डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ घुटन ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“चाय में देर क्यों हुई?” अजय की आवाज़ गूँजी।
“बस दो मिनट…”
“जवाब मत दो!”
मीरा चुपचाप कप रखकर बैठ गई।
“शाम को मेरे साथ चलना है। तैयार रहना।”
“आज सहेली के घर जाना था।”
“मेरी मर्ज़ी के बिना कहीं नहीं!”
मीरा ने नज़रें झुका लीं।
“अब मुँह क्यों फुलाया है?” अजय झुँझलाया।
“कुछ नहीं।”
“तो चेहरा ऐसा क्यों है?”
मीरा खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर पक्षी खुले आसमान में उड़ रहे थे। उसकी साँस जैसे भीतर ही अटक गई थी।
“मीरा! सुनाई नहीं देता?” अजय फिर चिल्लाया।
वह पलटी।
“कभी मेरी भी सुन लिया कीजिए।”
“क्या कहा?”
“कुछ नहीं।”
“ज़ोर से बोलो!”
मीरा की आँखें भर आईं। “कहने से क्या होगा? आप सुनते कहाँ हैं?”
“बहुत ज़ुबान चलने लगी है तुम्हारी!”
वह चुप हो गई।
अजय टीवी देखने लगा। कुछ देर बाद उसने आवाज़ लगाई, “खाना लगा दो!”
मीरा रसोई की ओर बढ़ी, फिर अचानक रुक गई।
“क्या हुआ अब?” अजय ने पूछा।
उसने उसकी ओर देखा, “इस घर में मेरी इच्छा की कोई जगह है?”
“फिर वही बात!”
मीरा ने होंठ भींच लिए। उसकी नज़र दरवाज़े पर टिक गई।
वह बाहर जाना चाहती थी या बस कुछ पल अपने भीतर से बाहर निकलना- उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






