श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हंसता हुआ नूरानी चेहरा…“।)

?अभी अभी # ११३० ⇒ आलेख – हंसता हुआ नूरानी चेहरा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हंसता हुआ चेहरा किसे अच्छा नहीं लगता, अब उसमें नूरानी जोड़ने में क्या तुक है। किसी का नाम सिर्फ प्रकाश है तो किसी का नाम सूर्य प्रकाश और चन्द्र प्रकाश। वैसे नूर का अर्थ भी तेज, आभा युक्त अथवा दिव्य प्रकाश ही है।

मुस्कुराते चेहरे को भी हसीन चेहरा कहते हैं, यही हसीन चेहरा कब हसीना बन जाता है, कुछ पता नहीं चलता।

यहां हम बात सिर्फ हंसते हुए चेहरों की कर रहे हैं। इस विचित्र जगत में कुछ चेहरों पर सदा मुस्कुराहट छाई रहती है तो कुछ चेहरे हमेशा हंसते हुए नजर आते हैं। कली अगर मुस्काती है तो फूल खिलता है। इंसान ने मुस्कुराना और खिलखिलाना इन फूलों से ही तो सीखा है।।

कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जिनके चेहरे पर ना तो कभी मुस्कान नजर आती है दूर ना ही कभी उन्हें हंसते हुए देखा जाता हैं।

वे अपने आपको क्या समझते हैं, अथवा कैसा महसूस करते हैं, यह अलग बात है, लेकिन लोग तो उन्हें मनहूस ही समझते हैं।

बच्चे भी फूलों जैसे ही कोमल होते हैं, अगर खुश होते हैं तो मुस्काते हैं, खिलखिलाते हैं, किलकारियां मारते हैं।

हम भी कभी कभी हंसते, मुस्कुराते और ठहाके भी लगाते हैं, लेकिन किलकारियों पर तो सिर्फ बच्चों का ही कॉपीराइट है।।

कुछ लोग जबरदस्त हंसोड़ होते हैं तो कुछ जबरदस्ती हंसते हैं। हंसना और रोना एक स्वाभाविक क्रिया है, हो सकता है हास्य क्लब की तरह कल से रोने के क्लबों (weeping club) की भी जरूरत महसूस हो, क्योंकि हंसते हंसते दुख झेलते, आम आदमी की आंखों के आंसू भी सूख गए प्रतीत होते हैं। एक मसखरी सलाह पर गौर कीजिए ;

हंसते-हंसते रोना सीखो

रोते-रोते हंसना… 

जब इंसान को विसंगतियों पर हंसने के लिए मजबूर होना पड़े, तो शायद वह असली हंसी और स्वाभाविक आंसू भी भूल बैठे। जब आम आदमी की जगह नेता लोग ही घड़ियाली आंसू बहाने लगें, उसके पास खोखली हंसी हंसने के अलावा कुछ नहीं बच रहता।।

जो अधिक सोचते हैं, वे आगे चलकर मेरी तरह गम्भीर बैंड हो जाते हैं। साहिर बहुत बड़ी बड़ी बातें कर गया। मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया। लेकिन जाते जाते यह भी कह गया, बिछड़े सभी बारी बारी। वह कभी गुरुदत्त को हंसा नहीं सका।

मीनाकुमारी हो अथवा सुरैया, ऐसी बुलबुल सदा कैद में ही सिसकती हुई जिंदगी गुजार देती हैं।

काश हम फिर से बच्चे बन जाते, फूलों की तरह सदा हंसते मुस्कुराते, किलकारियां मारते और बिना बात के कभी रूठ जाते तो कभी आंसू बहाने लगते। अगर जिद करते तो आसमान सर पर उठा लेते और फिर चुपचाप एक टॉफी से मान जाते। काश, यह काश भी हमारे बीच से हट जाता।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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