श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “झेड प्लस प्लस से झेड स्क्वेयर सिक्सटीन तक…” ।)
☆ शेष कुशल # 52 ☆
☆ व्यंग्य – “झेड प्लस प्लस से झेड स्क्वेयर सिक्सटीन तक…” – शांतिलाल जैन ☆
‘सर, सारी गलती अंग्रेजों की है. अल्फाबेट में ‘झेड’ से आगे कोई अक्षर ही नहीं बनाया आलसियों ने. बनाया होता तो बनवारी हमेशा आपके लेवल की सिक्युरिटी से दो चार अक्षर पीछे ही रहा होता.’ – पीएस ने सर का मूड नार्मल करने की कोशिश की.
पार्टी में पिछले दिनों अपने घोर विरोधी बनवारी को झेड लेवल की सिक्युरिटी दो प्लस के साथ मिल गई है, बस तभी से वे खिन्न हैं. हालाँकि झेड प्लस प्लस सिक्युरिटी उनके पास पहले से ही है. मगर दूसरों को भी मिल जाने से दुखी हैं. अंदेशे में दुबले हो रहे हैं. अंदेशा वाजिब भी है श्रीमान. एक बार आदमी साधारण से चलकर ‘वीवीआई’ मकाम तक पहुँच जाए, ‘पी’ तो महज़ फ्लैश एंड ब्लड वाला परसन भर रह जाता है, आदमियत खो जाती है. सिस्टम में धंसा एक आदमी जब अपने को महत्वपूर्ण मनवाने के लिए अति करने पर उतर आए तो अतिमहत्वपूर्ण व्यक्ति का लेवल चस्पा करवा लेता है. पहले उन्होंने किया, आज बनवारी ने करा लिया है. वीवीआईपियों की भीड़ से बैकुंठ संकड़ा पड़ गया है.
जीवनशैली में वे आने वाले समय में आ सकने वाले बदलावों से आज ही डरने लगे हैं. वे आगे देख पा रहे हैं कि वीवीआईपी इतने अधिक हो गए हैं कि शाही स्नान के दिन गाड़ी सीधे गंगा के घाट तक नहीं ले जा पा रहे हैं. वीवीआईपिओं की भीड़ में भगदड़ मच गयी है और वे कुचले जा रहे हैं. उनसे कहा जा है कि सर वीवीआईपी-क्यू उस तरफ लगी है, कृपया उधर से. अभी तक तो उन्हें कभी किसी क्यू में लगना ही नहीं पड़ा मगर हर किसी ऐरे गैरे नत्थू खैरे को वीवीआईपी स्टेटस दिए जाने से अब उनको लाइन में लगना पड़ रहा है. मंदिरों में प्रोटोकॉल पाए भक्तों की लाइन आम भक्तों की लाइन से ज्यादा लंबी हो गई है. ये क्या, उनकी गाड़ी ट्राफिक सिग्नल पर रोक दी गई है. तीखी धूप में जाम में फंसी जनता को देख उनका वीवीआईपी सुख चरम को पा जाता था, बनवारी प्रकरण के बाद ऐसा नहीं हो पा रहा है. वीवीआईपी रोक दिए गए हैं, बताईए भला. एसपी साब सफाई दे रहें हैं – ‘सर ये जो ट्राफिक देख रहे हैं आप वीवीआईपियों का ही है. आम आदमी ने तो घर से निकलना ही बंद कर दिया है. सॉरी सर. ग्रीन हो गया है निकल जाईए.’
अभी तक स्टेट प्रोटोकॉल ऑफिसर उनकी अगवानी को आता रहा मगर पिछले दिनों प्रोटोकॉल ऑफिसर को ही वीवीआईपी का दर्ज़ा मिल गया है. कौन किसको रिसीव करे – अफरा तफरी मची है. उधर सर्किट हाऊस में पहले से इतने वीवीआईपी रुके हैं कि उनके लिए पोर्च में दरी बिछाकर सोने की नौबत आ गयी है. खानसामा वीवीआईपी बनने की जुगाड़ में कहीं बिजी है. ब्रेड पर बटर-जैम उनको खुद लगाना पड़ रहा है. वे तीन दिन से ट्राय कर रहे हैं वीआईपी कोटे में बर्थ कन्फर्म नहीं हो पा रही. अभी तक वे कानून से ऊपर थे मगर वीवीआईपियों की धक्कामुक्की में नीचे गिर गए हैं. अभिजात्य अभिजात्य नहीं रहा, आम हो गया है. इस कदर कि ये साला पीएस जो अभी तक यस सर यस सर करता हुआ झुकी झुकी कमर लिए खड़ा रहता था, तन कर खड़ा होने लगा है, डिक्टेशन लेने में इसकी नानी मरने लगी है. इतने बुरे दिन पहले कभी नहीं आए थे. वे भविष्य के ऐसे दृश्यों की कल्पना मात्र से पसीना पसीना हो गए हैं, और सजगता में लौट आए हैं. उन्होंने पूछा – ‘बनवारी से आगे कैसे रहा जा सकता है ?……. होम मिनिस्टर से बात करके देखा जा सकता है, हिंदी के अक्षर से चलें तो ‘ढ-प्लस’ या ‘ज्ञ-प्लस’ तक भी जाया जा सकता है.’
‘नहीं सर, ऐसी गलती मत कीजिएगा. बेईज्जती हो जाएगी. हिंदी तो अब पानवाले तक यूज नहीं करते आप सिक्युरिटी लेवल की बात कर रहे हैं.’
‘तब क्या किया जाए? अपन के झेड में आलरेडी दो प्लस लगे है, अब बनवारी के भी लग गए हैं, कुछ तो करना पड़ेगा.’
‘सर, स्क्वेयर लगवा लीजिए. झेड स्क्वेयर सिक्सटीन, झेड स्क्वेयर थर्टी टू ऑर सिक्सटी फोर. समथिंग लाईक दैट. बाकियों को वहाँ तक पहुँचने में टाईम लगेगा. फिर आप पुराने वीवीआईपी जो हैं. सिनिओरिटी काउंट होनी चाहिए.’
बात तो ठीक है. कुछ देर सोचकर उन्होंने अपने आप को संयत किया, उठ खड़े हुए, पीएस को गाड़ी पोर्च लगवाने का निर्देश दिया. होम मिनिस्टर से मिलने के लिए निकलने वाले हैं. बीच में मंशामन मंदिर में रुकेंगे, शीश नवाएँगे, मन्नत मांगेंगे – प्रभु, झेड स्क्वेयर सिक्सटीन लेवल की सुरक्षा का प्रोटोकॉल बने जो उन्हें और सिर्फ उन्हें ही नसीब हो.
शीघ्र ही हम उनकी मंशा फलीभूत होते देखेंगे. देखेंगे आर्यावर्त में अभिजात्य के टापू के बीच एक सुपर-अभिजात्य टापू निकल आया है.
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© शांतिलाल जैन
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






