सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कुछ अग्निधर्मा क्षणिकाएं… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

🌹रोग

*

कौन कहता है

आत्ममुग्धता एक रोग है

बला है।

निरंतर विज्ञापित होते रहना

भी तो एक कला है।।

*

🌹अध्यात्म

*

मौतों से

विचलित नहीं होते

पत्थर

वे अगले ही पल

शान से वाॅक

कर सकते  हैं

रैम्प पर।।

*

🌹आसमां

*

आसमां छुआ जा

सकता है

बाँटने की फितरत न हो

तो जमीं पर

रहकर भी

आसमां हुआ जा सकता है।।

*

🌹आमद

*

ए आई की आमद पर

नाचो गाओ जश्न मनाओ

अंग्रेजी की खातिर

हिन्दी दिवस

मनाओ।।

*

🌹मावस

*

दिन का भेष बदलकर

आई है रात मावस की

उसने जमा लिया है

डेरा

दिल जलाकर उजाला करो

फैला है

घुप्प अंधेरा।।

*

🌹दुहाई

*

देखते ही देखते

मौत भी आदत बन गई

कुछ कीजिएगा

लोकतंत्र की दुहाई

नहीं दीजिएगा।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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