श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खुशबू बदबू”।)  

? अभी अभी # 73 ⇒ खुशबू बदबू? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हमारे शरीर में एक विभाग नाक का भी है, बड़ा इज्जतदार विभाग है यह, शरीर का वह अंग है, जो न केवल सांस लेता छोड़ता है, यह हर खतरे को सूंघ भी लेता है। हम ईश्वर से हमेशा यही दुआ करते हैं, कि बस हमारी नाक बची रहे। कभी हमारी नाक नीची ना हो, क्योंकि नाक है, तो हमारी इज्जत है।

आपको याद है रामायण वाला रावण की सिस्टर शूर्पणखा वाला नाक का किस्सा ! जिसे अपनी इज्जत प्यारी होती है, उसे अपनी नाक भी बहुत प्यारी होती है। बेचारी शूर्पणखा पहली ही नजर में लक्ष्मण को अपना दिल दे बैठी। इश्क पर जोर नहीं, गालिब बहुत बाद में कह गए। बेचारी शूर्पणखा ने एक नारी होते हुए भी प्यार का इजहार क्या कर दिया, लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक ही काट ली। अपनी इज्जत बचाने के लिए क्या किसी की इज्जत इस तरह मिट्टी में मिलाई जाती है। 

सबको अपनी नाक प्यारी होती है। यह नाक केवल खतरे को ही नहीं सूंघती, सांस लेती और छोड़ती भी रहती है। कहते हैं, हम इंसान ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं।

इसी एक नाक में दो हिस्से होते हैं, जो हर मौसम में शरीर को ठंडा गरम रखते हैं। नाक के अंदर जिन्हें हम बाल समझते हैं, वे वेंटिलेटर का काम करते हैं। हमारे एक नहीं दो स्वर चलते हैं, सूर्य और चंद्र, जो शरीर को मौसम के हिसाब से ठंडा गर्म बनाए रखते हैं। कबीर ने इन्हें इड़ा और पिंगला का नाम दिया है। ।

गजब की सूंघने की शक्ति है, इस नाक की। अगर हमारी नाक नहीं होती तो हम खुशबू और बदबू में भेद ही नहीं कर पाते। हमारी मनपसंद खाने की चीज को यह सूंघकर ही पहचान लेती है। सुबह की सैर के वक्त ताजी हवा स्वास्थ्य के लिए कितनी लाभकारी होती है। फूलों की खुशबू ही नहीं, कहीं बन रहे गर्मागर्म पोहे जलेबी की खुशबू भी कहां बर्दाश्त हो पाती है।

हवा और वातावरण पर हमारा कोई बस नहीं। कहीं से अगर खुशबू की जगह बदबू का झोंका आ गया, तो हम एकदम नाक भौं ही नहीं सिकोड़ते, नाक पर रूमाल भी रख लेते हैं। मीठा मीठा गप, कड़वा कड़वा थू, हमें प्यारी सिर्फ प्यारी खुशबू, नहीं बदबू। ।

मान अपमान से परे, खुशबू, बदबू से बहुत दूर, अगर नियमित कुछ प्राणायाम किए जाए, थोड़ा रेचक, पूरक और कुंभक किया जाए, अनुलोम विलोम, कपालभाति और भस्रिका की जाए, इड़ा पिंगला को सुषुम्ना से जोड़ा जाए, तो कबीर के अनुसार हमारी समाधि भी लग जाए। साधो, सहज समाधि भली ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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