डॉ. मीना श्रीवास्तव
☆ कथा-कहानी ☆
☆ बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – १ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
साढ़े आठ बजे नहीं कि, उसने जल्दी से पर्स में खाने का डिब्बा ठूँसा और पैरों को जैसे तैसे चप्पलों में घुसाते घुसाते घर से बाहर निकली। चाहे वह कितनी भी तेज़ चल पड़ती या बीच बीच में थोडीसी भागमभाग करती तो भी, लोकल के स्टेशन तक पहुँचने में कम से कम आधा घंटा तो लगना ही था। इसलिए नौ सात (९.०७ ) वाली लोकल ट्रेन पकड़ने के वास्ते उसके पास साढ़े आठ बजे घर से निकलने के अलावा कोई चारा था ही नहीं। और तो और लोकल ट्रेन में सीट मिलने की कोई गारंटी नहीं थी, क्योंकि इस मामले में एकमात्र नियम यही था, हाजिर सो वजीर! उसपर अक्सर उसे निकलने में ५-७ मिनट की देरी हो ही जाती।
दरअसल, वह सुबह ४ बजे ही जग जाती थी। दूसरों की नींद में खलल न पड़े, इस बात का ध्यान रखते हुए तेजी से खाना बनाने से निपटने हुए उसकी दम-साँस फूल जाती। ६ बजे तक उसके पति को छोड़ अन्य प्राणी उठ जाते थे। ये ‘अन्य’ यानि उसकी दोनों बेटियां और उसके सास ससुर। उसकी दस और बारह वर्ष की उम्र की बेटियों को जोर जबरदस्ती से उठाना, उन्हें प्रथम पहर की गहरी गुलाबी नींद से जोर जबरदस्ती से जगाना उसकी जान पर आता था… बिलकुल भी नहीं भाता था। लेकिन इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। किसी तरह उनका चाय-नाश्ता, नहाना-धोना आदि निपटने पर, उनके बालों को दो चोटियों में कसकर गूँथने के उपरांत वह अपने सास -ससुर की तरफ मुखातिब होती। दोनों ही बूढ़े हो गए थे। ससुर जी का एक पैर लकवाग्रस्त होते-होते बच गया था, परन्तु वह सहजतः कमजोर हो गया था। सुबह की तमाम गतिविधियाँ निपटने के लिए उन्हें निश्चित ही उसकी सहायता लेनी पड़ती थी। उसकी सास न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से बहुत ही शिथिल हो चुकी थी।
ऐसा लगता था मानों अपना खुद का संतुलन बरक़रार रखते हुए उन्हें सावधानीपूर्वक बाथरूम तक ले जाना, नहलाना-धुलाना, कपडे पहनाना, आदि करने के बाद उन्हें वापस पलंग पर सुलाना, सब कुछ खालिस उसीकी जिम्मेदारी थी। लेकिन उसके मुख से कभी भी इस बारे में शिकायत का एक शब्द भी नहीं निकला था। वह तो यहीं समझती रहती कि, यह उसका जन्मजात कर्तव्य है। फिर वह जल्दी से अस्तव्यस्त गिरे हुए सारे कपड़े धोकर सुखा देती, इधर उधर फैले बर्तन साफ करती और फिर झाड़ू-पोंछा। सबको पहले से तैयार किया हुआ नाश्ता परोसती। तब तक उसका पति जाग जाता। फिर उसके मूड की लय सम्हालते हुए, वह किसी तरह तैयार होती और अपने और लड़कियों के खाने के डिब्बे भरती। उसकी निरंतर भागदौड़ को दीवार पर लगी समय साथ फीकी पड़ी हुई घड़ी, बड़ी तटस्थता से और बिना किसी झिझक के देखती रहती थी, मानों वह साढ़े आठ का घंटा बजने का बेसब्री से इंतजार कर रही हो, और जैसे ही वह बजता, वह बेटियों, पति और छूटे हुए आधे अधूरे काम से मुंह मोड़कर घर से निकल जाती।
आज भी, वह घर से बाहर निकलकर सीधे पाँव बढ़ाते हुए तेजी से स्टेशन की ओर अक्षरशः भागने लगी …उस पल, ऐसा लग रहा था मानो द्रुतगति से चलना ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य हो… और आज, जैसे ही ट्रेन प्लैटफ़ॉर्म पर आकर रुकी, वह आश्चर्यजनक गति से अपने नियमित डिब्बे तक पहुँचने में सफल हो ही गई। जैसे ही उसने झटपट डिब्बे में अंदर चढ़ते-चढ़ते खिड़की के पास एक खाली सीट देखी तो, वह अतिशीघ्रता से उछलकर उसमें धंस गई। रोजमर्रा की तरह उसके मन में मजेदार ख्याल आ ही गया, “अरी रेल रानी, आपको घर में कोई काम धाम नहीं होते जो हर दिन नियत समय पर प्लेटफार्म पर आ धमकती हो?”… आज यह सवाल उसे कुछ अधिक प्रसन्न कर गया! वह मन ही मन बहुत खुश थी….. क्योंकि आज उसे बैठने की जगह जो मिल गई थी, वह भी खिड़की के पास। वह निश्चिन्त थी कि अब अगले एक-सवा घंटे तक उसे किसी प्रकार के धक्के का सामना नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि अब आखिरी स्टेशन तक वह इत्मीनान से एक ही जगह बैठकर सुकून पा सकेगी। आज का यह वक्त उसका था… सिर्फ उसका। रोज़मर्रा की ज़िंदगी के जाने-पहचाने चेहरों को देखकर मुस्कुराने का आदान-प्रदान होने के उपरांत उसने खिड़की के फ्रेम पर हाथ रखा और बेहद शांति से बाहर का दृश्य देखने में लग गई। उसे दिल से एहसास होने लगा कि, वह खिड़की निर्जीव नहीं, परन्तु उसकी सबसे नजदीकी सहेली का आश्वस्त करता कंधा है … और उसका मन किसी मोरपंख की तरह हल्का हो गया। फिर, उसे पता भी नहीं चला कि कब खिड़की से नजर आते पीछे दौड़ते पेड़ों के साथ-साथ उसका मन भी यादों को समेटने पीछे भागने लगा।
.. रत्नागिरी के पास स्थित ‘वारे’ गाँव में है उसका मायका… एक अत्यंत मनमोहक, खुशहाल, छोटा सा सुन्दर सपनों जैसा गाँव… एक तरफ निर्मल, गहरा नीला, शांत समुद्र… और दूसरी तरफ सफेद पीली रेत की चमकती चादर ओढ़े समुद्र तट…जहाँ भी देखो वहाँ, सुहावनी शीतल वायु के झूले पर नारियल और ताड़ (सुपारी) के पेड़ ख़ुशी में झूमते रहते हैं… बगल में घनी अमराई की छाँव में शांति से आराम फरमा रहे लाल खपरैलों द्वारा आच्छादित छतों से सजे हुए, ठिंगने लेकिन बेहद सुडौल घर, गोबर से लिपे पुते साफ़ सुथरे आंगन, नन्ही-नन्ही मनभावन सुंदर रंगोलियों से सजे हुए आँगन! चाहे छोटा हो या बड़ा, हर घर के आंगन में बने पवित्र तुलसी-वृन्दावन में मद्धम हवा के झोंकों के साथ डोलती हुई खिलखिलाती उज्ज्वलमुखी सांवली सलोनी तुलसी! आंगन में तरह तरह के रंगबिरंगे खुशबू बिखेरते फूलों की बहार! यहीं तो है उसका पसंदीदा नैहर का अलबेला गाँव, जिसे देखते ही कोई भी उस पर मोहित होकर रह जाये! उसी गाँव में बसा एक उसका घर था, जो निरंतर आनंद और संतोष से भरा रहता था… उसके माता-पिता, जो उससे अत्यधिक प्रेम करते थे… और उसके दो बड़े भाई। हालाँकि वे आर्थिक रूप से बहुत धनी नहीं थे, लेकिन वे लोग दिल से सर्वोपरि अमीर थे… …. उसे पता तक नहीं चला कि कब वह अपने घर के अंदर चली गई… इधर लोकल ट्रेन हर दिन की तरह नियत स्टेशनों पर रुक रही थी… ट्रेन में चढ़ने और उतरने वाले लोगों के चेहरे लगभग एक जैसे ही नजर आते थे। लेकिन ऐसा लग रहा था मानो वह उस पल वहाँ थी ही नहीं। अब तक वह रसोईघर के प्लेटफॉर्म के निकट खाना बनाने में जुटी अपनी मां को उसके पीछे जाकर अनायास ही कसकर लिपट चुकी थी….अपने पिता की गोद में आराम से लेट चुकी थी…..उसने अपने दोनों भाइयों के हाथ पकड़कर खुशी से गोल गोल घूमते हुए नाच किया था। फिर वह आंगन में हिरनी की भांति खूब उछल कूद कर भागती रही। उसने सभी पेड़ों से गुफ्तगू भी कर ली। और अब, अपनी माँ के हाथों से बने स्वादिष्ट गरमागरम थालीपीठ को चटकारे लेकर खाते खाते वह आंगन की सीढ़ियों पर बेहद शांति से बैठी पुरानी यादों की फुहारों में अंतर्बाह्य भीगने लगी।
… दसवीं कक्षा तक जिस स्कूल में वह पढ़ी थी, वह स्कूल, वहाँ की सभी अध्यापिकाएं, स्कूली सहपाठी… सब कुछ उसकी आँखों के सामने चलचित्र की तरह कौंध रहा था। उसके दोनों बड़े भाई रत्नागिरी के एक महाविद्यालय में पढ़ रहे थे। जब उसने भी वहां पढ़ने की ज़िद की, तो उसके पिता ने उसे वहीं ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला दिला दिया था । उसे कभी इस बात का रत्तीभर का एहसास भी नहीं हुआ था कि, उसके पिता पर अपने तीनों बच्चों को कॉलेज में शिक्षा दिलवाने के कारण कितनी आर्थिक विपदाओं से जूझना पड़ रहा था। वैसे तो वह बहुत अधिक बुद्धिमति तो कही नहीं जा सकती थी। कड़ी मेहनत से मन लगाकर पढ़ाई करने के बावजूद, वह बारहवीं कक्षा में बमुश्किल से ५५% अंक तक पहुँच पाई थी। लेकिन संतोषजनक बात यह थी कि, अपनी माँ के मार्गदर्शन में वह गृहकृत्य में काफी हद तक कुशल हो गई थी। बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, उसकी पढ़ाई छुड़वा दी गई थी। उसके पिता तो पहले ही उसके लिए योग्य वर ढूंढने लगे थे। हालाँकि उसका रहन-सहन और दर्शनीय रूप सादा था, फिर भी वह चतुर और चंचल थी। जल्द ही मुंबई से उसके लिए विवाह का प्रस्ताव आया। लड़का भी बारहवीं कक्षा तक पढ़ा-लिखा था, लेकिन वह भी होशियार था एवं एक अच्छी कंपनी में स्टोर कीपर का काम करता था। उसके पास खुद का घरबार नहीं था, परन्तु इस बात का सबने सहज रूप से अंदाजा लगा लिया था कि, मुंबई में रहकर इतनी युवावस्था में इस बात की उम्मीद करना बहुत कठिन ही होगा। लड़के की दोनों बड़ी बहनें अपने संपन्न ससुराल में खुशी-खुशी जीवन व्यतीत कर रहीं थीं। इसलिए, यह तय था कि, घर में मात्र लड़का और उसके माता-पिता ही होंगे। इसके अलावा, उस परिवार की सिफारिश जाने पहचाने लोगों के जरिये की गई थी…तो विवाह का निर्णय होने में ऐसी कितनी देरी लगती? उसे भी वह लड़का पसंद आया था। मुंबई जैसे बड़े शहर में जाकर बस जाने की खुशी की मात्रा कुछ अधिक ही रूमानी थी, क्यों कि उस मायानगरी के बारे में उसने ढेरों बातें सुन रखीं थीं। इन सबके चलते उस सुनहरे प्रस्ताव को नकारने का प्रश्न ही नहीं उठता था। गिनती के चार महीने बाद ही उसके पिता ने यथासंभव ठाठ बाठ से विवाह समारोह आयोजित किया। विवाह संपन्न होने पर नई-नवेली दुल्हन ने मुंबई में प्रवेश किया…
… डिब्बे में अचानक ही हलचल और शोरशराबा मच गया, और तब जाकर उसे होश आया। अंतिम स्टेशन आ चुका था। डिब्बे के दरवाजे पर उतरने के लिए लोगों की बेतहाशा भीड़ लगी हुई थी। लेकिन उसे आज उसी खिड़की के पास बैठे रहने की प्रबल इच्छा हो रही थी। पर यह संभव नहीं था। धीरे-धीरे उठते हुए, वह सबके उतरने के बाद डिब्बे से नीचे उतर गई। हालांकि, अब उसके कदमों ने हमेशा की तरह तेजतर्रार गति पकड़ ली, लेकिन उसका मन अभी भी पुरानी यादों की लहरों पर मचल रहा था।
वह अपने पति का हाथ और कई सपनों का साथ लिए बहुत ही उत्साहित होकर मुंबई आई। उनका घर एक चॉल की ऊपरी मंजिल पर था। लेकिन इतना सा? वन रूम किचन…यानि एक कमरा – रसोईघर – एक थोड़ी चौड़ी लेकिन अलग गैलरी… बस इतना ही? वह एक पल के लिए चौंककर स्तब्ध रह गई। न कोई आंगन… न फूलपत्ते … न ही तुलसी वृंदावन… लेकिन उसने तुरन्त खुद को सम्हालते हुए बड़ी आसानी से अपने आप को समझाया, “हो जाएगा आगे जाकर मेरा खुद का बड़ा सा घर।” इस समझदारी वाली सोच के बाद उसने दिल की गहराई से इसी घर से अपना नाता जोड़ लिया! उसे यह बहुत आश्चर्यजनक बात लगती कि उसकी सास ने तुरन्त ही बड़ी ही आसानी से इस घर को पूरी तरह उसे सौंप दिया था। यह अधिकार देते हुए भले ही उसके सास ने उसकी किसी भी बात पर पर्याप्त प्रशंसा नहीं की, फिर भी उसके लिए यह संतोषजनक बात थी कि उन्हें किसी बात पर शिकायत भी नहीं थी। फिर उसने अदम्य उल्लासपूर्वक उस छोटे से घर को खूब सलीक़े से सजाया था… घर के कामों की उसे आदत थी ही, इसलिए उन्हें तेजी से निपटने में कोई दिक्कत तो थी ही नहीं। उसका वैवाहिक जीवन एकदम सुचारू रूप से चल रहा था।
क्रमशः… २
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मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
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हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







