डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ परखना ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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श्वेता ने चाय का कप ज़ोर से मेज़ पर रख दिया।
“बस! अब मैं किसी के लिए कुछ नहीं करूँगी।”
ऐश ने उसे देखा, “पहले पूरी बात तो बता।”
“कल माँ को अस्पताल ले गई। लौटने में देर हो गई तो पति बोले—‘तुम्हें मेरी कितनी परवाह है, आज पता चल गया।’”
“ओह…”
“मैंने भी कह दिया—‘हर बार परवाह साबित क्यों करनी पड़ती है?’”
श्वेता कुछ पल चुप रही।
“सच कहूँ ऐश, उनकी बात से ज्यादा चोट इस बात से लगी कि मैं भी अब हर रिश्ते को परखने लगी हूँ।”
ऐश ने धीरे से पूछा, “तू भी?”
“हाँ। बहन फोन न करे तो लगता है, उसे मेरी जरूरत नहीं। पति मेरी खामोशी न समझें तो लगता है, उन्हें मेरी परवाह नहीं।”
“श्वेता… शायद हम रिश्तों में प्यार से ज्यादा हिसाब रखने लगे हैं।”
“तो क्या करूँ? हर बार मैं ही आगे बढ़ूँ?”
ऐश ने उसकी ओर देखा, “हर बार नहीं… पर कभी-कभी बिना हिसाब के भी तो बढ़ना पड़ता है।”
तभी मोबाइल पर बहन का नाम चमका।
श्वेता ने स्क्रीन देखी।
उँगली कॉल बटन के ऊपर ठहरी रही।
ऐश चुपचाप उठकर बाहर चली गई।
कुछ देर बाद कमरे से धीमी आवाज़ आई—
“हैलो…”
फिर श्वेता की आवाज़ सुनाई नहीं दी।
बस, उसकी आँखों से गिरते दो आँसू मोबाइल की स्क्रीन पर ठहर गए।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





