श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी कविता – “मदर्स डे…“।)
अभी अभी # ९८७ ⇒ कविता – मदर्स डे
श्री प्रदीप शर्मा
क्या हम मदर्स डे को
मां का दिन नहीं कह सकते !
एक बच्चे के लिए हर दिन मां का होता है।
बड़ों के लिए मातृ दिवस होता है।
जिनकी मां आज नहीं है,
उनको मां की बहुत याद आती है।
यूं तो रोज ही आती होगी,
लेकिन आज उन्हें याद दिलाया जाता है।
दुनिया में ऐसा कौन है, कि
जिसकी कोई मां नहीं !
जन्म से ही नहीं,
जो पाले वह भी मां कहलाती है।
मां का दर्जा मासी को भी
मिल सकता है, और
भाभी मां को भी।
अगर सबसे अच्छी मां की स्पर्धा हो तो,
निर्णायक महोदय सबकी मां को छोड़कर
अपनी मां को ही यह खिताब दे दे।
अपनी मां से अच्छी किसी
की मां नहीं होती।
यह
मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं।
ज़रा मेरी मां को देखो,
आपको अपनी मां
याद आ जाएगी।
भगवान खुद धरती पर नहीं उतर पाता,
इसलिए
मां को भेज देता है।
लेकिन
बड़ा निष्ठुर है वह,
मां को वापस ले लेता है,
बदले में
सिर्फ मां की यादों से ही
काम चलाना पड़ता है।
© श्री प्रदीप शर्मा
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