डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)

☆ कथा कहानी ☆ करफिआँल (फूलगोभी) जैसा रोजा (गुलाब) ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी 

ऽखिड़की के काँच से इस तरह सटी हैं कि दोनों आँखें फैल गयीं हैं। बाँसुरी सी नाक हो गयी है चप्टी। बाहर बर्फ गिर रही है। देखते देखते सामने के आड़ू के पेड़ सान्ताक्लाज की तरह सफेद हो गये। पापा बता रहे थे – दिसंबर जनवरी में तो बुल्गारिया में -30.सेल्सिअस तक तापमान चला जाता है। बाप रे! इस समय तो फिर भी गनीमत है।

वो – वो रही एक ब्रवचे – यानी गौरैया – आड़ू के पेड़ से उड़ कर नीचे आ गयी। पंख फड़फड़ा रही है। परों के बीच हवा भर कर कैसी गेंद सी हो गयी है। पापा कहते हैं, ‘‘अनु, कोई चीज देखो तो उसका बल्गारियाई शब्द याद करो। तभी न इस भाषा को जल्दी सीख पाओगे। ”तो, पेड़ नहीं दरवाँ। और पत्तियाँ नहीं लीत्स पर बरफ जमी है।

अनुराग मन ही मन मुस्कराने लगा। पापा को उसकी जैसी बुल्गारिआई आती नहीं। मम्मी को तो बिल्कुल नहीं। उनसे अच्छी तो छोटी बहन तूलिका है। यहाँ – राजधानी सोफिआ में आये हुये दिन ही कितने हुए हैं? बस में जाओ, तो अनु। बाजार में जाओ, तो अनु – सभी उसे ही बुलाते हैं।

अचानक एक सोकोल – यानी बाज आकाश में चक्कर लगाने लगा। क्या उसने ब्रवचे को देख लिया? जीव विज्ञान के शिक्षक दिमितिर कहते हैं – यही भोजन श्रृंखला है। एकमात्र इंसान ही सिर्फ शौक के लिए दूसरे प्राणिओं की हत्या करता है। लो, अब नारासित्स – नरगिस – की झाड़िओं में ब्रवचे फुदक रही है। सोकोल उसे ढूँढ़ न सका …..

“अन्नु – तूली -!”लिपिका ने सलवार और स्वेटर के ऊपर अपने ओवरकोट में दस्ताना समेत हाथ डालते हुए बच्चों को बुलाया, ‘‘नाश्ता कर लो। ”

“आज मुझे यहाँ का ब्रेड नहीं खाना है। कैसी मटमैली होती है। मुझे घर के आटे का पराठा बना दो न माँ। ”

उधर स्टडी टेबुल के पास बैठे उस पर लिखते लिखते उल्लास हँसने लगा, ‘‘अरे बेटा अन्ना, इतनी बात जानना – हम लोगों को भारत से केवल 1100 किलो सामान ही लाने की इजाजत थी। उसमें भी बर्तन और कपड़े सभी थे। तो चावल, दाल और आटे होंगे ही कितने? दो साल पूरे बिताने है। ”

“ठीक है मुझे दादीवाली अमावट ही जरा दे दो। बाद में तुम लोगों के साथ नाश्ता करूँगा। ”

“तेरे मामा इसे आम पापड़ कहते हैं। ”उल्लास ने मजाक किया।

“चलो जी। सिर्फ भैया ही क्यों? अमृतसर में सभी अमावट को आम पापड़ ही कहते हैं। स्वर्ण मंदिर के पास इसकी एक सौ साल से भी पुरानी दुकान है। इस बार तो गुरु ग्रंथसाहिब के प्रकाशोत्सव के चार सौवीं वर्षगाँठ मनायी जा रही है। अमृतसर कितना सजा होगा….!”

उल्लास हाल ही में यहाँ सोफिआ विश्वविद्यालय में दो साल के लिए विजिटिंग प्रोफेसर बन कर आया है। साथ ही भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक संपर्क अधिकारी का काम भी सँभालता है। दिन भर की व्यस्तता की लहरों पर समुद्री परिंदों की तरह कभी कभी आ धमकती हैं – देश की, घर की यादें…। यहाँ का जीवन बिल्कुल भिन्न। सब अपने अपने में व्यस्त। बेगानी जमीं की बर्फ में खो जाती है अपनी माटी की खुशबू…..

सोफिआ में नये नये आकर सभी कुछ उदास हो गये थे। बीच बीच में अनु के दादा दादी, नाना नानी के फोन आ जाते। उल्लास को तो खास फुर्सत मिलती नहीं, पर लिपिका के लिए एक एक पल सीसा जैसा भारी होने लगा। घर का काम, किताबों के पन्ने पलटना, माँ को, सास को एकाध खत लिखना, बस। आज आई. एस. डी. के जमाने में वो भी कहाँ तक हो पाता है? फिर अनुराग और तूलिका का स्कूल। नया परिवेश, नयी दुनिया।

तूलिका ने खिड़की से मुँह फेर लिया, ‘‘भैया, वो देखो, वह बिल्ली घात लगाये उधर जा रही है। ”

“अरे यह कोत्का क्या ब्रेवचे को झपट लेगी? ”

बड़ी सी बिल्ली। गदबदे ऊन का गोला। रोओं पर बर्फ जमी हुई है। दबे पाँव आगे बढ़ रही है। भाई बहन दौ़ड़े बाहर….

“अरे कहाँ जा रहा है? ”लिपिका कहती रह गयी।

बिल्ली भागी….दोनों पीछे….। मोड़ पर वह ग्रासरी स्टोर्स में घुस गयी।

“अरे रे रे !”दोनों भाई बहन एक बुढ़िया से टकराते टकराते बचे, ‘‘आलो! कदे हौदी? हैलो! कहाँ जा रहे हो? ”

अनुराग ने पहचान लिया – यही तो है दुकान की मालकिन। पिच स्ट्रीट की इस दुकान में पापा और मम्मी के साथ वह आ चुका है, ‘‘साॅरी बोबो !”

“दादी -!”बल्गारिआई में बोबो। इस शब्द ने मानो कई बर्फीले दिनों के बाद एक उजली सुबह की सफेद धूप की तरह इसिनबायेवा को छू लिया। उन्होंने उन्हे अपनी ओर खींच लिया, ‘‘क्या बात है? ”

“वो वो – कोत्का न – उस ब्रेवचे को -”तूलिका तुतलाने लगी। बुल्गारिआई में नहीं कह पा रही थी। अंग्रेजी में कहे? परंतु यहाँ तो अंग्रेजी बिल्कुल पसंद की नहीं जाती। ।

“क्या? ”

“वो पकड़ने जा रही थी। ” टूटी फूटी बल्गारिआई में दोनों ने अपनी बातें सुनायीं। साथ में हिन्दी अंग्रेजी की छौंक…..

“तुम शायद अपने पापा मम्मी के साथ एकबार यहाँ आ चुके हो। कहाँ के हो? तुम्हारा देश? ”

“हम इंडिया से आये हैं। मेरे पिताजी हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर हैं। ”

“ओ! बच्चों, तुम लोगों ने मुझे बोबो कहा। तो स्कूल की छुट्टी के बाद इस दादी से मिलने आया करोगे न? ”

तूलिका ने भी एक श र्त रक्खी, ‘‘मेरी दादी की तरह आप भी हमें कहानियाँ सुनाया करेंगी न? ”

“कहानी? ” इसिनबायेवा के चेहरे की झुर्रियाँ और भी गहरा गयीं। सब कुछ छूट जाता है, पर यादों का दामन नहीं छूटता। दोनों बच्चे हाथ हिलाते हुए चल दिये। इसिनबायेवा को याद आया – इसी तरह उसका बेटा इल्को जब कभी यहाँ आता है – जाते समय हाथ हिलाते हुए अपने घर चला जाता है। अपना घर ! हाय जेश स ! यह उनका घर नहीं है? वह और उसकी दोस्त मेरिल्ली इस शहर में रहते हुए भी पराये हैं।

तभी तो इन दोनों के जाने के बाद जब उनके पति स्कोल्तानोव ने उनसे पूछा, ‘‘ये कौन हैं? क्या इतनी बातें कर रही थी? ”

तो उन्होंने सब कुछ कह सुनाया, ‘‘ये बच्चे इंडिया से आये हैं। हैं न कितने प्यारे? ”

परंतु पत्नी की बातें सुनते सुनते स्कोल्तानोव का चेहरा बिल्कुल कठोर होने लगा, ‘‘बस बस बहुत हो चुका। फिर से धोखा खाने की गलती न करना। जब सगे ही अपने नहीं हुए, तो पराये से क्या उम्मीद करें? अब क्या दूसरों के लिए भी बैठ कर रोना चाहती हो? ”

इसिनबायेवा को सब मालूम है। संतान से बिछुड़ने पर माँ का हृदय क्या कम रोता है? इल्को सब कुछ छोड़कर मैसिडोनिया जाने की बात करता है। वहाँ कमाई का अवसर है। इसीलिए बुल्गारिआ से काफी लोग इटली, ग्रीस और हंगरी चले जाते हैं। उन्होंने कितनी बार मेरिल्ली से उसकी शादी की बात छेड़ी। उसका घर बसाना चाहा। मगर इन बातों में उसे तनिक भी दिलचस्पी नहीं।

“ति काकसी – आप कैसी हैं? ”

“दुबरे आसम – मैं ठीक हॅूँ। ”

बातचीत की गाड़ी चलती रही। इधर हिन्दी, उधर बुल्गारियाई की पटरिओं पर….

उन दोनों को भी मानो परदेश में एक और दादा दादी मिल गये। स्कूल की छुट्टी के बाद घूमते टहलते दोनों ग्रासरी स्टोर्स पहुँच जाते, ‘‘दोबर बेचर! शुभ संध्या !”

स्कोल्तानोव खास एतराज भी नहीं करता। ग्राहकों को सामान देते हुए, अखबार का पन्ना पलटते हुए, अपनी बुढ़िया के साथ परदेसी पोते पोती की बातों का आनंद उठाता। काश ! ये इल्को के बच्चे होते ! हमारे अपने ! उसके सीने से सिर्फ एक साँस निकलती है – आह !

क्रिसमस की छुट्टियों के पहले ही बर्फबारी शुरु हो गयी। बुल्गेरियाई किसान इसी बर्फबारी के लिए आँखें बिछायें रहते हैं। यही तो खेतों की सिंचाई का मुख्य साधन है। उनका आसरा। बड़े दिन के पर्व पर स्कोल्तानोव की दुकान भी खूब सजी हुई थी। बाहर अंदर – चिरागवाले – सितारे लटक रहे थे। स्टोर के अंदर एक क्रिसमस ट्री सजाकर धरा गया था। उसकी हर एक शाखा पर बच्चों के लिए छोटे छोटे उपहार लटक रहे थे। गुब्बारा, तो टेडीबीअर या चाकोलेट…!

“हैप्पी क्रिसमस, बोबो – द्यौदी !”कहते हुए दोनों बच्चे अंदर दाखिल हुए, ‘‘पापा मम्मी भी आ रहे हैं। ”

उल्लास और लिपिका भी काँच का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुए, ‘‘हैलो ज्.द्रास्ति। नमस्कार! क्रिसमस आनंदमय हो !”

“मेरि क्रिसमस!”कहते हुए इसिनबायेवा ने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया। आज के दिन स्कोल्तानोव ने भी हँस कर उनसे हाथ मिलाया।

“अनुराग, तूलिका इधर आओ। क्रिसमस ट्री पर से अपना अपना उपहार छाँट लो। ”इसिनबायेवा की खुशी को मानो पर लग गये थे। उन्होंने अपने हाथ से बनाये चाकोलेट केक उन्हें खिलाये। जाते समय लिपिका के हाथ में एक फूलगोभी जितना बड़ा गुलाब देते हुए बोली, ‘‘आप क्रिसमस के दिन हमारे यहाँ पधारे हैं। हमारी ओर से एक नाचीज भेंट!”

अनु उछलने लगा, ‘‘अम्मां, यह देखो – यह तो करफिआँल जितना बड़ा रोजा है!”

“ब्लागोदारिया!”लिपिका ने शुक्रिया अदा किया, ‘‘म्नोगो खूबवू! बहुत सुंदर!”

जाते जाते तूलिका ने एक समाचार सुनाया, ‘‘बोबो, भैया न – परसों पोलैंड जा रहा है। अकेले। ”

“पोलैंड! वहाँ क्यों? ”

लिपिका मुस्कुरा कर बोली, ‘‘स्कूल टीम के साथ वालीबाल खेलने। मैं तो डर रही हॅूँ। अपने देश में तो हम बच्चों को स्कूल बस में स्कूल भेज कर भी निश्चिन्त नहीं रह सकते। रास्ते में कुछ हो न जाए। और यहाँ तो विदेश का सफर। अकेले। वो भी हवाई जहाज से। ”

उल्लास हँसने लगा, ‘‘इसी तरह तो हमारे बेटे में आत्मविश्वास पैदा होगा। क्यों? आप ही कहिए। ”

इसिनबायेवा मुस्कुराई, ‘‘फिर भी माँ का दिल है। खैर, अनुराग, तुम्हारा स्कूल जीत कर आये – यही मेरी प्रार्थना है ! मदर मरियम तुम्हारा साथ दें, मेरे लाल !”

एक दिन बाद….

माँ से लिपट कर ‘‘जीत आऊँगा न माँ? ” कहकर हँसते हॅँसते अनुराग एरोड्रोम जाने के लिए स्कूल बस में बैठ गया, पर लिपिका उदास हो गई। तूलिका पेवमेंट पर खड़ी हाथ हिलाती रही – जब तक बस आँखों से ओझल हो नहीं गयी….

उल्लास लिपिका को समझा रहा था, ‘‘याद है? एकबार छात्रों का कौन सा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया – वे बसों पर पत्थर और ढेले फेंकने लगे। अनु बस से उतर कर पैदल घर चला आ रहा था, और मैं स्कूटर लेकर मारा मारा फिर रहा था कि बच्चा गया कहाँ? कहीं उसे कुछ हो न जाए ! आज वही सरहद पार जा रहा है – अकेले! कस्टमस से गुजरना, एरोप्लेन में बैठना, सारी औपचारिकतायें पूरी करना, पोलैंड में किसी अन्जाने परिवार के साथ रहना – सब कुछ अकेले ! भारत में भी तो बच्चे मेट्रो या लोकल से रोज स्कूल जाते हैं। अकेले। तो? ”

लेकिन माँ का हृदय थोड़े ही मानता है। उसे बार बार अनु के स्कूल जाने का पहला दिन याद आ रहा था। ‘‘माँ, स्कूल में मैं अकेले जाऊँगा? तुम साथ नहीं चलोगी? तो मैं भी नहीं जाता। जाओ -!”

दो दिन बाद कहीं जाकर उसके होठों पर हॅँसी आयी – जब पोलैंड से श्रीमती बोरलीना का फोन आया। अनु को इन्हीं के घर ठहराया गया था। मिलनसार अनु से मिल कर वे इतनी खुश थीं कि फोन पर कहने लगीं, ‘‘आप दुनिया की सबसे खुश नसीब माँ हैं !”

शाम को सूरज यहाँ जल्दी अस्त नहीं होता। रात के नौ के बाद ही वह अल्विदा कहता है। कभी कभी तो आधी रात तक उजाले में तारे तैरते रहते हैं। भैया घर में नहीं है। तूलिका उदास बैठी थी। फिर निकल पड़ी। जरा बोबो से बतिया कर आयें। बदन पर केवल एक ही स्वेटर था। लिपिका ने भी ध्यान नहीं दिया। रास्ते में रिमझिम बारिश के साथ सर्द हवा की साँय साँय….

इसिनबायेवा तो उसे देखते ही दौड़ कर आयीं, ‘‘यह क्या? न रेनकोट, न कुछ ! कपड़े भी गीले हो गये हैं। अरे पगली, तुझे ठंड लग जायेगी। ”जल्दी से उसके कपड़े बदल कर अलाव की बगल में कुर्सी पर बैठा दिया। एक कप गरम दूध में चाकोलेट मिलाकर पिलाने लगी….

कुछ आराम जरूर हुआ, पर स्कोल्तानोव उन्हे सुनाकर भुनभुनाने लगे, ‘‘नन्ही सी जान। कुछ हो जाये तो? जबर्दस्ती ओखली में सर देना !”

बर्फबारी धीमी हुई तो तूलिका को गरम जैकेट में लिपट कर स्कोल्तानोव उनके अपार्टमेन्ट में पहुँचा आया। बेवजह परेशानी झेलना उसे पसन्द नहीं। उसने कुछ बेरूखी से लिपिका को सुना भी दिया, ‘‘बेटी जब घर से निकल रही थी, तो आपको देखना चाहिए था कि उसने पर्याप्त गरम कपड़े पहन रक्खे है कि नहीं। ”

लेकिन भोर होते होते बात बिगड़ने लगी। तूलिका को बुखार आ गया। साथ में तेज खाँसी और सीने में दर्द। उल्लास को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? जयपुरवाले पारिवारिक डाक्टर की याद आ गयी। उसने दूतावास के एक दूसरे सहयोगी को फोन किया। दोस्त ने कहा, ‘‘तुरंत अस्पताल ले जाओ। यहाँ निमोनिआ का खतरा हमेशा बना रहता है। ”

उल्लास परेशान हो उठा। बर्फ पर से कार चला कर वह सहयोगी भी यहाँ तक आ नहीं सकता। वह बुलाये तो किसे? किसकी मदद ले? एम्बुलेन्स मिल जायेगा? इसी उधेड़बुन में घबड़ाकर वह दौड़ा…

स्कोल्तानोव दंपति के घर के बेल बजाते ही उसने देखा सामनेवाली खिड़किओं के शीशे रोशन हो गये। वे जाग गये हैं। दरवाजा खुलते ही उसने सब कुछ कह सुनाया। स्कोल्तानोव पल भर सोचता रहा, ‘‘चलिए, मैं खुद उसे अस्पताल ले चलता हूँ। ”

उल्लास ‘ब्लागोदारिया’ भी न कह सका।

इसिनबायेवा बेडरुम में थीं। पूछने लगीं, ‘‘क्या बात है? इतनी रात गये कौन आया है? ”

“अरे तुम्हारी उस इंडियन बच्ची की तबिअत बहुत खराब है। भींग जो गई थी। अस्पताल ले जाना पड़ेगा। ”

जब तक बूढ़े ने अपना वैन निकाला, बुढ़िया भी तैयार हो गईं। अच्छा ही हुआ। क्योंकि लिपिका के आँसू तो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। तूलिका की छाती धौंकनी की तरह ऊपर नीचे हो रही थी। सफेद बर्फ को चरमराता हुआ वैन आगे निकला। रास्ते के लैंपपोस्ट, पेड़ों की पत्तियाँ, बिल्डिंगों की चहरदीवारी, और दुकानों के ग्लोबोर्ड – सभी जगह सांताक्लाज की सफेद दाढ़ी जैसी बर्फ जमी हुई थी।

जब तूलिका के मुँह पर आक्सीजन का मास्क लगा कर, इंजेक्शन दिलवा कर, वार्ड से बाहर जाते जाते डाक्टर ने कहा, ‘‘बस, अब हमें इंतजार करना है!”तो, उस समय अस्पताल की खिड़किओं पर से अंधकार के पर्दे कुछ उठने लगे थे। …

बूढ़ा स्कोल्तानोव अपनी दुकान देखता। इन्हें पहुँचाने जाता। मगर किसी से खास कोई बातचीत नहीं करता। इसिनबायेवा तूलिका की सगी दादी की तरह उसकी देखभाल करती रहीं। दोपहर में वह रहतीं, तो लिपिका घर जाकर कुछ आराम कर लेती। फिर शाम तक लिपिका आ जाती। पहली रात तो उसने जाग कर ही बितायी थी।

इस बीच अनुराग भी वापस आ गया। वापस आने पर जैसे किसी को कोई हर्ष ही न हुआ। मैच का क्या हुआ किसी ने न पूछा। व्याकुल उल्लास को भी कुछ ध्यान न रहा। पर स्कोल्तानोव को जब मालूम हुआ कि उसका स्कूल कप जीत कर लौटा है, तो वह हँस कर उसकी पीठ थपथपाने लगा, ‘‘जीओ मेरे नन्हे भालू! मैं भी अपने क्लब का सेंटर फारवर्ड था। फुटबॉल लेकर दौड़ता तो किसी की हिम्मत नहीं होती कि मेरे पैरों से उसे छीन ले -!”

और दो दिन बाद तूलिका घर आ गयी। लेकिन हर समय उसके पास किसी का रहना जरूरी था। इसिनबायेवा ने खुद ही कहा, ‘‘क्यों घबड़ाती हो, बेटी? हम हैं न। ”

इस बार स्कोल्तानोव की भौंहें तनी नहीं। वह अपनी दुकान देखता, फिर यहाँ आकर भोजन करता। पहली रात इसिनबायेवा इनके फ्लैट में ही रह गयीं। दूसरे दिन से वो भी थोड़ी देर के लिए दुकान हो आतीं।

भारत से उल्लास के पिताजी ने जब फोन पर पूछा, ‘‘तूली अब कैसी है? ” अनु खिलखिला कर हँसने लगा, ‘‘अब तो हमारे साथ दादा दादी हैं। ”

“दादा दादी? ”उसके दादाजी चकित रह गये।

“हाँ, सोफियावाले दादा दादी !”

इन दो तीन दिनों में स्कोल्तानोव भी मानो भूल गया था – ये दोनों बच्चे उनके सगे नहीं हैं। साथ साथ खाना। तूलिका को समय से दवा देना। सुबह जब इनके फ्लैट में पहुँचते तो लिपिका या उल्लास हॅँस कर स्वागत करता, ‘‘दोब्रो उतरो! गुड मार्निंग!”फिर वे जब दुकान के लिए निकलते, अनुराग दरवाजे तक छोड़ने आता। हाथ हिलाता, ‘‘गुड बाई, द्यौदी! जल्दी लौटियेगा। ”

फिर एकसाथ रात का भोजन। एक रात इसिनबायेवा ने अपने गाँववाली मसालेदार पनीर की रोटी बनायी। सबको खूब पसंद आयी। फिर रात में सोते सोते कहानी सुनना। दो दिन में उस बूढ़े और बुढ़िआ ने भी मानो दो युग जी लिये….

मगर वे और कितने दिन ठहरते? दुकान के कामों में भी परेशानी हो रही थी। जिस दिन शाम को वे जाने लगे, इसिनबायेवा ने अनु और तूलिका के गालों को दबाते हुए कहा, ‘‘तो अब हमारे स्टोर्स में भेंट होगी। “

दोनों उदास थे। तूलिका बोली, ‘‘बोबो, यहीं रह जाओ न। ”

उल्लास और लिपिका भी वहीं खड़े थे। इस बूढ़े दंपति के प्रति वे सिर्फ कृतज्ञ ही नहीं थे, बल्कि मन में एक लगाव भी हो गया था।

तभी अनु अचानक इनसे मुँह फेड़कर खिड़की के पास जा खड़ा हो गया।

“क्या बात है? अनु, इधर आ। ”लिपिका बोली, ‘‘अपने द्यौदी और बोबो को गुडबाई नहीं कहेगा? ”

इधर देखे बिना अनुराग ने झल्लाकर कहा, ‘‘इससे तो अच्छा था जब तूली बीमार थी। ”

“यह तू क्या बक रहा है? ”लिपिका की भौंहे तन गईं।

“तब तो बोबो और द्यौदी हमें छोड़ कर जा नहीं पाते। ”

उसने हिन्दी में ही यह बात कही थी। स्कोल्तानोव और इसिनबायेवा इतना तो समझ ही रहे थे कि वहाँ तूफान उठ खड़ा हुआ है। -‘‘वह क्या कह रहा है? ”

उल्लास ने उनको बल्गारियाई में सबकुछ समझाया।

स्तब्ध खड़े रह गये वे बूढ़े दम्पति। इसिनबायेवा की आँखों में दुनाव (दान्युब) नदी लहराने लगी।

स्कोल्तानोव को लगा – ये गैर नहीं। उनके इल्को के ही बच्चे हैं। उन्होंने आगे बढ़ कर उन दोनों को सीने से लगा लिया, ‘‘तेरे ये द्यौदी और बोबो तेरे ही रहेंगे, बेटे। वहाँ जाकर भी हम तुमसे जुदा हो सकते हैं क्या?”

——

आभारः डा0 श्रीप्रसाद तथा डा0 आनन्द वर्धन – ब्रजभूमि

♦♦♦♦

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी

पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029

मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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