श्री अनिल वमोरकर 

☆ कविता – ये मन तुम बिन कहीं और लगता नहीं  ☆ श्री अनिल वमोरकर ☆

ऐ माँ

ये मन

तुम  बिन

कही और

लगता नहीं..

 

ब्राह्ममुहुर्त

मानसपूजा में

ध्यान में

फिर सगुण पूजा में,

जप, विष्णू सहस्त्रनाम में

मन रमता,

तुम  बिन मन….

 

प्रसाद पश्चात

आपके द्वारा लिखीत

पुस्तक में खो जाता,

उसीमे मन मेरा रमता,

तुम बिन मन….

 

सात बजे की

आरती और जाप

रात का सत्संग

आनंदने मन डोलता,

तुम  बिन मन…

 

हनुमान चालीसा

पढकर जब सोता हूॅं

तेरी गोंद में पाता,

भाग्य को नमन करता,

तुम  बिन मन…

 

©  श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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