों कानों से, सांस तो आप ही ले रहे हैं न। मत लिजिए एक दो दिन सांस, क्या बिगड़ जाएगा।

भूख प्यास का क्या है, रह लेंगे कुछ दिन भूखे प्यासे।

आते जाते विचारों पर भी पहरा बिठा दीजिए। अगर विचार अतिक्रमण करते हैं, तो उन पर बुलडोजर चला दीजिए।।

मन, बुद्धि और अहंकार भी आपका नहीं है। इसलिए अब मान भी जाइए, आपका अपना कुछ भी नहीं है। आपको इस पावन धरा पर उतारा गया है और आप अपने आप में एक सर्वगुण संपन्न, एक मानव हैं।

A perfect human being creation of God, The Almighty!

मनुष्य जब पैदा होता है तो एक अबोध बालक होता है। शारीरिक विकास के साथ साथ ही उसका मानसिक विकास भी होता चला जाता है। सीखने की प्रवृत्ति उसकी जन्मजात ही होती है। परिवार और परिवेश के अलावा स्कूल वह स्थान होता है, जहां से वह सीखता है, ज्ञान अर्जित करता है। अनुशासित ज्ञान को अध्ययन कहते हैं। ज्ञान के स्तर को डिग्री में विभाजित किया गया है। आप पढ़ते रहें, डिग्रियां हासिल करते रहें।

अध्ययन के लिए हमें ट्यूशन भी लेनी पड़ती है जो आज की भाषा में कोचिंग कहलाती है। सीखना एक सतत प्रक्रिया है जो अनुशासित डिग्रियां हासिल करने के पश्चात भी कभी खत्म नहीं होती। बाहरी ज्ञान की कोई सीमा नहीं। नौकरी धंधे और कामकाज में लग जाने के बाद कौन इंसान बाल भारती भाग १ और फिजिक्स केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी पढ़ता है। अब काहे की पढ़ाई, काहे की ट्यूशन और काहे की परीक्षा। अब तो गाड़ी चल निकली। ।

ट्यूशन अगर बाहरी ज्ञान है, तो इन्ट्यूशन अंतर्ज्ञान ! एक ज्ञान का भंडार हमारे अंदर भी है जिसका बाहरी ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। हम सोचते, समझते ही नहीं, चिंतन मनन भी करते हैं। हमारी कुछ आंतरिक प्रतिभाएं समय और परिस्थिति के साथ उभरकर बाहर आती हैं।

साहित्य, संगीत और अन्य ललित कलाओं को बस एक बार अवसर मिला और टूटे बांध की तरह वह प्रवाहित होने लगती है।

धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान को आप अलग नहीं कर सकते। बाहरी प्रकृति और हमारे अंदर की सृजन की प्रवृत्ति का जब मेल होता है तो एक महाकाव्य की रचना होती है। संगीत की कोई धुन किसी किताब अथवा साज से नहीं निकाली जाती, वह धुन अंदर से प्रकट होती है बाहर तो सिर्फ उसका स्वरूप ही दिखाई देता है।

टैगोर की गीतांजलि किसी शब्दकोश अथवा थिसारस या इनसाइक्लोपीडिया की उपज नहीं, यह कवि का अंतर्ज्ञान है जो सरिता की तरह सतत प्रवाहित होता रहता है।।

विश्व के अधिकांश वैज्ञानिक प्रयोग, खोज हों या अविष्कार, धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान का ही परिणाम हैं। कितनी विचित्र विधा है यह अंतर्ज्ञान ! ज्ञान पहले अंदर गया और बाद में कोई सिद्धांत बनकर बाहर निकला। एक चेतन मन तो है ही, एक अवचेतन मन भी है, जिसकी स्मृति के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। चेतना के ऊपर पराचेतना का भी अस्तित्व है। अंतर्दृष्टि और अंतर्ज्ञान असीमित है।

एक गीत है, एक आवाज है, एक धुन है। हमें सिर्फ सुनाई देती है लेकिन उसका प्रभाव देखिए, आंख खोलकर नहीं, आंख बंद कर कर, कान खोलकर ;

मेरी आंखों में बस गया कोई रे, मैं क्या करूं…

क्या यह अतिक्रमण नहीं। रोक सकें तो रोकिए इसे। चलाइए बुलडोजर। यह धुन है, ध्यान है, अंतर्ज्ञान है। नमन उन अनंत विलक्षण प्रतिभाओं को जिनका प्रकाश सूर्य की तरह सदा, सर्वत्र दैदीप्यमान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३४ ⇒ ज्ञान-गंगा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ज्ञान-गंगा…“।)

?अभी अभी # १०३४ ⇒ आलेख – ज्ञान-गंगा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ज्ञान का गंगा से वही संबंध है, जो संगीत का सरिता का ! सङ्गीत अगर सरिता की तरह कलकल बहता है, तो ज्ञान वह पवित्र धारा है, जिसमें स्नान से अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है।

ज्ञान का कॉपीराइट गंगा को ही क्यूँ ! और भी नदियाँ हैं, वे सब भी पवित्र हैं। कालिंदी, गोदावरी की तो छोड़िए, अमरकंटक से निकली नर्मदा भी किसी से कम नहीं। ठीक है, हिमालय की बेटी है, शिवजी की जटाओं से निकली है, सर्व-गुण-सम्पन्न और लाडली भी तो है। जिस गंगा में स्नान मात्र से समस्त पापों का क्षय हो जाता हो, ज्ञान की गंगा में भी

यही सब गुण समाहित हैं।।

जिस तरह गंगा का उद्गम गंगोत्री है, और विसर्जन गंगासागर में, उसी प्रकार विवेक ज्ञान की गंगोत्री है और ज्ञान की परिणति ज्ञानसागर ! ज्ञान के साथ गुण का जब भी साथ हुआ है, वही तो, “ज्ञान-गुण-सागर” हुआ है।

लंका यूँ ही नहीं लाँघ ली जाती।

गंगा क्यूँ न इतराए, जब वह शिवजी की जटाओं में लहराए !

जिसका कोई आदि न अंत, वह जो आशुतोष अनंत, जिन्हें ध्यावै सभी देव-नर-मुनि-श्रेष्ठ-संत, कैलाशवासी कहलाएं नीलकंठ।

सतगुरु में ज्ञान और गंगा दोनों का वास है। गुरु और गंगा दोनों मोक्ष प्रदान करते हैं। जहाँ ज्ञान, त्याग, वैराग्य, असीम करुणा और संपूर्ण सृष्टि के कल्याण की भावना सनातन रूप से बह रही है, ऐसी गंगा में क्यों न स्नान किया जाय !

धारा सतगुरु !

लेत नहाए क्यों न ?

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३३ ⇒ इत्ती सी खुशी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “इत्ती सी खुशी…“।)

?अभी अभी # १०३३ ⇒ आलेख – इत्ती सी खुशी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

खुशी बड़ी छोटी नहीं होती, खुशी, सिर्फ खुशी होती है। प्रकृति का चितेरा कवि विलियम वर्ड्सवर्थ जब हजारों डेफोडिल्स को एक साथ खिला हुआ देखता है, तो अनायास कह उठता है, thousands I saw at a glance ! यानी सिर्फ एक झलक ही काफी होती है, कुदरत के नजारे को आत्मसात करने के लिए ! और वह कह उठता है,

A thing of beauty, is joy for ever. पलक बंद कर लूं, कहीं छलक ही न जाए। मुझे खुशी मिली इतनी, कि मन में न समाए।

बच्चों की छोटी सी बंद मुट्ठी में सपने ही सपने होते हैं, खुशियां ही खुशियां होती हैं। उनकी खुशियों में महल नहीं होते, इत्ती सी चीज के लिए वे मचल जाते हैं, आसमान सर पर उठा लेते हैं।मुझे चांद चाहिए। कितनी बड़ी मांग, कितना बड़ा हठ। बालहठ ! मां समझती है, वह पानी में चांद की परछाई ला देती है। इत्ती सी खुशी। बच्चा खुश। बच्चे छोटी छोटी सी बात पर ताली बजाने लगते हैं, खुश होकर नाचने लगते हैं। बड़े सोचते हैं, इत्ती सी खुशी और इत्ता बड़ा इज़हार। और अगर यही बड़े करें, तो लोग उन्हें पागल समझें। बड़े लोग न इत्ती सी खुशी समझते हैं, और न इत्ती सी बात।।

प्यार में खुशी भी शामिल होती है। प्यार को चाहिए, बस एक नजर, एक नज़र। नजर उठती है, मिलती है, और झुक जाती है।

कितने कम समय में कितना बड़ा काम। ऐ प्यार तुझे सलाम। ढाई आखर ही तो हैं प्यार के।अंग्रेजी में बोलें तो ढाई शब्द ! I love you. इत्ते कम शब्दों में खुशी कहां से कहां पहुंच जाती है। प्यार दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाता है।

दो मीठे शब्द बोलने में क्या जाता है। इत्ता सा काम, और कितना बड़ा ईनाम ! आप चाहें तो राई का पहाड़ बनाएं, अथवा गर्म गर्म कढ़ाई में इत्ती सी राई डालें। इत्ती सी राई कमाल बता देती है। इत्ती सी हींग, इत्ता सा जीरा लेकिन कित्ता सारा स्वाद। इत्ते में कित्ता मज़ा। अधिक तेल, खटाई, मसाला, सज़ा ही सज़ा।।

हमारे पास पैसा, धन दौलत, रुतबा और ओहदा और इज्ज़त सम्मान होते हुए भी कितने गरीब हैं हम, अगर हममें भाव का अभाव है। खुशी और प्यार, भाव का खेल है। बहुत खुश हैं आप, इत्ती सी खुशी बांटें भी। लोग आपको प्यार करते हैं, इत्ता सा प्यार आप भी तो बांटें ! किसी का इत्ता सा दुख भी बांटकर देखें, कित्ता संतोष होता है। गर्मी और उमस में, जब हम पसीने पसीने हो रहे होते हैं, कहीं से इत्ता सा हवा का झोंका आता है, हमारी सब गर्मी दूर कर जाता है। भाव और अभाव में, इत्ता सा अंतर होता है।

आप क्या दे सकते हैं भगवान को। सिर्फ भाव से भोग लगा सकते हैं, वे इत्ता सा भी नहीं खाते। वे सिर्फ भाव के भूखे हैं। आपने जो भोग लगाया, वह ईश्वर का प्रसाद हो गया। इत्ता सा प्रसाद कितनों तक पहुंच जाता है।

सिर्फ भाव का भोग है यह, प्रसाद का नहीं। इत्ता सा प्रसाद, कित्ता सारा भाव।।

एक चिड़िया पल भर के लिए आपके सामने आती है, दाना चुगकर चली जाती है, आप खुश हो जाते हैं। इत्ती सी खुशी दे गई वह आपको। रात को आपके गमले में जो कली मुस्कुराई थी, आज सुबह वह फूल बन गई। आप इत्ती सी खुशी भी किसी के साथ बांटना चाहते हैं। सुना है बांटने से खुशी बढ़ती है, और दुख कम होता है।।

इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें। यह इतना शब्द कितना बड़ा है, कोई नहीं जानता। इत्ती सी बात है, लोग समझ जाएं तो क्या बात है। आप किसी बच्चे की चॉकलेट में से, इत्ती सी चॉकलेट मांगकर देखें, वह नहीं देगा। मेरी है ! बच्चों का इत्ता, कित्ता बड़ा होता है, जितनी उनकी हथेली, जितना उनका कद। जब उनके छोटे छोटे हाथ इशारा करके बताते हैं कि मेरे पास इत्ते सारे खिलौने हैं, तब उनकी खुशी देखते ही बनती है।

आप भी तलाशिए अपने अंदर, अपने आसपास, इत्ती सी खुशी, इत्ता सा प्यार। समेट लें, जितना समेट सकें, और हमें भी बांट दें, इत्ती सी खुशी, इत्ता सा प्यार। हमारे आसपास, ना कोई दुखी रहे, ना कोई उदास। लो, एक कली मुस्काई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८३ – देश-परदेश – सांप निकलने पर लकीर पीटना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८३ ☆ देश-परदेश – सांप निकलने पर लकीर पीटना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त कहावत का चलन सबसे अधिक हमारे देश में ही होता है। अंग्रेज़ी की कहावत “Prevention is better than Cure” का सदुपयोग पश्चिम के देशों में ही होता है।

देश के किसी भी भाग में कोई आपदा आने से पूर्व कभी कोई तैयारी नहीं होती है। दुर्घटना हो जाने के बाद मात्र कुछ घंटों/ दिनों के लिए हम लोग विश्व के किसी भी देश से अधिक सक्रिय हो जाते हैं। इस सक्रियता का दसवां हिस्सा भी हम आपदा पूर्व तैयारी में खर्च कर देवें,  तो देश दुर्घटना रहित हो सकता है।

गर्मी के मौसम में आग लगना आम बात होती है। व्यवस्था को दोष मढ़ कर हमारा कार्य पूर्ण हो जाता है। अभी लखनऊ आग की लपटों में ताप बाकी है, मुंबई की पहली वर्षा ने ही समस्याओं का विकराल रूप सामने खड़ा कर दिया है।

किसी भी व्यवस्था के नियमों का पालन ना करने की हमारी आदत, घर से ही आरंभ हो जाती है। सोने के नियत स्थान पर भोजन ग्रहण करना हो या रोज मर्रा के तय नियमों की अनदेखी करना।

पहली बार जब आप कोई भी नियम का उल्लंघन करते हैं, उस दिन के बाद से ही आपके स्वभाव और आदतों में “अनुशासनहीनता” जन्म ले लेती है।

हम स्वयं भी बहुत सारे नियम तोड़ कर जीवन के कष्ट भोग रहें हैं। कॉलेज में मित्र के कहने पर जीवन में जब मदिरा का पहला प्याला ये कहकर उठाया था, कि बस आज पहली और आखिरी बार है। तब स्वयं ली गई प्रतिज्ञा टूट गई थी, उसके बाद हम उसके आसरे से ही, जी पा रहें है। स्वास्थ्य पर इसके विपरीत प्रभाव के हम सब अच्छे खासे जानकार हैं।

होटल में जब कभी छोटे समूह में जाते हैं, तो उस होटल के टेबल कुर्सी आदि को हम अपनी संख्या से लगवा लेते हैं। इससे वहां अव्यवस्था होती है, लेकिन हमको उससे क्या लेना देना?

जब तक हम स्वयं तय शुदा नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं करते हैं, तब प्रशासन, काम काज आदि के क्षेत्र में अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी होगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४२ – कंफर्ट ज़ोन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३४२ ☆ कंफर्ट ज़ोन… ? 

प्रकाशन के अपने व्यवसाय के संदर्भ में काग़ज़ के थोक विक्रेताओं के बाज़ार में हूँ। यह मुख्य शहर की एक संकरी गली है। इमारतों के पुनर्विकास के बाद ऊपरी मंज़िलों पर फ्लैट बने हुए हैं और नीचे दुकानें हैं। अपना काम समाप्त कर निकलने ही वाला हूँ कि सड़क पर कुत्तों के ज़ोर-ज़ोर से भौंकने के स्वर गूँजने लगे हैं।

देखता हूँ कि किसी फ्लैट में रहने वाली एक महिला अपने पालतू कुत्ते को घुमाने निकली हैं। कुत्ते के गले में बंधे पट्टे से लगी साँकल का एक सिरा महिला के हाथ में है। उसके दूसरे हाथ में डंडा है। इसी कुत्ते को देखकर और महिला के हाथ के डंडे के चलते गली के कुत्ते उनसे कुछ दूरी रखकर ही भौंक रहे हैं। गली के कुत्तों को आवारा या स्वतंत्र कहने का विकल्प पाठक अपने-अपने वैचारिक अधिष्ठान के अनुसार चुन सकते हैं।

तथापि इस आलेख का विषय आवारा या स्वतंत्र कुत्तों का भौंकना नहीं है। विषय है पालतू कुत्ते का उनकी ओर दृष्टि उठाकर भी न देखना। वह अपनी मालकिन के आश्रय में साँकल की परिधि में यहाँ- वहाँ कुछ सूँघता, कहीं-कहीं मुँह मारता चला जा रहा है। मेरी विचार-प्रक्रिया के केंद्र में इस घटना के संदर्भ में पालतू कुत्ते का व्यवहार है। क्रिया की प्रतिक्रिया, प्रकृति का नियम है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन ने इसे थर्ड लॉ ऑफ़ मोशन के द्वारा सिद्ध भी किया है। यह नियम कहता है कि किसी भी क्रिया के लिए हमेशा एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।

इस घटना में पालतू कुत्ता, गली के कुत्तों के भौंकने की प्रतिक्रिया में भौंक नहीं रहा है। सोचता हूँ, पराधीनता से मिलता लाभ भी शनै:-शनै: सुविधा के गणित में बदल जाता है। यदि इस पालतू के स्थान पर गली का कुत्ता होता तो प्रतिरक्षा में भौंकता, उस गली में अपना स्थान बनाने के लिए लड़ता या अपने को निर्बल पाकर भाग खड़ा होता, जो भी करता, कोई न कोई प्रतिक्रिया अवश्य देता। यद्यपि हम उपेक्षा को भी प्रतिक्रिया कह सकते हैं पर प्राणी के बौद्धिक स्तर को देखते हुए यह तर्कसंगत नहीं लगता। यहाँ तो साँकल के संरक्षण में भौंकने की प्रक्रिया विस्मृत हो जाना अधिक तार्किक जान पड़ता है। 

परजीविता के इस उदाहरण में अपने स्वामी से प्राप्त भोजन, पोषण, सुविधा ने कुत्ते के लिए एक कंफर्ट ज़ोन तैयार कर दिया है। कंफर्ट ज़ोन भीतर ही भीतर मानसिक ग़ुलामी के लिए तैयार कर देता है।

मानसिक गुलामी की भयावता पर लगभग दो दशक पूर्व लिखी अपनी कविता स्मरण हो आई। ‘मन के हारे’ शीर्षक की यह कविता कहती है,

समय ने ली करवट / पिंजरा अब खुला है,

कैसा मोह है / पंछी अब भी उसी में पड़ा है,

आयु बीती स्वतंत्र होने की प्रतीक्षा में,

आकाश मापने की मनीषा में,

पर-जैसे-जैसे / समय बीतता है,

तन के साथ / मन भी ग़ुलाम हो जाता है,

पंछी हो या मनुष्य / मानसिक ग़ुलामी भयावह है ! 

यूँ भी आसानी से अपना कंफर्ट ज़ोन बिरले ही छोड़ पाते हैं। जबकि तथ्य यह है कि धरती की कक्षा में बने रहने का मोह हो तो अंतरिक्ष में प्रवेश नहीं किया जा सकता। यात्रा लंबी करनी हो, सोद्देश्य करनी हो तो कंफर्ट ज़ोन छोड़ने का साहस करना ही होगा। अपनी प्रकृतिगत विशेषताओं, अपने सिद्धांतों और तदनुकूल आचरण के साथ ‘कदापि समझौता नहीं’ के तत्व को अपनाना ही होगा।

सार है कि अपने मूल के साथ अपने अस्तित्व के अभिन्न संबंध को अनुभव करो और गंतव्य की ओर बढ़ो। यदि ऐसा कर सके तो जीवन रीतने का दुख नहीं अपितु सार्थक बीतने का संतोष होगा। अस्तु!

 

© संजय भारद्वाज 

(प्रात: 6:01 बजे, 27 जून 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वैश्वीकरण के दौर में कबीर का मानवतावादी दर्शन ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त । कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख  – वैश्वीकरण के दौर में कबीर का मानवतावादी दर्शन।)

☆ आलेख – वैश्वीकरण के दौर में कबीर का मानवतावादी दर्शन ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भक्तिकाल के कवियों में कबीरदास का स्थान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। वे केवल संत या कवि ही नहीं थे अपितु सामाजिक चेतना, मानवीय मूल्यों और समरसता के प्रतीक विश्वप्रेमी थे, जिस पर मानव समाज का विकास सम्भव है। उनकी साधना वनखण्डों व गुफाओं में ले जाने वाली नहीं, मन के साथ-साथ आचरण से सम्बन्ध रखने वाली लोकसाधना थी। उन्होंने मन की शुद्धि और साधु- सत्संग पर समान रूप से बल दिया। उनको समाज में अच्छे और बुरे दो ही तत्व दिखाई देते थे, इसलिए उन्होंने अच्छे तत्व की प्रशंसा करते हुए बुरे तत्व से बचने का उपदेश दिया। उनका दर्शन किसी विशेष धर्म, सम्प्रदाय या वर्ग तक सीमित नहीं था। मानवता के कल्याण की भावना उसमें उपलब्ध है। विज्ञान, तकनीक एवं संचार के साधनों ने आज जहाँ विश्व को एक वैश्विक गाँव में परिवर्तित कर दिया हो, सांस्कृतिक विघटन, उपभोक्तावाद, असहिष्णुता, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण जैसी समस्याएँ सामने हों, ऐसे समय में कबीर का मानवतावादी दर्शन अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है।

कबीर की मानवतावादी विचारधारा में मनुष्य को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। उन्होंने धर्म, जाति और सम्प्रदाय की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर मानव की गरिमा को सर्वोपरि मानते हुए कहा– ‘ जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। ‘ कबीर के अनुसार मनुष्य की पहचान उसकी जाति या जन्म से नहीं, उसके ज्ञान और कर्म से होती है। वे जीवमात्र को एक ही परमपिता की संतान मानते हैं और सबको एक ही स्तर पर लाकर खड़ा कर देते हैं, किसी भी प्रकार के भेदभाव को स्वीकार नहीं करते, उदाहरणार्थ– ‘ एक बूँद से सब जग उपजा, कौन ब्राह्मण कौन शूद्र।’ वैश्विक दौर में जहाँ नस्लीय, धार्मिक और आर्थिक असमानताएँ हैं। कबीर का यह संदेश सामाजिक न्याय और समानता का आधार बन सकता है। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों की धार्मिक कट्टरता की आलोचना करते हुए कहा कि ईश्वर किसी एक धर्म की सम्पत्ति नहीं है। वे धार्मिक आडम्बरों का विरोध करते हैं और सच्चे आचरण को महत्व देते हैं। वैश्विक दौर में धार्मिक संघर्ष, आतंकवाद, साम्प्रदायिक तनाव की घटनाएँ घटित हो रहीं हैं, ऐसे समय में ‘ राम- रहीम एक हैं ‘ की भावना वैश्विक शान्ति की दिशा में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

कबीर के दर्शन में प्रेम, मानवता का आधार है, वह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। बाह्य आचार प्रेम में बाधक होते हैं, इस कारण वे प्रत्येक प्रकार की उस संस्था का विरोध करते हैं जो प्रेम के मार्ग का रोड़ा बनती है, यथा– ‘ पोथी पढि-पढि जगमुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढै सो पंडित होय।। ‘ वैश्वीकरण के प्रतिस्पर्धा और स्वार्थी दौर में प्रेम और सहअस्तित्व की भावना अत्यन्त आवश्यक है। उपभोक्तावादी संस्कृति में सफलता का मापदंड धन और भौतिक सुख- सुविधाएँ हैं। वहाँ भी वे कहते हैं– ‘ साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।।’ कबीर का यह विचार आज की भोगवादी संस्कृति के लिए एक नैतिक विकल्प है।

अंतत: हम कह सकते हैं कि कबीर का मानवतावाद किसी पश्चिम दार्शनिक अवधारणा का अनुकरण नहीं अपितु भारतीय लोकजीवन और अनुभव की उपज है। यही कारण है कि उनकी वाणी आज भी जनमानस में जीवित है और भविष्य के लिए एक नैतिक व मानवीय मार्गदर्शक है। वे सच्चे अर्थों में मानव समानता के समर्थक, धार्मिक सहिष्णुता के प्रवक्ता, सामाजिक न्याय के पक्षधर, उपभोक्तावाद के विरोधी, प्रेम और करुणा के उपासक, विश्व बंधुत्व के समर्थक, सांस्कृतिक समन्वय के प्रवक्ता हैं। उनका दर्शन मानवाधिकारों, जीवन मूल्यों एवं वैश्विक नागरिकता की अवधारणाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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