🟢 पुस्तक चर्चा 🟢 पर्यावरण महत्व एवं संरोधन 🟢 आचार्य शैलेंद्र पाराशर 🟢

(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)

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(एक सितंबर को बुंदेली दिवस समारोह – जबलपुर। बुंदेली लोक साहित्य के विद्वान, भाषा विज्ञानी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 109वीं जयंती एवं 36वां बुंदेली दिवस समारोह सोमवार 1 सितंबर को संध्या 6.30 बजे से शहीद स्मारक भवन में गुंजन कला सदन एवं नगर की संस्थाओं द्वारा आयोजित है । इस अवसर पर स्मृति शेष डॉ. श्रीवास्तव की पुस्तक “पर्यावरण महत्व एवं संरोधन” के विमोचन के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं विषयों के विद्वानों का अभिनंदन किया जाएगा । बुंदेली गीतों एवं नृत्यों के साथ ही पूर्व में सम्पन्न चित्रकला एवं बुंदेली नृत्य श्री प्रतियोगिता के विजेता भी पुरस्कृत होंगे ।)

लोक संस्कृति के विज्ञानवेत्ता – डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की ‘पर्यावरण महत्व एवं संरोधन’ कालजयी कृति

लोक वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव लोक संस्कृति, सभ्यता, हिन्दी, बुन्देली, भाषा विज्ञान, समाज विज्ञान एवं लोक विज्ञान के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे। उनका बुन्देलखण्ड एवं बुन्देली भाषा के प्रति आजीवन असीम अनुराग रहा है। उनकी लेखनी लोक जीवन के बहुविध विषयों पर साधिकार अनवरत् अविराम चलती रही। उनका सृजन शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। संस्कृति मनीषी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व समाज की अमूल्य धरोहर है। डॉ. श्रीवास्तव की इस बौद्धिक विरासत को सहेज कर रखना एवं उनकी भावना के अनुकूल अध्ययन, मनन एवं आचरण से मूर्त रूप देने के लिए कृत संकल्पित होना समाज का नैतिक दायित्व है। उनके शैक्षणिक, सामाजिक, शोध कार्य, पुस्तकें, आलेख, अप्रकाशित रचनाएँ, नवाचारों के खुले द्वार हैं जो आने वाली पीढिय़ों की अमूल्य विरासत हैं। डॉ. श्रीवास्तव की यह पुस्तक इसे स्वयमेव् प्रमाणित करती है।

शब्द ब्रह्म के उपासक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने सृष्टि की रचना के मूल तत्व का गहनता से अध्ययन किया है। पुरुष शाश्वत और चेतन है, वहीं प्रकृति गतिशील एवं भौतिक है। दोनों साथ मिलकर सृष्टि का निर्माण करते हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि की रचना के दो मूल तत्व पुरुष और प्रकृति हैं। ब्रह्मांड की उत्पत्ति प्रकृति और पुरुष के मिलन से हुई है।

ज्ञान की देवी सरस्वती के उपासक डॉ. श्रीवास्तव ने आदिकाल से वर्तमान तक बहुविध पक्षों का सूक्ष्म, गहन एवं शोधात्मक अध्ययन, मनन एवं चिंतन कर समसामयिक सारगर्भित लेखन किया है।

पर्यावरणविद् डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की सद्य: प्रकाशित ‘पर्यावरण महत्व एवं संरोधन’ पुस्तक में पेड़-पौधों, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों की जीवन गाथा से लेकर ‘ पशु-पक्षियों द्वारा प्रजातंत्र की माँग’ सहित इक्कीस शीर्षकों में लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता, अध्ययन, मनन, चिंतन, शोध, नवाचार से, पर्यावरण प्रदूषण एवं फसलों के उत्पादन वृद्धि के लिए उपयोग में आने वाले रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के दुष्परिणाम सहित अनेक विषयों पर साधिकार लेखनी से सुधी पाठकों का ध्यान आकर्षित कराते हुए समस्याओं के समाधान के तरीके भी बताए हैं। पर्यावरण संरक्षण के पर्यावरण संरोधन, पर्यावरण का संरक्षण, सुरक्षा, दोहन के साथ उसे नष्ट होने से बचाना, सुरक्षित, संतुलन बनाये रखते हुए उसकी रक्षा करना प्राणी मात्र के जीवन, स्वास्थ्य, विकास और संस्कृति का आधार है। वहीं प्रकृति और मनुष्य के नैसर्गिक संतुलन को बनाए रखना सभी का नैतिक दायित्व है। वही मनुष्य का जीवन, स्वास्थ्य, विकास और संस्कृति में निहित जीवन मूल्यों को पोषित करना भी है। डॉ. श्रीवास्तव ने पर्यावरण संयोजन प्रकृति के सभी घटकों, जलवायु, मृदा, वनस्पति, जीव -जंतु, ऊर्जा की प्रकृति को समझते हुए संसाधनों का दुरुपयोग न करने का आह्वान करते हुए भविष्य के लिए उन्हें संरक्षित, एवं सुरक्षित करने का दायित्व निर्वाह करने के लिए उचित मार्गदर्शन दिया है। भारतीय सांस्कृतिक, सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों के अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण के संरोधन की मानसिकता बनाते हुए आचरण करने पर विशेष जोर दिया है। पर्यावरण संयोजन वायु, जल, मृदा प्रदूषण का बढऩा मानव को चतुर्दिक रूप से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर बहुत नुकसान पहुँचा रहा है, जिससे प्रति क्षण प्रकृति एवं मनुष्य को अनेक दुष्परिणाम का सामना करना पड़ रहा है।

समाज वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का ‘पर्यावरण संरोधन’ से आशय प्रकृति के सभी घटकों (जल, वायु, मृदा, वनस्पति, जीव-जंतु, ऊर्जा स्रोत) को संरक्षित करना, उनका विवेकपूर्ण उपयोग करना तथा भावी पीढिय़ों के लिए सुरक्षित रखना है।

वर्तमान समय में पर्यावरण संरोधन की सर्वाधिक आवश्यकता है। प्रदूषण नियंत्रण, वायु, जल और मृदा प्रदूषण का बढऩा मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता को हानि पहुँचा रहा है। जैव विविधता की रक्षा करने वाली अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, जिससे पारिस्थितिक असंतुलन बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण और जलवायु असंतुलन से मानवता खतरे में है। जल, वन, ऊर्जा और खनिज सीमित हैं। इन्हें अंधाधुंध नष्ट किया जा रहा है जिससे प्रकृति और मनुष्य का भविष्य संकटग्रस्त होता जा रहा है। शुद्ध वातावरण के बिना स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और संस्कृति आदि सभी नष्ट हो सकते हैं।

पर्यावरण संरोधन के लिए वृक्षारोपण और जंगलों की रक्षा करना आवश्यक है। जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन, तालाब व नदियों की शुद्धि और जल का विवेकपूर्ण उपयोग, ऊर्जा संरक्षण हेतु नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन, जलविद्युत) अपशिष्ट प्रबंधन, प्लास्टिक व इलेक्ट्रॉनिक कचरे को पुनर्चक्रण द्वारा कम करना, प्रदूषण नियंत्रण हेतु औद्योगिक धुआँ, वाहनों का धुआँ और रासायनिक अपशिष्ट को नियंत्रित करना आदि जरूरी है। पर्यावरण संरोधन का तात्पर्य है कि प्रकृति का संरक्षण, संसाधनों का संतुलित उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता की रक्षा और सतत विकास की दिशा में आगे बढऩा है।

मनुष्य यदि पर्यावरण का संरोधन नहीं करेगा तो जीवन का आधार ही खतरे में पड़ जाएगा, अत: यह मानव का नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है कि वह प्रकृति की रक्षा करे, पर्यावरण ही जीवन का आधार है जो हमें शुद्ध हवा, स्वच्छ जल, उपजाऊ भूमि और जैव विविधता प्रदान करता है, हमारी संस्कृति में नदियाँ, पर्वत, वृक्ष और पशु-पक्षी सदैव पूजनीय रहे हैं। गहन चिंतक डॉ. श्रीवास्तव की पर्यावरण प्रदूषण की इस कृति में अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के प्रति चिंतन उनकी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। आज अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, जैव विविधता घट रही हैं। यदि हम समय रहते कदम नहीं उठाएँगे तो जीवन असंभव हो जाएगा। वहीं बढ़ते हुए प्रदूषण के खतरों से बचने के लिए पर्यावरण संरोधन की आवश्यकता तेजी से महसूस की जा रही है। पर्यावरण शिक्षा की वर्तमान में बहुत आवश्यकता है। यह अमूल्य ग्रंथ बच्चों व समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

भारतीय संस्कृति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव हमें सिखाता है कि धरती पर सभी प्राणी हमारे कुटुम्ब का हिस्सा हैं। सतत् समावेशी विकास की नीतियाँ अपनाना, जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन, सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग, पर्यावरण शिक्षा व जन-जागरूकता, प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन, अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण, वनों की रक्षा करना बहुत जरूरी है। ‘पर्यावरण संरोधन’ केवल वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि विश्व के हर नागरिक का नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक दायित्व एवं कर्तव्य भी है। विश्व भर में रहने वाले प्रत्येक मनुष्य को सिर्फ शासन, संस्थाओं, पर्यावरणविदों, समाजसेवियों एवं दूसरों से अपेक्षा नहीं करना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का प्रकृति एवं जीवन को प्रदूषण से मुक्त रखने का दायित्व है।

संवेदनशील लेखक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को संकल्प धारण करने का आह्वान किया है कि वे प्रकृति की रक्षा करते हुए पर्यावरण संरोधन के दायित्व का जीवन भर निर्वाह करेंगें। वहीं आने वाली पीढिय़ों के लिए एक सुरक्षित, संरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण विरासत सौंप कर जाएंगे।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना समस्त वैश्विक परिवार का हिस्सा है। इसमें समस्त प्रकृति समाहित है। मनुष्य जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ सदियों से प्रदूषण रहित प्रकृति का अविभाज्य हिस्सा रही हैं। लोक वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का अथक परिश्रम, चिंतन, लेखन उनकी विद्वता को स्वयमेव् मुखरित करता है। मूलत: यह पुस्तक नहीं, बल्कि शोध ग्रंथ है। इसमें उन्होंने प्राचीन काल से वर्तमान तक अनेक संदर्भ, शोध कार्यो एवं आख्यानों के उदाहरणों को समाहित कर प्रांजल भाषा में सुधी पाठकों के लिए अथक परिश्रम से लिखा है।

वस्तुत, डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की ज्ञानवर्धक कालजयी कृति पर्यावरण के संरोधन के प्रति समर्पण, संवेदनशीलता एवं साधना की परिचायक है। सादर नमन। 

आचार्य शैलेंद्र पाराशर

सेवानिवृत्त आचार्य, एम. ए., पी एच. डी.

64 नमन विद्यानगर, सांवेर रोड, उज्जैन(म. प्र. ) – 456010 मो. 94250 94144, 83190 65419

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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