सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कविता ☆ मातृ दिवस विशेष – नासमझ… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

बिल्कुल भी नहीं

रोई मैं

माँ के शव के निकट बैठी हुई

बस देखती रही

वही सुन्दर सौम्य

करुणामय मुद्रा

लगा कुछ भी तो नहीं हुआ

वे सोई हैं, जाग जायेंगी

आँखों को कैसे विश्वास दिलाती

लोग कहते रहे

ज्योति ,ज्योति में समा गई !

विदेह प्राण विलीन हो गये

जा मिले अपने उत्स से!

मातृ दिवस पर

यादों का तूफान उठा है

चिता पर लेटी हुई माँ

अग्निशिखाएं आकाश

छू रही हैं।

चलचित्र चल रहा है।

छलक रही हैं आँखें

धारासार

कैसे रोकूं

झर रहा है दर्द

आँखों ने बगावत कर दी है।

 

माँ के लिए

हालात की दुहाई देकर

कुछ न कर पाने का

अपराध बोध

तकलीफ को

जानलेवा बना रहा है।

 

मैं जितना कहना चाहती हूं कहां कह पाती हूं

ईश्वर को समझने की

चेष्टा में

खाली हाथ रह जाती हूं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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रश्मि लहर
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अंतर्मन को झकझोरती हुई सशक्त रचना!