श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पर्स…“।)
अभी अभी # १०६४ ⇒ आलेख – पर्स
श्री प्रदीप शर्मा
पर्स का जन्म प्रिवीपर्स से हुआ है ! इसे आप प्रीवियस पर्स भी कह सकते हैं। यह तो हुई राजा महाराजाओं वाली बात। आम आदमी की कमीज़ में एक खीसा होता था, जिसमें पइसा रखा जाता था। मुद्रा के प्रचलन के इतिहास में शासकों के सिक्के ही चलते थे, जिन्हें थैलियों में रखा जाता था। मोहर, दीनार का ज़माना था वह।
चीन से हम मोबाइल ही नहीं, paytm भी लाए ! यह तो हुई आज की बात। पेपर करेंसी का जन्मदाता भी सुना है, चीन ही है। प्रोनोट और नोट, दोनों अंग्रेजों की देन है। हम लोग हुंडी वाले हैं। याद कीजिये, नरसिंह भगत की हुंडी और नानी बाई को मायरो। ।
पर्स नाम से ही लेडीज़ लगता है ! इसलिए पुराने समय में मर्द लोग बटुआ रखते थे। आज भी दुकानदार पर्स को लेडीज पर्स ही बोलता है। पुरुष वॉलेट जो रखने लग गए हैं। जब किसी का पर्स खोता है, तो वह कॉमन जेंडर हो जाता है। लेडीज पर्स छीना जाता है, जेंट्स पर्स या तो कोई हिप पॉकेट से निकाल लेता है, या कहीं गिर जाता है।
पर्स लेडीज हो या जेंट्स, एक ऐसी बहुउद्देशीय युक्ति है, जिसमें पैसे के अलावा बहुत कुछ रखा जाता है। कुछ पुरुषों का वॉलेट तो इतना भारी और मोटा हो जाता है, मानो वह उनके शरीर का ही एक अंग हो। बहुत सारे विज़िटिंग कार्ड, आधार, क्रेडिट, डेबिट कार्ड, घर के सामान की सूची के बाद अगर कुछ जगह बचे तो कुछ नकद रुपए।
महिलाओं के पर्स की तो पूछिये ही मत। पूरी गृहस्थी साथ लेकर चलनी पड़ती है। एक समय था, जब हर कामकाजी महिला के पर्स में एक ऊन का गट्टा और सलाइयाँ अवश्य होती थी। जहाँ भी समय मिला, ज़ुबाँ से तेज उंगलियाँ चलती थी। अनाधिकारिक तौर से इसे भी ऑफिस वर्क का ही हिस्सा माना जाता था। आखिर होता तो यह भी एक ज़रूरी काम ही था न। स्कूल और सरकारी दफ्तरों के कार्यालयीन समय में स्वेटर और गर्म कपडों का आँकड़ा अगर न भी उपलब्ध हो, तो भी यह राष्ट्रीय उत्पाद का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, वह भी बिना हींग और फिटकरी के। ।
जब से मुआ मोबाइल और कंप्यूटर आया है, न तो पर्स में ऊन के लिए इतनी जगह बची है, और न ही दफ़्तर में इतना टाइम ! हर समय कंप्यूटर पर आँखें, और की बोर्ड पर उंगलियाँ चलानी पड़ती हैं।
जब से इंडिया डिजिटल हुआ है, और कैशलेस इकॉनमी हुई है, पर्स और बटुए का औचित्य खत्म ही हो गया है। लेकिन पर्स हल्के होने के बजाय अब और भारी होने लग गए हैं।
पर्स की ज़िम्मेदारी बढ़ने के साथ ही इनकी कीमतों में भी इज़ाफ़ा हुआ है। पर्स में जितनी जेब हों, उतना अच्छा। जितने घर की अलमारी में खाने होते हैं, उतनी जगह तो पर्स में होनी ही चाहिए। अलमारी में अगर ताला है, तो पर्स में चेन। इधर चेन खराब, तो उधर जीया बैचेन। आखिर एक चलती फिरती अलमारी ही तो है पर्स। ।
© श्री प्रदीप शर्मा
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