श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆
☆ पितृ भक्ति पर मंथन श्री की संग्रहणीय और पठनीय कृति – पितृ नमन – संपादक – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
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मेरे पूज्य पिता स्व. पं.भगवती प्रसाद जी पाठक की 25 सितंबर को 127 वीं जयंती है और यह मेरे लिए सौभाग्य और सुखद संयोग की बात है कि संस्था मंथन श्री के द्वारा भी अभी 20 सितंबर को पिता को समर्पित काव्य रचनाओं का एक संग्रह पितृ नमन भी प्रकाशित किया गया। इस कृति में अपने पूज्य पिता पर आधारित एक कविता मेरी भी शामिल की गई जिसके लिए मैं मंथन श्री परिवार के प्रति आत्मीय रुप से आभार व्यक्त करता हूं।
अगर देखा जाए तो पिता कीअपेक्षा मातृ भक्ति को लेकर कवियों द्वारा अधिक काव्य रचनाओं का सृजन किया गया।काफी दिनों से वास्तव में पितृ भक्ति को लेकर भी एक ऐसे ही काव्य संग्रह की आवश्यकता महसूस भी की जा रही थी जिसमें पिता को समर्पित ऐसी कविताएं शामिल हों जो कि पाठकों के लिए पठनीय साबित हो सके।
श्री संतोष नेमा ‘संतोष’
मंथन श्री द्वारा इसी पावन उद्देश्य को लेकर जबलपुर के कला वीथिका में प्रतिष्ठित कवियों की पिता को समर्पित श्रेष्ठ कविताओं के संग्रह पितृ नमन का लोकार्पण कार्यक्रम पिछले दिनों आयोजित किया गया।पितृ नमन को साहित्यिक क्षेत्र का एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जा सकता है जो कि पिता को समर्पित काव्य रचनाओं के सशक्त सृजन हेतु सहायक सिद्ध होगा। मंथन श्री के संस्थापक और प्रसिद्ध साहित्य साधक श्री संतोष नेमा संतोष जी की परिकल्पना, संयोजना एवं सफल संपादन में प्रकाशित इस कृति के प्रकाशन में श्री राजेश पाठक प्रवीण, श्री विजय नेमा अनुज एवं सिद्धेश्वरी सराफ शीलू का संपादन सहयोग भी काफी सराहनीय रहा
प्रज्ञा पीठाधीश्वर श्री मां साध्वी विभानंद गिरी, महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी, महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर जी दुबे, श्री शरद अग्रवाल जी, कविवर श्री हरिशंकर भटनागर जी, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी, श्री विजय नेमा अनुज जी, श्री राजेश पाठक प्रवीण जी, की मंगल भाव सहित प्रभावी प्रतिक्रियाओं ने पुस्तक कृति को सार्थकता प्रदान की है।पितृ नमन में श्री संतोष नेमा संतोष जी की कृतज्ञता भाव के रुप में अभिव्यक्ति उल्लेखनीय है। वे लिखते हैं कि यह संग्रह एक ही भाव के अनेक रंग हैं। किसी ने पिता को बरगद कहा, किसी ने हिमालय, , किसी ने पुरानी साईकिल की घंटी, किसी ने फटी हुई कमीज़ के पीछे छिपा गौरव। छंद, ग़ज़ल, गीत, मुक्तक और नयी कविता के माध्यम से रचनाकारों ने अपने अपने पिता को जिया है। यह विविधता ही इस संग्रह की की सबसे बड़ी शक्ति है।मंथन श्री द्वारा संयोजित इस पितृ नमन कृति को भाई श्री संतोष नेमा संतोष ने अपने पूज्य पिता स्व. श्री देवीचरण जी नेमा को समर्पित की है। पाथेय प्रकाशन की इस कृति में 208 कवियों की अपने पिता को समर्पित काव्य रचनाएं शामिल हैं।
इस पुस्तक के प्रारंभ में पिता पर आधारित ये काव्य पंक्तियां पाठकों को प्रभावित और आकर्षित करने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं:
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पिता तप की ज्योति हैं,
त्यागों का विस्तार हैं।
मौन रहकर भी सदा,
जीवन के आधार हैं।
मंथन श्री ने शब्दों में,
पितृ महिमा को स्वर दिया।
संकलन में पितृ ऋण के,
श्रद्धा और संस्कार हैं।
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पितृ भक्ति पर आधारित मंथन श्री की यह काव्य कृति साहित्यिक क्षेत्र के पाठकों के लिए इस वर्ष की एक संग्रहणीय, पठनीय और प्रशंसनीय कृति सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







