श्री यशोवर्धन पाठक
(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृति शेष – साहित्य में पूर्णिका के जनक श्रद्धेय डा. सलपनाथ यादव प्रेम को सदर नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि। अमेज़न किंडल पर डॉ. सलपनाथ यादव ”प्रेम“ द्वारा स्थापित ‘पूर्णिका’ नाम से डिजिटल पुस्तक (eBook) भी उपलब्ध है, जिसमें इस विधा की बारीकियों और कविताओं का संकलन किया गया है।
ई-अभिव्यक्ति द्वारा समय समय पर पूर्णिका से सम्बंधित विशेष रचनाएँ प्रकाशित की गई हैं जिन्हें आप निम्न लिंक्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं👉
- हिन्दी साहित्य – आलेख – पूर्णिका की परिभाषा… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
- हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एक पूर्णिका – जो हमेशा लड़े हैं हमारे लिये… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
- सूचनाएँ/Information ☆ पूर्णिका उत्सव – ३ संपन्न – विशिष्ट पूर्णिकाकारों को पूर्णिकाचार्य सम्मान – अर्धशतादिक पूर्णिका संग्रह लोकार्पित ☆ साभार – डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
- सूचनाएँ/Information ☆ आभा साहित्य संघ के सौजन्य से अंतर्राष्ट्रीय पूर्णिका मंच का आयोजन “पूर्णिका उत्सव-३ (५ दिसंबर २०२५) ☆ साभार – डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
- हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एक पूर्णिका – सेवा करना अच्छा लगता है… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
- हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आत्मकथ्य – विचार (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
- हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
☆ पुण्य स्मरण ☆
☆ स्मृति शेष – साहित्य में पूर्णिका के जनक श्रद्धेय डा. सलपनाथ यादव प्रेम ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
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आज पूर्णिका हुई प्रतिष्ठित
हिन्दी के रंग मंच पर
हिन्दी से यह प्रेम तुम्हारा
वंदन का अधिकारी है
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हिन्दी साहित्य में पूर्णिका के प्रणेता श्रद्धेय डा.सलपनाथ जी यादव प्रेम के वियोग को उनके शोकाकुल मित्रों ने बड़े दिल दिमाग से महसूस किया। वास्तव में साहित्यिक क्षेत्र समेत हम सभी के लिए यह एक अपूर्णीय क्षति है। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच और आभा साहित्य संघ के संस्थापक के रूप में उन्होंने हिन्दी साहित्य के मंच पर पूर्णिका को प्रतिष्ठित कराने में जिस संघर्षशील भूमिका का निर्वाह किया उसने उनको पूर्णिकाकारों के मध्य हमेशा के लिए अभिनंदनीय वंदनीय सिद्ध कर दिया।
पूर्णिका के जनक आदरणीय डा . सलपनाथ यादव प्रेम जी पर आधारित और अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच के लिए समर्पित पं. अंशुल विशंभर मिश्र कदम जबलपुरी द्वारा संपादित और देश के विभिन्न अंचलों से ९३ पूर्णिकाकारों द्वारा डा. सलपनाथ यादव प्रेम जी के जन्म दिवस पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर सृजित पूर्णिकाओ के इस अद्भुत संकलन की जब प्रस्तुति की गई तो पाठकों के बीच इसकी काफी चर्चा की गई। किसी साहित्य साधक की रचना धर्मिता को लेकर इतने रचनाकारों के द्वारा श्रद्धापूर्वक पूर्णिका की रचना करना अपने आप में साहित्यिक क्षेत्र में एक सराहनीय कीर्तिमान है। यहां महत्वपूर्ण है कि पूर्णिका के इस संग्रह को देश की चार साहित्य अकादमी और दो विश्वविद्यालयों ने भी अपनी प्रभावी प्रतिक्रियाओं और सहमति से लोकप्रिय निरूपित किया।
पूर्णिका के सृजन की शुरुआत में इसके जनक डा. सलपनाथ यादव प्रेम जी को काफी कोशिशें करना पड़ी। बाधायें भी आईं लेकिन प्रेम जी की सक्रियता और संकल्पबद्धता ने आखिरकार पूर्णिका को कविता के क्षेत्र में एक विधा के रूप में प्रतिष्ठित और स्थापित करने में सफलता अर्जित कर ली। आज प्रेम जी के संरक्षण और मार्गदर्शन में देश भर से अधिक से अधिक पूर्णिकाकार सफलता पूर्वक पूर्णिका लिख रहे हैं और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं। पूर्णिका के पक्ष में यह आज गौरव की बात है कि आज विभिन्न अंचलों से रचनाकारों के अधिकांश पूर्णिका संग्रह प्रकाश में आ रहे हैं और उनकी सर्वत्र असरकारक ढंग से चर्चा भी हो रही है। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच ने गत वर्ष भी अपने गरिमामय आयोजन में देश के साहित्यकारों की पूर्णिका कृतियों का काफी संख्या में विमोचन किया था जिसकी साहित्यिक क्षेत्र में सर्वत्र काफी चर्चा हुई थी। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच और आभा साहित्य संघ के संस्थापक डा सलपनाथ यादव प्रेम जी की कोशिशों से आज पूर्णिका राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित और विकसित हो चुकी है।
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में डा. सलपनाथ जी यादव सभी के सुख दुख के साथी थे। प्रेम उपनाम से उन्होंने लेखन के क्षेत्र में अपनी सक्रिय पहचान बनाई और प्रतिष्ठा अर्जित की और केवल उन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं की बल्कि वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे। एक सफल अधिवक्ता, यादव समाज में एक प्रसिद्ध समाजसेवी और मार्गदर्शक, आयुर्वेद रत्न के रूप में एक जानकार चिकित्सक ये सब उनके प्रभावी व्यक्तित्व की पहचान थी। उन्होंने मिलनसारित और जुझारूपन के कारण विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अनोखी छाप छोड़ी और लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया।
आज डा.सलपनाथ जी यादव हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका संघर्ष और उनका प्रेम सदा हमारे साथ रहेगा और हम उनके सपनों को पूरा करेंगे जो कि उन्होंने पूर्णिका के विकास के संबंध में देखा था। आज कविवर श्री नरेन्द्र की ये पंक्तियां याद आ रही हैं जो कि उनके सक्रिय और संघर्षशील व्यक्तित्व पर खरी उतरती हैं –
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आदमी के, प्यार के, संघर्ष के
जो गीत गाए,
जियेंगी सदियां उन्हें दिन रात
छाती से लगाए।
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सादर स्मरण – विनम्र श्रद्धांजलि🌹
© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






