श्री हेमंत तारे
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – उकताहट…।)
☆ हेमंत साहित्य # ७२ ☆
उकताहट… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
☆
इतना बुरा भी नहीं होता
किसी दिन बोर होना,
किसी कुर्सी,
किसी सोफ़े पर
यूँ ही पड़े रहना,
बिना खोले कोई किताब।
काम तो
कभी ख़त्म होते नहीं,
तैरते रहते हैं
दिल, दिमाग़ और
घर के कोने-कोने में।
फिर भी कभी
मन कहता है, आज रहने दो।
ऐसे में अक्सर
हाथ बढ़ता है फ़ोन की ओर,
उँगलियाँ ढूँढ़ लेती हैं
किसी अपने का नंबर,
जिससे मुद्दत से
न हुई हो गुफ़्तगू
बेवजह
बेहिसाब l
बात शुरू होती है
बेवजह,
और चल पड़ती है
बिना किसी हिसाब के।
उकताहट
इतनी बुरी भी अलामत नही,
यदा-कदा
यह भी दे जाती है ईनाम
किसी अपने से
जुड़ने का,
यूँ ही,
बेवजह,
बेहिसाब।
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© श्री हेमंत तारे
मो. 8989792935
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





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