श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ संजय दृष्टि – समय ☆
समय को ढककर
अपने दुशाले से
खेलता हूँ छुपाछुपी,
खुद ही छिपाता हूँ
खुद ही ढूँढ़ता हूँ,
हौले से दुशाला हटाता हूँ,
समय को न पाकर
चौंक जाता हूँ,
फिर देखता हूँ
समय उतरा बैठा है
हर आँख में..,
अब आँख
खुली रखो या बंद,
क्या अंतर पड़ता है,
समय सर्वव्यापी हो चुका!
© संजय भारद्वाज
प्रात:8:50 बजे, 21.6.2020
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
writersanjay@gmail.com
9890122603







वाह! कितनी सुंदर कल्पना, दुशाले में ढका समय!! सर्वव्यापी समय की खोज मन की जिज्ञासा, उत्साह का प्रतीक सम ही है।सुंदर अभिव्यक्ति।
खुली आँख से देखो या बंद से, समय सर्वव्यापी है।
बीता समय खुली आँखों से देखें या बंद – अब तो समय सर्वव्यापी हो चुका है
कल्पनातीत अभिव्यक्ति