🟢 पुस्तक चर्चा 🟢 पर्यावरण महत्व एवं संरोधन 🟢 आत्मकथ्य – स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव 🟢

(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)

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(एक सितंबर को बुंदेली दिवस समारोह – जबलपुर। बुंदेली लोक साहित्य के विद्वान, भाषा विज्ञानी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 109वीं जयंती एवं 36वां बुंदेली दिवस समारोह सोमवार 1 सितंबर को संध्या 6.30 बजे से शहीद स्मारक भवन में गुंजन कला सदन एवं नगर की संस्थाओं द्वारा आयोजित है । इस अवसर पर स्मृति शेष डॉ. श्रीवास्तव की पुस्तक “पर्यावरण महत्व एवं संरोधन” के विमोचन के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं विषयों के विद्वानों का अभिनंदन किया जाएगा । बुंदेली गीतों एवं नृत्यों के साथ ही पूर्व में सम्पन्न चित्रकला एवं बुंदेली नृत्य श्री प्रतियोगिता के विजेता भी पुरस्कृत होंगे ।)

आत्मकथ्य –  विकास के साथ विनाश – स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव

कहा जाता है, विकास के साथ विनाश भी चलता है। आज विज्ञान के युग में यह स्पष्टत: देखने को मिल रहा है। युगाधनों पूर्व जंगलों में जीवन बिताने वाले, नग्न फिरने वाले अथवा वल्कल और पत्राच्छादन का उपयोग करने वाले मृगयाचारी मनुष्य ने आज अपने लिये कितनी सुविधायें जुटा ली हैं-यह लिखने-बताने की बात नहीं रह गई। आज का मनुष्य उन्हीं सुविधाओं के बीच जी रहा है। यह एक अलग बात है कि कोई अधिक सुविधायें समेट सका है और कोई उनके लिए विकल है। यह वह स्थिति है जिसे विकास कहा जायेगा, किन्तु क्या यह सत्य नहीं है कि उसी विज्ञान ने हीरोशिमा का सत्यानाश कर दिया था और उसी ढंग से चलते चलने पर क्या संपूर्ण पृथ्वी पर का जीवन समाप्त नहीं हो सकता? हो सकता है क्योंकि मनुष्य वैचारिक-प्रदूषण के लपेटे में भी आ गया है।

पर्यावरणिक स्थितियाँ अत्यधिक चिन्ताजनक हो रही हैं। प्रकृति का संतुलन पूर्णत: डाँवाडोल हो रहा है। ओजोन की परत पतली पड़ रही है अथवा उसमें छिद्र हो गये हैं, कार्बनडायआक्साइड की मात्रा वायुमण्डल में आवश्यकता से अधिक हो रही है परिणामत: पृथ्वी पर ताप बढ़ रहा है। इसके कारण जिन भागों में सदा बर्फ जमा रहता था वे भी उससे प्रभावित होंगे, बर्फ पिघलेगा, समुद्र की सतह ऊँचे उठेगी और अनेक भूखंड जल मग्न हो जायेंगे। कारणों की खोज करने वाले विद्वानों का कहना है कि यह सब इसलिये होगा कि वनों की हरीतिमा आज वैसी नहीं रह गई, जैसी सौ-पचास वर्ष पूर्व तक थी।

प्रकृति के संगठक तत्वों में, जो स्वाभाविक अनुपात होता है, उसे विलोड़ा जा रहा है। इस विलोडऩ को बहुत कुछ सम्हालने की शक्ति वनों में हैं, किन्तु विशेषज्ञों की राय की चिन्ता न कर समाज ऐसे मार्ग पर चल रहा है कि पीछे हटने की दशा की चर्चा करना व्यर्थ है। आगे बढऩा असंभव हो जायगा, यह कहना भी अपर्याप्त है। कहना यह चाहिये कि जहाँ वह है, वहाँ भी नहीं रह सकेगा-उसका जीवन ही नहीं रह जायेगा।

कुछ वर्षों पूर्व की, उन वर्षों के आसपास की बात है जब मालगुजारी समाप्त हो रही थी, मुझे छोटी पहाडिय़ों पर लहकने वाले उन जंगलों को देखने का अवसर मिला जिन्हें मैंने अपने बाल्यकाल में देखा ही नहीं था, बल्कि जिनमें भ्रमण करने का नित्य ही मुझे सुयोग मिलता रहा। उस समय के वनों का मेरे मानस पटल पर अभी भी बिम्ब है। वे जंगल कोई सरकारी जंगल न थे, ऐसे जंगल थे जिनमें सामान्यत: सतकठा के पेड़ थे, बड़े पेड़ थे महुआ, चार, सेझा, बरसज के अच्छे मोटे और प्राय: 15-20 फुट ऊँचे और उन पेड़ों के बीच-बीच करौंदा, मकोय, कत्था, अमलतास, सिहारू आदि के मँझोले कद वाले पेड़ थे, झाडिय़ाँ थीं, पर क्या खूब अपनी गरिमा में। निकटस्थ गाँव जो एक प्रकार से हरी-भरी पहाडिय़ों के करखा में ही बसे थे और दो-तीन सौ घरों से अधिक आबादी वाले नहीं थे। निवासियों में 8-10 घर ब्राह्मणों के, 3-4 कुरमियों के, 2-3 घर कोरियों के, 5-6 घर गड़रियों के, 12-15 घर अहीरों के, 1-2 लुहारों के, 6-7 चर्मकारों के और शेष कोल, भुमियों और गौंड़ों के थे। बहुसंख्यक कोल, भुमिया और गौंड़ ही कहलाये। ब्राह्मण तो खेती-पाती और पुरोहिती करते, लुहार, चमार अपना धंधा करते, कोरी बाजार से सूत खरीदकर खादीनुमा कपड़े बुनते, गड़रिया और अहीर गाडऱ (भेड़) और गाय-भैंस पालते। यों दो-चार जानवर तो कोल-भुमिया और गौंड़ों के पास भी रहते थे पर उनका जीवन पूर्णत: सवर्णों के यहाँ खेती में मजदूरी पर काम करना था। उनकी स्त्रियाँ जंगलों से सूखी लकडिय़ाँ एकत्र कर उनकी लम्बी ‘मोरी’ बनाकर निकट के नगर में बेचने जाती थीं। कुछ लोग चार से चिरौंजी बनाते- बेचते, कुछ शहद एकत्र करते थे इत्यादि। पशु जंगल में चरने जाते थे। मालगुजार की ओर से कोई चरू नहीं लिया जाता था। ग्राम के चतुर्दिक हरियाली का सुंदर परिदृश्य था।

फिर कुछ वर्ष बाद मैंने उन्हीं पहाडिय़ों और जंगलों को देखा। भारतीय अब तक स्वतंत्रता का अर्थ अपने ढंग से लगा कर स्वयं को निर्बंध समझने लगे थे। अपने पहाड़, अपनी घाटियाँ, अपनी नटियाँ, अपनी पटियाँ और अपने महुआ, अपने कहुआ का भाव मर्यादाएँ लाँघने लगा और हर व्यक्ति स्वार्थ पूर्ति की ललक लेकर जंगलों के शोषण पर उतारू हो गया, अंधाधुंध कटाई की गई। उधर प्रकांडरों पर कुल्हाड़ी चली और इधर देखा ये गया कि वह कुल्हाड़ी मनुष्य के ही पैरों पर पड़ रही है तथा उनका वह स्वरुप जिसका चित्र ऊपर दिया गया है, बदलने लगा-गिरावट की ओर जाने लगा। वह स्थिति ही मुझे अच्छी नहीं लगी। पहाडिय़ों पर से हरीतिमा का कवच समाप्त हो रहा था, वे मुंडी हो चली थीं। तब मैंने जबलपुर से निकलने वाले ‘युगारम्भ’ मासिक में एक लेख लिखा था ‘जंगलों में हरियालियाँ लहकना चाहिये। ’ यह आज से कई दशक पहले की बात है किन्तु एक लेख की कौन परवाह करता है, पर स्थिति चित्रण देकर मैंने अपने दुखी मन को रिक्त किया, यह मुझे संतोष रहा। भारतीय पत्र-संसार में कदाचित वह पहला लेख था।

लोग और शासन दोनों यों नहीं मानते। अपने ढंग से चलने लगे हैं। शासन की भी तो ऐसी स्थिति हो गई है कि हम कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते पर फिर भी, हमारे भीतर से कोई बोलता है कि हम अपना धर्म पूरा नहीं कर रहे 29 अगस्त 1989 को कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता पं. कमलापति त्रिपाठी ने एक बयान दिया कि ‘राजनीति में अपराधियों की बढ़ती घुसपैठ हो चली है और पदाधिकारियों के पद बेचे जाते हैं। यह सुनने पर आश्चर्य होता है कि राजनीतिक दलों का पदाधिकारी बनने के लिये दलीय आस्था, दल की नीति एवं कार्यक्रमों के प्रति समर्पण का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। ’ यह शीर्ष पर पहुँचे उन व्यक्तियों से सम्बंधित बात है जो देश के विकास के लिए धर्म निष्ठता पीकर मानसिक विकृतियों में जा फंसे हैं। वनों का विनाश उनके देखते-देखते ही हो रहा है। परिणाम भी वे खुली आँखों से देख रहे हैं।

अभी दो वर्ष पूर्व फिर वही पहाडिय़ाँ देखीं और उन पर की हरियाली भी। कुछ नहीं रह गया। इसका चित्र मैंने इसी पुस्तक के अन्त में दी गई रचना ‘वनचारी पशु पक्षियों द्वारा प्रजातंत्र की माँग’ में किया है।

एक बात मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि ऊपर जो कुछ लिखा है वह एक छोटे से क्षेत्र की बात है और उन जंगलों की है जो मालगुजारी थे पहले। पर, जंगल काटने के अपराध का प्रसार पूरे देश में फैला और जनसाधारण उन्हें उजाड़ते यह भूल गया कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। देश में आज स्थिति विकराल है।

वनों को केन्द्रक मानकर यदि विचार किया जाय तो हमारे सामने अनेकानेक और भी समस्याएँ उनके विनाश से सम्बद्ध हो जाती हैं। वन्य प्राणियों की संख्या में गिरावट-यहाँ तक कि कुछेक वनचारियों की प्रजाति ही समाप्त होने की स्थिति में पाई जा रही है, देश में वर्षा का असंतुलित वितरण पाया जा रहा है, भूगर्भ जल में कमी हो रही है, कहीं बाढ़ आती है, कहीं सूखा पड़ रहा है, औषधि-उपचार के लिए उपलब्ध होने वाली आवश्यक जड़ों, कंदों और वनस्पतियों की विलुप्ति हो रही है।

भारत के विकास हेतु विभिन्न प्रकार की परियोजनाओं के अन्तर्गत बाँधों के निर्माण और उद्योगों संयंत्रों के स्थापन से विभिन्न प्रकार का गैसीय प्रदूषण बढ़ रहा है। नदियों का जल दूषित हो रहा है। यहाँ तक कि समुद्र भी प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं।

और, देश का दुर्भाग्य यह है कि इस समय वैचारिक-प्रदूषण सर्वोच्च स्थिति बनाये हुए है। आध्यात्मिकता के आधार पर जीवन-यापन करने वाले देश में आध्यात्मिकता के सारे सिद्धान्त, सारे सूत्र मिट रहे हैं। एकत्व की भावना का विनाश हो गया है। भ्रष्टाचार- स्वार्थ और तेरी-मेरी बातों में देश के चोटी के नेता भी उलझ रहे हैं। हम यह टिप्पणी नहीं करना चाहते थे परन्तु अपने सीने पर हाथ रखकर यदि कोई सच बोलना चाहेगा तो यही कहेगा। 29 अगस्त 1989 को कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता पं. कमलापति त्रिपाठी ने जो बयान दिया उसका सार तत्व यही है कि मनुष्य कितने वैचारिक प्रदूषण में पगा हुआ है। अन्य सारे प्रदूषण भी बुनियाद रुप में हमारी दृष्टि में मनोविकार है। पर्यावरण के प्रदूषण का इतना हो-हल्ला मचने के बाद भी आखिर क्यों अपेक्षित जन-जागृति नहीं है? और जहाँ है भी वहाँ यह भी देखा जा रहा है कि यदि शासन की ओर से उस दिशा में कुछ किया जाता है तो ऐसा विरोध होता है कि उसमें रचनात्मक दृष्टि, संवेदनशीलता और सहयोग की प्रवृत्ति का अभाव नजर जाता है।

शासकीय स्तर पर पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति पाने के लिए तथा अन्यान्य संलग्न समस्याओं का सामना करने के लिए वन संरक्षण, पशु-पक्षियों की गिरती संख्या के सुधार के लिए अभारण्यों के स्थापन का कार्य हाथ में लिया गया है। इंडियन वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट (1972) इसीलिये बनाया गया है। बहुउद्देशीय परियोजनाएँ भी कार्यशील हैं। इनकी संख्या भी प्रतिवर्ष बढ़ाई जा रही है और पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए तो सारे विश्व द्वारा उपाय खोजे जा रहे हैं, किन्तु एक समस्या सुलझाने में दूसरी समस्या सामने या जाती है, तीसरी आ जाती है और असफलताओं का एक चक्र तैयार हो जाता है।

हमारी दृष्टि से वनों को संरक्षण देने और उनके विकास-विस्तार के कार्यक्रम का क्रियान्वयन समयबद्ध होना चाहिए। जहाँ भी वन लगाये जाएँ स्वाभाविकता का ध्यान रखा जावे। आशय यह है कि केवल पेड़ों को लगा देने से ही जंगल नहीं बन जाता। वन केवल कुछ खास पेड़ों के समूह ही नहीं हुआ करते। वे तो अनेकानेक जड़ी-बूटियों, जनोपयोगी फलों, कन्द-मूल आदि सहित बहुविध झाडिय़ों-लता-गुल्मों के झुरमुटों का निर्माण करते हुए ऐसे होते हैं जिनमें सैकड़ों प्रकार के वन्य प्राणी और पक्षी पलते हैं तथा जो बादलों को आकृष्ट कर जल वृष्टि की दिशा में उपयोगी होते हैं जो भूक्षरण को रोकते हैं, जिनके झरे हुए पत्ते धरती पर बिछकर वर्षाजल को एकदम बह जाने से रोकते हैं और बरसे हुए जल को भूगर्भ में प्रविष्ट करने में सहायक होकर आगे की शुष्क ऋृतु में झरनों की निरन्तरता बनाते हैं तथा जो पर्यावरण को प्रदूषण से विमुक्त रखते हैं।

पुरातन युग में पेड़-पौधों अथवा वनों को बहुआयामी महत्व दिया गया था। मनुष्य उनसे एकमएक होकर स्वयं को संवर्धित करने में उनका सहयोग पाता था तथा उनके प्रति कृतज्ञ होकर किस प्रकार उनकी पूजा भावना से अभिभूत हुआ था इस संबंध में हमने आगे किंचित विस्तार से विचार किया है, उनके बीच रहकर अनेकानेक प्रकार के मानवेतर प्राणियों को उसने किस दृष्टि से देखा है और अपने लिये उनका कितना क्या कैसा मूल्य माना है। इस संबंध में भी हमने जनसाधारण के बीच प्रचलित पूजा-भावना का चित्रण किया है। इससे स्पष्टत: यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिये कि विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों और प्राणियों एवं प्रकृति के अन्य उपादानों के बीच ही मनुष्य की स्थिति है। जीवन का एकाधिकार केवल उसे ही नहीं मिला है। अवश्य ही उसमें बुद्धिचातुरी है। पर इसका यह आशय नहीं कि वह केवल स्व अर्थ ही देखे। आज मनुष्य की आकांक्षायें-लालसायें प्रकृति के साथ अतिवादी, आक्रामक रुख अपनाने के लिये बाध्य कर रही है। कैसी विडम्बना है कि उसकी स्वयं में केन्द्रित भौतिक-कल्याण अथवा सुख सुविधा की भावना उसके ही अकल्याण का मार्ग प्रशस्त करे उसे अधिक सतर्क होकर चलने की आवश्यकता है। अतीत में मानव समाज ने पेड़ पौधों और मनुष्येतर प्राणियों का जो मूल्यांकन किया है, यह उसका कोई पागलपन नहीं था। उनके संरक्षण उनके हित में मनुष्य का कल्याण भी अंगीभूत है। यह समझ उसमें थी पर यह समझ आज हममें नहीं है। समय की इतनी लम्बी यात्रा में इस दिशा में हमने बहुत कुछ खोया है और आज भी खो रहे हैं। अपनी सफलताओं की दिशा में आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों से भरी दम्भोक्तियों में गर्क शायद हम तब तक नहीं चेतेंगे जब तक पूर्णत: नष्ट नहीं हो जाते। जब हम नष्ट हो जायेंगे तब क्या कोई मनु पृथ्वी पर मानव जीवन का प्रसार करने के लिये प्रकट होगा? कैसे मालूम है ?

पर्यावरण प्रदूषण की समस्या इतनी मामूली नहीं है जितनी समझी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के कत्र्तव्य से सम्बद्ध है यह बात कि वह इससे विमुक्त होने के उपायों में हाथ बँटाये। पर्यावरण संबंधी विकृति के संबंध में विचार करते हुये येले विश्वविद्यालय के प्राध्यापक जे. डोलाई तथा एल. डब्लू डोस कहते हैं कि इसके कारण मनुष्य में आक्रामकता एवं हिंसा की वृद्धि होती है। पर्यावरण के विघटन के कारण अंत:करण का भी विघटन होता है जो कि स्वयं को नष्ट तो करता ही है, बहिर्मुख होकर दूसरों को भी चपेट में ले लेता है। देश-विदेश में होनेवाली हिंसक घटनाओं में वृद्धि का मूल कारण पर्यावरण का विकृति जनित वैचारिक प्रदूषण है।

इक्कीसवी सदी की ओर हम बढ़ आये हैं। पर किन उपलब्धियों के साथ? इस पर लौट-लौटकर विचार करना आवश्यक है। सिंहावलोकन इसी को कहते हैं।

अतीत की कथाओं में अनुस्यूत तब के मानव की सूझ भी हमें ‘हम’ बनाये हुये हैं। पर अब हम किसी की सुनते ही नहीं। आज कल ‘मैं’ को ‘हम’ कहा जाना लगा है।

‘मैं’ और ‘हम’ के ठीक अर्थ को न समझने के कारण ही हम आधि-व्याधि ग्रसित हैं, ठीक अर्थ को समझता था पुरातन युग का मनुष्य, जो बहुत सरल था। सरलता व्यक्तियों में नहीं समाज में थी व्यक्ति स्वयं था भी नहीं कुछ। उसका मूल्य समाज में ही था। समाज से अलग भी वह कुछ है, इसका उसे बोध न था। था भी तो बहुत कम। आज भी यदि हम आदिवासियों के बीच जायें तो हम पायेंगे कि उनमें ‘मैं’ का विचार कम है, ‘हम’ का ख्याल अधिक है। उनकी कुछ भाषायें तो ऐसी हैं जिनमें ‘मैं’ नहीं है, ‘हम’ ही है, आदिवासी कबीलों में समस्यायें ढेर सारी हैं, पर प्राय: सब ‘हम’ वाली हैं। आदिवासी बोलता है, तो बोलता है ‘हम’। वहाँ ‘मैं’ का कान्सेप्ट ही पैदा नहीं हुआ

‘हम’ के कान्सेप्ट वाले क्षेत्र में एक व्यक्ति के तार दूसरे से जुड़े रहते हैं। तभी तो ‘हम’, ‘हम’ हैं, आज के पढ़े-लिखे मनुष्य से ‘हम’ दूर हटता जा रहा है, अत्यंत व्यक्तिवादी होता जा रहा है। तभी तो किसी कार्य को हाथ में लेने पर एक स्वर से ‘हैइया’ नहीं हो पाता और असफलता हाथ लगती है। कहा जाता है, देश को एकता की जरूरत है। पर कैसे हो? बुद्धि तत्व ‘हम’ को पीछे ढकेल रहा है। सब व्यक्ति-वादी होकर स्वार्थ साधन में दूसरों की ओर से आँखें बंद करके चल रहे हैं, किसी भी दिशा में हमारी सामूहिक एकता के दर्शन नहीं होते। जागृत मनुष्य से अच्छी तो निर्बुद्धि भेड़ें हैं जो एक दूसरे के पीछे लमडोर बनाये हुए चलती हैं। उनमें आगे-पीछे रहने-होने का झगड़ा भी नहीं होता। एक जिस ओर चली, दूसरी उसके पीछे चल देती है। भेड़ों को चलते हुये देखें तो लगता है ‘हम’ चल रहा है। एक ही जीवन सरक रहा है। आकाश में बादल आये, बिजली कौंधे-कडक़े, तो वे एक दूसरे पर सिमट जाती हैं, एक ढेर बन जाती हैं।

हम लोग ‘मैं’ को लेकर इस अणुवादी सभ्यता के प्रभाव में कैसे विभाजित, विखंडित हो रहे हैं। यह विखंडन वैचारिक ही है और इसे वैचारिक प्रदूषण समझना चाहिये, जिसकी समाप्ति में ही अनेक प्रकार के प्रदूषण की समाप्ति होगी। वहीं मनुष्य की गरिमा भी उचित शीर्ष पर पहुँचेगी।

जन-मन एक होकर ‘मैं’ से मुक्त होकर ‘हम’ की भावना में तिक्त, सामूहिक दायित्व बोध के साथ यदि प्राकृतिक तत्वों के समुचित संतुलन के लिये प्रयत्न शील हो तो निश्चय ही हम सभी प्रकार के प्रदूषणों के प्रभाव से विमुक्ति पा सकेंगे, अन्यथा हम समाप्त होंगे और अन्य प्राणी तथा वनस्पति जगत भी। कर्मों का विपाक तो होता ही है, परन्तु अनुकूल फल प्राप्ति की दिशा में होना चाहिये। गोपालदास ‘नीरज’ की काव्य पंक्तियाँ हैं-

आग लेकर हाथ में पगले जलाता है किसे,

जब यह बस्ती न रहेगी, तू कहाँ रह जायेगा।

वस्तुत: संसार में अकेला कोई पदार्थ नहीं। यहाँ सबकुछ सुगठित और सुसंबद्ध है। सर्वत्र अन्योन्याश्रय का सिद्धान्त कार्य कर रहा है। जड़-चेतन से विनिर्मित यह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड एकता के सुदृढ़ बंधनों में बंधा हुआ है। बंधनों के स्वाभाविक क्रियारत् समानुपातक तालमेल को बिगाडऩा हमारे लिये आत्मघाती है। वास्तव में पारम्परिक बंधन ही सृष्टि की शोभा- सौंदर्य का, उसकी विभिन्न हलचलों का, उत्पादन-विकास एवं परिवर्तन का उद्गम केन्द्र है। इसे समझने के लिये सूक्ष्म पर्यवेक्षण की आवश्यकता है।

निर्वनीकरण, प्राणियों का शिकार, भूगर्भ सम्पदा का अत्यधिक दोहन चरम सीमा पर है। जन्तु एवं वनस्पति पृथ्वी-जल-वायु तथा अन्य जीवनोपयोगी पदार्थ प्रकृति के घटक हैं। आज प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण हमारे सामने कौन सी समस्यायें आ खड़ी हुई हैं, उनके निराकरण की दिशा में शासन द्वारा जो गति ग्रहण की जा रही है उसके संदर्भ में निकट भविष्य में प्रतिफलित होने वाले एवं दूरगामी परिणामों पर हमने इस पुस्तक में विचार किया है। आशा है कि अनुस्यूत विचार जनसाधारण और शासन के लिये उपयोगी होंगे। विकास के नाम पर बड़े-बड़े बाँधों के निर्माण की परियोजनायें हाथ में लेकर इतिहास और भूगोल बदलने के पूर्व एकाग्रचित्त होकर यह सोचना बहुत आवश्यक है कि हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी।

डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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