श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचवटी।)

?अभी अभी # 673 ⇒ लंगोटिया और …  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ दिनों से एक शब्द ने नाक में दम कर रखा है, एक ऐसा शब्द, जो पहले कभी नहीं सुना। अपने अज्ञान पर शर्म से अधिक हंसी भी आई, जब तलाश करने पर पता चला कि यह तो एक नामी गिरामी यूनिवर्सिटी का नाम है और यह और कहीं नहीं, यमुना एक्सप्रेसवे, ग्रेटर नोएडा पर स्थित है। वैसे इसकी मूल संस्था गलगोटियास शैक्षणिक संस्थान है, और जिसके कुलपति डॉ.के.मल्लिकार्जुन बाबू हैं।

जो संस्कारी मातालंगोटिया और …  पिता ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज की जगह संस्कारी और सनातन गुरुकुल अथवा नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में अपने बच्चों को ज्ञानार्जन करवाना चाहते हैं, उनके लिए गलगोटिया एक सर्वश्रेष्ठ विकल्प है।

अचानक हमें हमारा बचपन याद आ गया और स्मृति पटल पर तैरने लगे, कुछ लंगोटिया यार, हम जिनके गले में बांहें डाल गोटियां खेला करते थे। शिक्षा कभी हमारी दोस्ती में आड़े नहीं आई। साथ साथ बस्ता उठाए, गले में हाथ डाले स्कूल जाते थे, और साथ साथ ही वापस आते थे। ।

कुछ दोस्तों ने आगे स्कूल और कॉलेज में भी साथ दिया, तो कुछ ने आर्थिक अभाव के कारण पढ़ना ही छोड़ दिया। उम्र के इस पड़ाव में, आज भी जब, साठ साल के अंतराल के बाद, कोई लंगोटिया यार नजर आ जाता है, तो सबसे पहले हम गले मिलते हैं।

भरत मिलाप से कम भावुक दृश्य नहीं होता वह। सब याद आता है, लड़ना झगड़ना, रूठना मनाना।

कच्ची मिट्टी के घड़े थे तब, नियति ने सबको अलग अलग शक्लो सूरत और नसीब में ढाला।

जहां कॉलेज है, वहां छात्र संगठन हैं, राजनीति है, ग्रुपबाजी है। स्कूल में मॉनिटर और कॉलेज में क्लास रिप्रेजेंटेटिव होता था। स्कूल में जहां बुद्धिमान छात्रों को मॉनिटर चुना जाता था, वहीं कॉलेज तक आते आते यह बागडोर कथित नेताओं और दादाओं के हाथ में आ जाती थी। दो पैनल मैदान में खड़े हो जाते थे। और प्रचार प्रसार के अलावा अन्य राजनीतिक हथकंडे भी अपनाए जाते थे। ।

एक समय था जब कॉलेज की नेतागिरी को राजनीति का चस्का नहीं लगा था, इक्के दुक्के नेता चुनाव के वक्त आते थे और चले जाते थे लेकिन समय के साथ कॉलेज भी राजनीति का अखाड़ा बनते चले गए। शिक्षा का राजनीति से भले ही कोई संबंध नहीं हो, लेकिन शिक्षा पर राजनीति का पूरा दखल है। चाहे शिक्षकों की नियुक्ति हो अथवा ट्रांसफर, नेता और मंत्री तक किसे भागदौड़ नहीं करनी पड़ती।

जब यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ही सूटकेस लेकर राजभवन पहुंच जाते हैं, तो शिक्षा कैसे राजनीति के चंगुल से बच सकती है।

कल के सभी महाविद्यालय आज आदर्श महाविद्यालय हो गए हैं। असली पढ़ाई तो आजकल कोचिंग संस्थानों में हो रही है, फिर भी कॉलेज ही नहीं, पान की दुकान की तरह, जगह जगह, हर ओर विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं। विश्व कीर्तिमान के नजदीक ही होंगे हम।  

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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