श्री यशोवर्धन पाठक

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

🙏 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्रद्धेय आचार्य भगवत दुबे जी को जन्म दिवस १८ अगस्त पर शत शत प्रणाम 🙏

आचार्य भगवत दुबे हिन्दी के एक वरिष्ठ रचनाकार हैं। प्रचार प्रसार से दूर वे एक मौन साधक हैं और उन्होंने न केवल काव्य के कथ्य शिल्प को नये नये रुपों में संजाया संवारा है बल्कि महाकाव्य से लेकर मुक्तक -गजल तक को अपनी लेखनी का पाटल -स्पर्श प्रदान किया है।

सुविख्यात कवि श्री नीरज की इस प्रभावी प्रतिक्रिया का उल्लेख किया था सुप्रसिद्व कवि श्री चन्द्रसेन विराट ने राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले श्रद्धेय कवि आचार्य भगवत दुबे की काव्य कृति कांटे हुए किरीट में। कवि चन्द्रसेन विराट ने कवि नीरज की इस बात का उल्लेख करते हुए अपनी मंगल कामनाओं में अपनी जो बात इस काव्य पुस्तक में शामिल की वह भी आचार्य जी के काव्य को महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए काफी है। वे कहते हैं कि यह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि, कथाकार कितनी दिशाओं में एक साथ रचनारत रहा है, यह जानकर सुधी पाठक चकित रह जाता है। इसी कृति में आचार्य भगवत दुबे जी की काव्य सृजन से प्रभावित होकर एक और राष्ट्रीय कवि श्री शिवमंगल सिंह सुमन ने भी लिखा है कि कवि में अपनी कल्पनाओं को रुपक में डालने की विशेष प्रवृत्ति। दिखाई पड़ती है। भाषा में प्रवाह है और अच्छे प्रयोग देखने को मिलते हैं। उन्होंने लिखा है कि अधिकांश कविताएं उपदेशात्मक और शोषण, अन्याय एवं सांप्रदायिक संकीर्णता के विरोध में है। तदर्थ इन रचनाओं का विशेष महत्व है।

आचार्य जी की इस कृति में अधिकांश कविताएं कृषकों और ग्रामीणों के दैनिक जीवन और उनकी समस्याओं पर आधारित हैं। दरअसल आचार्य जी स्वयं भी गांव की सोंधी महक में पले बढ़े ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को न केवल अपने आस पास देखा है बल्कि उसे बड़ी गहराई से महसूस भी किया है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में यह बात बड़ी साफ तौर पर देखी जा सकती है। जैसे –

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न्याय मांगने, गांव हमारे, जब तहसील गये,

न्यायालय, खलिहान खेत, घर गहनें लील गये।

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 और कवि जब ऐसी विषम परिस्थितियों से पीड़ित जनमानस को, परेशान देखता है तो अपनी कविता में आवेश मिश्रित सीख भी देता है –

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अहंकार, अन्याय रौंदता फिरे जहां जन जीवन को

हे धिक्कार, अनीति सहन करने वाले, नर यौवन को

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आचार्य जी की कविताओं में शोषण के प्रति चिंता तो है लेकिन वे निराश नहीं है। उनका आशावादी दृष्टिकोण उनकी कविताओं में साफ साफ नजर आता है –

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संकल्पों की दीप्त प्रभा से सुखद सवेरा लाना है,

लेकर नयी उमंग, निराशाओं का तिमिर हटाना है।

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गांवों की गरिमामयी संस्कृति और पावन संस्कारों का महत्व भी आचार्य जी की कविताओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, एक कविता में वे लिखते हैं –

लक पांवड़े, जहां अतिथियों की

 खातिर बिछ जाते हैं,

नगरवासियों चलो तुम्हें,

 हम अपने गांव दिखाते हैं।

आचार्य जी को विरासत में मिले यही पावन संस्कार समाज के लिए प्रेरणा का विषय हो सकते हैं। जीवन में मातृ भक्ति का सिध्दांत उनके लिए सर्वोपरि था और इसकी झलक उनकी कविताओं में दिखाई देती है –

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टूटी कुटिया के भीतर जब शीश झुकाकर मैं जाता हूं,

मां के ममतालू चरणों में, मंदिर जैसा सुख पाता हूं।

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वर्ष 2001 में प्रकाशित राष्ट्रीय, सामाजिक, आध्यात्मिक, और ग्रामीण परिवेश की 68 कविताओं के इस संग्रह में आचार्य जी की प्रेरक सोच वाली ऐसी काव्य रचनाएं शामिल हैं जो आज भी सामयिक और प्रासंगिक हैं तभी तो सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और पाथेय के संस्थापक स्व. डा. राजकुमार सुमित्र ने एक जगह लिखा था कि “कवि आचार्य भगवत दुबे संस्कारधानी जबलपुर के ऐसे स्वनामधन्य साहित्य साधक हैं जिनके विविध वर्णी कृतित्व की यश सुरभि विंध्य -सतपुडा के शैल‌ शिखरों को लांघ कर भारत व्यापिनी हो गयी है।”

आज हम सभी गौरवान्वित हैं कि श्रद्धेय सुमित्र जी की इस बात से पूरा साहित्यिक क्षेत्र सहमत है।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Dr Bhavna Shukla
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वाह बेहतरीन अभिव्यक्ति