श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख…” ।)

☆ शेष कुशल # ६८ ☆

☆ व्यंग्य – “ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख – शांतिलाल जैन 

पिछले अठ्ठाइस दिनों से कलफ़ लगे कुरते-पजामे अपने पहने जाने की हसरत लिए उनकी ओर तक रहे हैं. उन शॉलों की संख्या में भी इज़ाफा नहीं हो रहा जिनके बारे में उनके मन में एक अदम्य लेकिन भोला विश्वास है कि एक दिन वे कोलकाता के द रसेल एक्सचेंज में नीलाम की जाएँगी और हिंदी जगत का कोई धरोहर प्रेमी कोई उन्हें ऊँची बोली लगाकर खरीद लेगा. उनके शेल्फ में लकड़ी के चौकोर गत्ते पर टिके लगभग नौ इंच ऊँचे तीन जगह से टेढ़े हुए जा रिए स्मृति चिन्ह की वृद्धि दर स्थिर हो गई है. फूलमालाओं की एडिक्ट हो चुकी गर्दन के अपने तकाज़े हैं. रह रह कर एक तलब सी उठती है. कर कमल बुके ग्रहण करने को कुलबुलाने लगते हैं. दरअसल, वे भी चाहते हैं कुरते-पजामे पहने जाएँ मगर विवश हैं. ऑकेजन बन ही नहीं रहा. ऐसा नहीं है कि पिछले अठ्ठाइस दिनों में उन्होंने किसी गोष्ठी की अध्यक्षता न की हो. की है. तीन-चार की है, मगर ऑनलाइन, वर्चुअल. आग लगे ऐसी तकनालॉजी को जिसने अध्यक्षीय ठाठ ख़त्म कर दिए. अध्यक्षता गूगल मीट पर हो तो चाय भी घर की पीनी पड़ती है श्रीमान्. टू-जीबी डेटा ज़ेब का लग जाता है सो अलग. हैरान हैं वे – बारात में जाना और पान-सुपारी घर की खाना, ये कौनसी बात हुई!!

ऑफ़लाइन अध्यक्षयाई के दिन भी क्या स्वर्णिम दिन हुआ करते थे. सुदूर शिमला-मसूरी-नैनीताल तक से ऑफर आया करते थे. जलवा हुआ करे था अध्यक्षजी का. सेकंड एसी से यात्रा. एक्सक्लूसिव टैक्सी का इंतजाम. थ्री स्टार स्टे, मिसेज अध्यक्ष के साथ साईट सीइंग के आनंद का प्रबंध. क्लोज डोअर रसरंजन की सुविधा. मेमोरेबल गिफ्ट. आयोजक बिछे-बिछे जाते थे. डिजिटल क्रांति ने अध्यक्षीय रुतबे पर पानी फेर दिया है. वे बड़े लेखक हैं. चालीस साल पहले उन्होंने एक उपन्यास लिखकर चतुर्दिक ख्याति पाई है. उसके बाद वे चाहकर भी कभी कुछ नहीं लिख पाए, साहित्यिक जगत उन्हें अध्यक्षता से विराम जो लेने नहीं दे रहा. इन चार दशकों में उन्हें अध्यक्ष होने की लत लग गई है. कितना कारूणिक है यह सब कि उम्र और साहित्यिक यात्रा के इस मोड़ पर उन्हें ऑनलाइन के दुःख झेलने पड़ रहे हैं.

सुदूर डेस्टिनेशन तो छोड़िए, इन दिनों शहर के शहर में आयोजक ऑनलाइन कार्यक्रम करा लेते हैं. पर्देदारी यह कि दूसरे शहर से भी कुछ वक्ताओं को जोड़ना है सर. ऑनलाइन से पूर्व के कालखंड में जब अपने ही शहर में हुआ करता था ऑफ़लाइन व्याख्यान तब अध्यक्षजी का जलवा देख देख कर स्थानीय प्रतीक्षारत अध्यक्षीय उम्मीदवारों के कलेजों पर साँप लोट जाया करते थे. ‘हाय हमारा नंबर कब आएगा?’ दो वालिंटियर कार लेकर पंद्रह मिनट पहले घर के बाहर हाज़िर. साहित्य में फिजीकल योगदान देते कार्यकर्ता घंटी देने के बाद अध्यक्षजी के घर से बाहर आने की प्रतीक्षा करते. आपस में बतियाते. बीच बीच में मरियल सी देसी कुतिया को लतियाकर भगाते हुए समय काट रहे हैं. कुतिया भी अध्यक्षजी को लेने आई कार का रियर व्हील भिगोने के मिशन पर है. प्रतिबद्ध. उसे एक सिंपल सा फैक्ट नहीं पता है – एक प्रतिबद्ध प्राणी हर दौर में लतियाया ही जाता है. खैर, साहित्य सेवा में असल त्याग तो इन दोनों वालिंटियर्स का है, दोनों निस्पृह भाव से सड़क पर खड़े उनकी प्रतीक्षा जो कर रहे हैं.

चलिए, अध्यक्षजी तैयार हैं मगर बाहर नहीं आ रहे. टाईम से बाहर निकल आएँ तो अध्यक्ष होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता. एनवक़्त पर डियो मिल नहीं रहा.  बेडरूम से ड्राइंगरूम तक आने में समय लग रहा है. कोई बात नहीं – बड़े आदमी हैं. हाँ कर दी यही बहुत है. प्रस्ताव आया तब तो उन्होंने मना ही कर दी थी. मिनिमम तीन मनुहार से कम में हाँ करते ही कब हैं? कहा कि इस दिन मुझे देहरादून एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करने जाना है. काफी मनुहार के बाद उन्होंने देहरादून का कार्यक्रम निरस्त करके इस स्थानीय कार्यक्रम की हाँ की है. घंटाभर प्रतीक्षा भी करना पड़े तो कोई बात नहीं. बड़े आदमी हैं. थैंक गॉड. आधे घंटे बाद ही बाहर आ गए हैं. कार में बैठते बैठते पूछा – अरे आप लोगों ने चाय ली? (पानी तक मयस्सर नहीं हुआ). मगर – नहीं नहीं सर, अभी नहीं. पहले चलते हैं. देर हो गई है. डियो की तेज़ महक से रास्तेभर वालिंटियर्स का जी मिचलाता रहा. मैंने ऊपर बताया ना आपको – साहित्य सेवा में असल त्याग तो इन दोनों कार्यकर्ताओं का है.   

बहरहाल, अध्यक्ष होने का जन्मसिद्ध अधिकार पाए साहित्यकार को ऑनलाइन के कारण हिंदी साहित्य में ऐसे बुरे देखने पड़ेंगे उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था. ऊँचा मंच, बीच में उनकी दो इंच ऊँची कुर्सी, बिसलेरी का पानी, संचालिका से बीच बीच में बतियाने का सुख काफ़ूर हो गया है. सामान्यतः मिनिमम ऑडियंस की भूमिका में उनकी अपनी एक निजी सेना होती है. लगभग हर स्थानीय कार्यक्रम में मौजूद. अपनी चेयर पर बैठे बैठे जड़ हो जाने तक जमी रहती. नई किताब की भूमिका लिखवाने की गरज से आखिर तक जमे रहते कुछ नए लेखक, अध्यक्षजी की आँखों की शर्म से रुक जाया करते जूनियर लेखक. कुछ मोबाइल पर बात करने की एक्शन करते करते  हॉल से एग्जिट कर जाते,  फिर भी कुछ तो अध्यक्षीय उद्बोधन के समाप्त होने तक रुकते ही. क्या तो सुख था! फोटोग्राफर के लेन्स की जद में आते ही अध्यक्षजी सीरियस हो जाते, गंभीर मुद्रा में सोचने लगते या कुछ नोट्स लेने की अदाएँ फोटो में कैद करा लेते. अब तो बस स्क्रीन शॉट है, इनसेट-वन-बी से मौसम की ली हुई तस्वीर से मिलता जुलता. और है एक मसोसा हुआ मन. अध्यक्षीय धज ख़त्म जो हो गई है.

ऑनलाइन कार्यक्रमों से आयोजकों के अलावा किसी को आराम मिला है तो वो माँ शारदे को मिला है. डेढ़ बाय दो की फ्रेम में कैद माँ को आभार प्रदर्शन की आख़िरी पंक्ति तक सुनना पड़ती थी. चार अगरबत्तियों की खुशबू में साढ़े तीन घंटे गुजारना कितना भारी पड़ता था उन्हें. इनके चक्कर में वीणा बजाने की रियाज़ छूट जाया करती सो अलग. प्रोग्राम के बाद अध्यक्षजी तो कार में निकल जाया करते, उन्हें किसी वालिंटियर की एक्टिवा के फुट-बोर्ड पर लौटना पड़ता. प्रसन्न हैं वे, ऑफ़लाइन में शिरकत करने की विवशताएँ ख़त्म जो हो गई हैं.

आशा पर आकाश टिका है श्रीमान्. ऑफ़लाइन का बीज अभी पूरी तरह डूबा नहीं है. रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह बीच बीच में कहीं कहीं ऑफ़लाइन बुलावे भी आ रहे हैं. अठ्ठाइस दिन पहले एक ऑफ़लाइन कार्यक्रम में बुलाए जाने से मिले रिजुविनेशन से चार हफ्ते कट गए.  अब फिर कलफ़ लगे कुरते-पजामे अपने पहने जाने की हसरत लिए उनकी ओर तक रहे हैं. पुराने दिन वैसे के वैसे लौटेंगे कि नहीं पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता. हम तो यही चाहेंगे आग लगे गूगल-मीट, झूम-मीटिंग, माइक्रोसॉफ्ट-टीम, मेटावर्स की तकनालॉजी में. अध्यक्षजी के अच्छे दिन लौट आएँ – हमारी शुभकामनाएँ.

फ़िल-वक़्त “Meeting Ended by Host”.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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